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'नमो राज' के तीन साल और तीन सबसे बड़ी नाकामियां

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 May 2017, 14:47 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल का तीन साल पूरा कर चुके हैं और इस मौक़े पर उनसे तरह-तरह के सवाल किए जा रहे हैं. 16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के नतीजे 16 मई 2014 को आए थे. नतीजों में भारतीय जनता पार्टी की भारी मतों से जीत हुई थी और नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में 26 मई 2014 को शपथ ली थी.

नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार में कई लोक लुभावन वादे किए थे. तीन साल गुज़र जाने के बाद अब उन वादों का हिसाब मांगा जा रहा है. सबसे ज़्यादा सवाल नौकरी और रोज़गार को लेकर है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के वायदे और उसकी ज़मीनी हक़ीक़त का दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है.

नौकरी

नौकरी के मुद्दे पर मोदी सरकार बुरी तरह फेल साबित हुई है. तीन साल पूरा होने के मौक़े पर ट्वीटर यूज़र्स ने हैशटैग '#अच्छे दिन नौकरी बिन' ट्रेंड कराया. आम चुनाव की रैलियों में प्रचार करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा था कि अगर वो सत्ता में आते हैं तो हर साल 2 करोड़ नौकरियां मुहैया कराएंगे.

मगर श्रम विभाग के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि पिछली सरकार के मुकाबले मोदी सरकार में रोज़गार की दर घटी है. श्रम मंत्रालय के 'लेबर ब्यूरो' के मुताबिक नए रोज़गार पैदा होने में 84 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. 2009-2010 में जहां 8 लाख 70 हज़ार नए लोगों को रोज़गार मिला था, वहीं 2016 में सिर्फ़ 1 लाख 35 हज़ार नए रोज़गार का सृजन हुआ. इन आंकड़ों को अगर सही माना जाए तो मोदी सरकार रोज़गार देने के मोर्चे पर बुरी तरह नाकाम साबित हुई है.

 

कश्मीर मुद्दा

केंद्र में मोदी और जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी की सरकार बनने के बाद यहां के हालात बदतर हुए हैं. पिछले साल हिजबुल कमांडर बुरहानी वानी की हत्या के बाद राज्य में आया उबाल 8-9 महीने तक चला. इस दौरान बड़ी संख्या में कश्मीरी सेना की गोलियों का शिकार हुए. दूसरी तरफ पाकिस्तानी घुसपैठ के बाद आतंकी हमलों में भारतीय सेना के जवान भी बड़ी संख्या में मारे गए.

कश्मीर में हाल ही में हुए उपचुनाव में जिस तरह कश्मीरी अपने घरों से निकलकर आए और इसका विरोध किया, उससे ऐसा लगता है कि मोदी सरकार से नाराज़गी आमजन में घर कर गई है और लगातार तनाव की स्थिति बनी हुई है.

आम तौर पर केंद्र में जो भी सरकार आती है, वो कश्मीर में कुछ सकारात्मक काम करती है. चाहे नियंत्रण रेखा पर आवागमन खोलना हो, सीमा पार व्यापार की इजाज़त देनी हो या पाकिस्तान से बातचीत की पहल करनी हो मगर मोदी सरकार ने ऐसी कोई पहल नहीं की.

किसान

किसानों की ख़ुदकुशी और कर्ज़माफ़ी के मोर्चे पर भी मोदी सरकार बुरी तरह विफ़ल साबित हुई. यूपीए सरकार में किसानों से जुड़े ये दोनों मुद्दे छाए रहते थे. माना जा रहा था कि मोदी सरकार के आने पर किसानों की दशा बदलेगी लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा. ना ख़ुदकुशी थमी और ना ही कर्ज़माफ़ी के कुचक्र से मुक्ति मिली.

साल 2014 और 2015 किसान और खेतिहर मजदूर की आत्महत्या के मामले 12,360 से बढ़कर 12,602 हो गये हैं. इन दो सालों में किसान आत्महत्याओं के मामले में 41 फीसदी का इजाफा हुआ है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट-भाषण में छोटे और सीमांत किसानों का जिक्र ज़रूर किया था, लेकिन यही कि छोटे और सीमांत किसानों को कर्ज देने के लिए कोशिश की जाएगी. मगर कर्जमाफी के मोर्चे पर ऐसा कोई एलान नहीं हुआ.

First published: 26 May 2017, 14:47 IST
 
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