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ये है आर्टिकल 370 के विरोध का RSS का इतिहास, अब पूरा हुआ सपना

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 August 2019, 12:29 IST

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन प्रमुख मुद्दों में से एक रहा है. जबकि दो अन्य मुद्दे कॉमन सिविल कोड और राम मंदिर थे है. मोदी सरकार द्वारा 370 को हटाने के बाद RSS सरसंघचालक मोहन भागवत ने इसे साहसी कदम बताया. आरएसएस हमेशा मानता रहा है कि अनुच्छेद 370 भारत से कश्मीर को तोड़ने का एक प्रावधान है. RSS जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 370 को हटाने को लेकर 51 से ज्यादा प्रस्ताव पास कर चुका है.

जम्मू कश्मीर पर संघ का पहला प्रस्ताव RSS की KKM की एक बैठक में 1952 पारित किया गया था जिसमें उसने पाक-अमेरिकी समझौता की निंदा की थी. इसके बाद 1953 में दिवंगत भारतीय जनसंघ के नेता बलराज मधोक द्वारा गठित एक संगठन जेएंडके प्रजा परिषद ने एबीपीएस में एक प्रस्ताव के माध्यम से पूर्ण एकीकरण के लिए आंदोलन शुरू किया. बाद में भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे का विरोध कर रहे थे, 23 जून, 1953 को श्रीनगर जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में मारे गए.

 

अनुच्छेद 370 के खिलाफ अपने आखिरी आंदोलन के दौरान, जनसंघ का मुख्य नारा था "एक देश में दो विधान दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेगा''. 1964 में एबीपीएस ने कश्मीर नीति पर एक संकल्प जारी किया जिसमे कहा गया था कि "अनुच्छेद 370, जिसे हमारे संविधान में कश्मीर पर एक अस्थायी प्रावधान के रूप में शामिल किया गया था, को तत्काल निरस्त किया जाना चाहिए और राज्य अन्य राज्यों के अनुरूप लाया जाना चाहिए.

1982 में J & K सरकार ने एक पुनर्वास विधेयक पारित किया, जिसमें उन सभी कश्मीरी मुसलमानों को सक्षम करने की मांग की गई जो कश्मीर लौटने और भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए पाकिस्तान चले गए थे. उसके बाद आरएसएस के एबीकेएम ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमे इसका विरोध किया गया था. 2002 में आरएसएस के एबीकेएम ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया था कि जम्मू के लोगों को लगता है कि उनकी समस्याओं का हल जम्मू क्षेत्र के लिए अलग राज्य में है.

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First published: 6 August 2019, 12:26 IST
 
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