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रजनी बाबू धीरे चलना बड़े धोखे हैं राजनीति की राह में...

कैच ब्यूरो | Updated on: 19 May 2017, 10:51 IST
एएफपी/ अरुण शंकर

सुपरस्टार रजनीकांत एक बार फिर सुर्खियों में हैं. उन्होंने कहा है कि अगर ईश्वर की इच्छा हुई तो वे राजनीति में उतर सकते हैं. अपने प्रशंसकों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, "अगर उन्हें राजनीति में कोई बड़ा अवसर मिलता है तो वे एक ईमानदार राजनेता होंगे."

परन्तु हर राजनेता जनप्रतिनिधि बनने से पहले ऐसे ही वादे करता है, फिर चाहे वह अरविंद केजरीवाल हो या एमजीआर. एमजीआर ने भी मुख्यमंत्री बनने से पहले सुशासन का वादा किया था. रजनीकांत जैसे अभिनेता के फैन्स को उनके वक्तव्यों में कुछ खराबी नजर नहीं आती. वे रजनीकांत के इस बयान को भी अच्छा ही मान रहे हैं, जैसे कि 1996 वाले बयान को. उस वक्त भ्रष्ट जयललिता सरकार के खिलाफ उन्होंने कहा, "अगर वह सत्ता में दोबारा आती हैं तो भगवान भी तमिलनाडु को नहीं बचा पाएंगे."

जनता पर रजनीकांत के इस बयान का कुछ ऐसा असर हुआ कि जयललिता सरकार गिर गई और सत्ता परिवर्तन का सारा श्रेय रजनीकांत को ही दिया गया. परन्तु अब रजनीकांत कहते हैं कि उन्होंने जयललिता विरोधी द्रमुक-तमिल मनीला कांग्रेस गठबंधन सरकार का समर्थन करके बड़ी गलती कर दी, क्योंकि उन्होंने पैसे के लिए रजनीकांत के नाम का इस्तेमाल किया.

परन्तु सच्चाई कुछ और भी है. 1996 में करुणानिधि के नेतृत्व में बनी द्रमुक सरकार साफ-सुथरी सरकार थी, क्योंकि वह भ्रष्टाचार विरोध के मुद्दे पर चुनकर आई थी. करुणानिधि ने जयललिता और उनके कई मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज करवाए.

1998 में केद्र की वाजपेयी सरकार का समर्थन करने के पीछे जया का एकमात्र उद्देश्य अपने खिलाफ चल रहे मामलों को दबाना था. जब वे अपने इस एजेंडे में सफल नहीं हुई, तो उन्होंने समर्थन वापस ले लिया. इसके बदले 1999 में द्रमुक ने वाजपेयी सरकार का साथ दिया. द्रमुक से अलग होने के बाद तमिल मनीला कांग्रेस प्रमुख जीके मूपनार ने तीसरे मोर्चे का गठन किया.

रजनी ने यूं बदला गेम

मुश्किल परिस्थितियों से बचने के अपने कौशल में माहिर रजनीकांत ने राघवेंद्र कल्याण मंडपम् में एक बैठक बुलाई. सारी अटकलों को विराम देते हुए उन्होंने कहा, "उनका राजनीति में उतरने का कोई इरादा नहीं है, क्योंकि सारी पार्टियों में उनके दोस्त हैं. यही उनके फैन रह चुके हैं."

फिल्मों में राजनीतिक डायलॉग बोलने के बारे में उन्होंने कहा, "फिल्मों में उन्होंने केवल वही बोला जो स्क्रिप्ट राइटर ने उन्हें लिख कर दिया. 2001 में जब जयललिता दोबारा सत्ता में आई, तो रजनी ने उनके साथ शांति बनाए रखी. इसके अलावा उन्होंने दो मौकों को छोड़कर, तमिलनाडु से जुड़े मुद्दों पर जनता के सामने कभी जया सरकार की आलोचना नहीं की."

पहली बार

कर्नाटक जब तमिलनाडु के लिए कावेरी का पानी छोड़ने से इनकार करता है, तो उसे विद्युत आपूर्ति रोकने के सांकेतिक विरोध के तौर पर फिल्म निर्देशक भारती राजा ने मार्च निकाला, लेकिन रजनी ने इससे दूरी बनाए रखी और न ही वे इसी मुद्दे पर फिल्म स्टारों द्वारा किए गए अनशन में शामिल हुए. इसके बजाय उन्होंने अलग से उपवास किया.

आख़िर में रजनी ने सिर्फ़ इतना ही कहा कि गंगा और कावेरी नदियों को जोड़ना या प्रायद्वीपीय नदियों को जोड़ना ही इस मसले का समाधान हो सकता है. साथ ही कहा कि अगर केंद्र सरकार इसके लिए कोई योजना शुरू करे, तो वे 1 करोड़ रुपया दान करेंगे.

दशकों पहले जब केएल राव ने ऐसी योजना का प्रस्ताव रखा था, तो इसकी लागत करीब 1,000 करोड़ रुपये अनुमानित की गई थी. लेकिन इन बातों की किसे परवाह है? गौर करने लायक बात रजनीकांत द्वारा उस योजना के लिए दिखाई जा रही उदारता है, जो शायद ही कभी अस्तित्व मेें आए.

दूसरी बार

वीरप्पन ने कहा था कि उसने राजकुमार का अपहरण इसलिए किया, क्योंकि एक समय वह कर्नाटक के मुख्यमंत्री एस. बंगारप्पा का करीबी रहा है. 1991 में जब कावेरी जल प्राधिकरण ने मामले में अंतरिम फैसला दिया था, तब बेंगलुरु और मैसूरू में तमिल दंगे भड़काने में बंगारप्पा का ही हाथ था. उस वक्त राजकुमार को बिना कोई नुकसान पहुंचाए छोड़ने के लिए रजनी ने वीरप्पन के पास जासूस और नक्कीरन के संपादक आर गोपाल को भेजा.

तमिलनाडु लिबरेशन आर्मी और तमिल नेशनल रीट्रिवल फोर्स जैसे तमिल उग्रवादी संगठन उस वक्त वीरप्पन के साथ थे. इन संगठनों ने तब कहा था कि रजनी ने कभी तमिल विरोधी दंगों की आलोचना नहीं की. वे ही रजनीकांत अब राजकुमार के अपहरण से चिंतित हैं क्योंकि उनकी असल चिंता कर्नाटक में उनके निवेश को लेकर है. इन संगठनों ने कई कस्बों में ऐसे पोस्टर लगाए जिनमें कहा गया, "तमिल फैन्स मूर्ख हैं क्योंकि वे रजनीकांत को भगवान का दर्जा देकर उन्हें दूध और बीयर चढ़ाते हैं."

इस तरह की आलोचनाओं से बचने के लिए ही रजनीकांत ने ऐसा बयान दिया है, जो आजकल अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं. उन्होंने कहा बेंगलुरु में मुझे शिवाजी राव, एक मराठी के तौर पर देखा जाता है. मुंबई में मुझे मद्रासी मानकर नकार दिया जाता है और तमिलनाडु में मुझे कन्नड़ माना जाता है.

स्टार होने का फायदा

तमिलनाडु में जिस तरह से फिल्म स्टारों को पूजा जाता है. यह आम धारणा बन चुकी है कि तमिल स्टारों के पीछे पागल हैं और उनके लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. एमजीआर और जयललिता इसके जीते-जागते उदाहरण हैं.

तमिलों को स्वीकारना होगा कि एमजीआर केवल एक ही हो सकते हैं और वे फिल्म जगत में 50 साल गुजारने के बाद वे लोकप्रियता के उस मुकाम पर पहुंचे थे. साथ ही वे पहले द्रमुक के साथ लंबे अरसे तक जुड़े रहे और उसके बाद अपनी अलग पार्टी अन्नाद्रमुक के भी प्रमुख रहे.

इसके बाद केवल एनटीआर ही ऐसे नेता थे जो एमजीआर की लोकप्रियता के स्तर को छू सके. परन्तु उनका राजनीतिक जीवन काफी छोटा रहा. उनके दामाद एन चंद्रबाबू नायडू ने ही उनका राजनीतिक करियर खत्म किया.

रजनीकांत एमजीआर और एनटीआर की तरह लोकप्रिय हो सकते हैं, लेकिन वे एमजीआर की तरह गरीब समर्थक नहीं हैं, जो कि उनकी लोकप्रियता की खास वजह थी. 

(दक्षिण की राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले विश्लेषक एस मुरारी का लेख)

First published: 19 May 2017, 10:45 IST
 
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