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जब एक हवलदार की मदद से अशोक गहलोत ने कांग्रेस के मुख्यमंत्री का किया था काम तमाम

कैच ब्यूरो | Updated on: 13 July 2020, 18:22 IST

Ashok Gehlot vs Sachin Pilot Rajasthan Political Crisis: राजस्थान के सियासी ड्रामे में एक बार फिर 'जागूदर' अशोक गहलोत का जादू चलता हुआ दिखाई दे रहा है. एक तरफ राज्य के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट दावा कर रहे हो कि उनके पास 30 विधायक है, दूसरी तरफ अशोक गहलोत ने मुख्यमंत्री निवास में मीडिया के सामने शाक्ति प्रदर्शन कर दिखा दिया कि उनकी सरकार बहुमत में हैं. हालांकि, अभी तस्वीर पूरी तरह से साफ है, ऐसा भी नहीं है. लेकिन इस सियासी घटनाक्रम में अशोक गहलोत ने एक बार फिर अपने आप को साबित करके दिखाया है.

जादूगर अशोक गहलोत

अशोक गहलोत के पिता बाबू लक्ष्मण सिंह गहलोत देश के एक जाने माने जादूगर थे, और गहलोत अपने पिता के साथ रहे और उन्होंने भी काफी समय तक यह काम किया. हालांकि, गहलोत जब कॉलेज में थे को उन्होंने राजनीति में कदम रखा और उन्होंने छात्रसंघ का चुनाव लड़ा और चर्चा में आए. हालांकि, इस दौरान अशोक गहलोत समाजसेवा भी करते रहे.

 

गांधी परिवार के करीब हुए


अशोक गहलोत पहली बार इंदिरा गांधी के नजर में साल 1971 में आए थे जब वो पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश के आए प्रवासियों के लिए बने रिफ्यूजी कैंप में काम कर रहे थे. इस दौरान इंदिरा गांधी ने उनके कौशल को देखकर उन्हें राजनीति में आने का ऑफर दिया. इंदिरा गांधी के प्रस्ताव पर अशोक गहलोत राजनीति में आए थे और फिर वो गांधी परिवार के करीबियों में से एक हो गए.

अशोक गहलोत ने जब राजनीति में कदम रखा तो वो कहां पर वो काफी सफल हुए. साल 1974 में राजस्थान NSUIके अध्यक्ष बने. इसके बाद साल 1982 में राजस्थान कांग्रेस प्रदेश कमेटी के जनरल सेक्रेटरी बने. साल 1982 तक अशोक गहलोत गांधी परिवार के कितने करीब थे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 1980 में लोकसभा का चुनाव लड़ा था और महज 31 साल की उम्र में वो केंद्र सरकार में मंत्री बने. साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अशोक गहलोत राजीव गांधी के करीब आए और उनके मंत्रीमण्डल में जगह पाई.

साल 1985 में राजस्थान में विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस को उसमें जीत मिली और हरिदेव जोशी मुख्यमंत्री बने. अशोक गहलोत यहीं से राजनीति के ऐसे जादूगर बने की उन्होंने एक एक करके कांग्रेस के नेताओं को पहले रास्ते से हाटया और फिर खुद मुख्यमंत्री बने.

दरअसल, राजीव गांधी चाहते थे कि राजस्थान में उनकी पकड़ मजबूत हो और इसीलिए उन्होंने दिल्ली से अशोक गहलोत को दिल्ली भेजा. अशोक गहलोत के पास राजस्थान कांग्रेस की कमान थी और राज्य में नेताओं की नई लीडरशिप तैयार करने की जिम्मेदारी भी.अशोक गहलोत धीरे धीरे राज्य के युवा नेताओं को अपनी तरफ करने में कामयाब हुए.

 

 

हवलदार के दम पर मुख्यमंत्री को हटाया

साल 1988 में दिसंबर में सरिस्का में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक हुई थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ओर से केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक की जा रही थी और ऐसा पहली बार था जब केंद्रीय केबिनेट की बैठक पहली बार उस समय दिल्ली से बाहर सरिस्का में हुई थी. उस दौरान राजस्थान में सूखा पड़ा था ऐसे में सरकार की आलोचना हो रही थी. लेकिन राजीव गांधी ने सख्त आदेश देते हुए कहा था कि कोई भी सरकारी अमला इसमें शामिल नहीं होगा, बकायदा इसकी जानकारी राज्य के मुख्यमंत्री को दे दी गई थी.

राजीव गांधी खुद अपनी एसयूवी से इस मीटिंग में पहुंचे थे, लेकिन जैसे ही वो मीटिंग वाले चौराहे पर पहुंचे एक हवलदार ने उन्हें बाएं मुड़ने का इशारा किया. राजवी गांधी ने अपनी गाड़ी बाएं मोड़ दी और उन्होंने वहां जो देखा उससे वो आग बबूला हो गए थे. दरअसल, वहां उन्होंने गाड़ियों का लंबा-चौड़ा कारवां है, अफसरों की भीड़भाड़ है, वे पार्क की गई गाड़ियों के पास पहुंचे और उन्होंने ड्राइवरों से बातचीत की और यह जाना कि ये कारें कितने किलोमीटर चलीं. कब आईं? कहां से आई हैं? राजीव गांधी इस तामझाम को देखकर तमतमा उठे.

कहा जाता है कि इस दौरान उन्होंने सभी के सामने मुख्यमंत्री को जमकर फटकार लगाई थी. इस घटना के एक महीने के बाद हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था. कहा जाता है कि अशोक गहलोत ने ही उस हवलदार को जानबूझकर वहां पर खड़ा किया था और उसे साफ तौर पर राजीव गांधी की गाड़ी को उस स्थान तक पहुंचने के निर्देश दिए गए थे.

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First published: 13 July 2020, 15:52 IST
 
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