Home » राजनीति » Today george fernandes birthday
 

जब जॉर्ज के इशारे पर पूरे देश में थम गई थी रेल की रफ्तार

कैच ब्यूरो | Updated on: 3 June 2017, 12:25 IST
george fernandes

भारत के पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने पूरे जीवन मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया. जॉर्ज फर्नांडिस एक पूर्व ट्रेड यूनियन नेता, राजनेता, पत्रकार भी रहे हैं.

उनका जन्म 3 जून 1930 को कर्नाटक के मैंगलोर में हुआ था. वे पहे जनता पार्टी और बाद में बने जनता दल के प्रमुख रहे. जनता दल से अलग होकर उन्होंने समता पार्टी की स्थापना की, जो आज की जनता दल (यूनाइटेड) है. जिसके नेता नीतीश कुमार बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं.

उन्होंने मोरार जी की जनता पार्टी और पूर्व पीएम अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में संचार, उद्योग, रेलवे और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी बखूबी संभाली. जॉर्ज के माता-पिता ने उन्हें धर्म की शिक्षा के लिए बैंगलोर भेजा था पर वे बॉम्बे चले गए और वहां जाकर एक तेज़-तर्रार व्यापार संघ नेता के रूप में उभरे.

सन 1950 और 60 के दशक में बॉम्बे में उन्होंने कई हड़तालों का नेतृत्व किया. इन सब में सबसे महत्वपूर्ण हड़ताल थी सन 1974 की ‘रेलवे हड़ताल’.

सन 1975 में उन्होंने आपातकाल के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ललकारा था और फिर भूमिगत हो गए. सन 1977 में उद्योग मंत्री के तौर पर उन्होंने गलत ढंग से कार्य करने के लिए विदेशी कंपनी आई.बी.एम. और कोका कोला को देश छोड़ने का निर्देश दे दिया था.

प्रारंभिक जीवन

जॉर्ज फर्नांडिस का जन्म जॉन जोसफ फर्नांडिस और एलीस मार्था फर्नांडिस के यहां मैंगलोर में 3 जून 1930 को हुआ. उनकी मां किंग जॉर्ज पंचम की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं, जिनका जन्म भी 3 जून को हुआ था. इस कारण उन्होंने इनका नाम जॉर्ज रखा.

उन्होंने अपना सेकंडरी स्कूल सर्टिफिकेट मैंगलोर के एलॉयसिस से पूरा किया. स्कूल की पढ़ाई के बाद परिवार की रूढ़िवादी परंपरा के चलते बड़े पुत्र होने के नाते उन्हें धर्म की शिक्षा के लिए बैंगलोर में सेंट पीटर सेमिनेरी भेज दिया गया. 16 वर्ष की उम्र में उन्हें 1946-1948 तक रोमन कैथोलिक पादरी का प्रशिक्षण दिया गया.

19 वर्ष की आयु में उन्होंने हताशा के कारण धार्मिक विद्यालय छोड़ दिया, क्योंकि स्कूल में फादर्स उंची टेबलों पर बैठकर अच्छा भोजन करते थे, जबकि प्रशिक्षणार्थियों को ऐसी सुविधा नहीं मिलती थी. उन्होंने इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई.

उन्होंने 19 वर्ष की आयु में  ही काम करना शुरू कर दिया. उन्होंने मैंगलोर के सड़क परिवहन उद्योग, रेस्टोरेंट और होटल में कार्यरत श्रमिकों को एकजुट किया.

राजनीतिक सफर

1949 में बैंगलोर छोड़ने के बाद जॉर्ज नौकरी की तलाश में बॉम्बे आ गए. यहां उन्हें एक अखबार में प्रूफ रीडर की नौकरी मिल गई. यहां उनका संपर्क अनुभवी यूनियन नेता प्लासिड डी मेलो और समाजवादी राममनोहर लोहिया से हुआ, जिनका उनके जीवन पर बड़ा प्रभाव रहा.

उसके बाद वह समाजवादी व्यापार संघ आंदोलन से जुड़ गए. इसके बाद वह व्यापार संघ के प्रमुख नेता के रूप में उभरे और छोटे पैमाने के उद्योगों जैसे होटल और रेस्टोरेंट में काम करने वाले श्रमिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया. 1961 से 1968 तक बॉम्बे नगर निगम के सदस्य रहे.

इस दौरान वे शोषित कामगारों की आवाज को महानगर की प्रतिनिधत्व संस्था के साथ उठाते रहे. सन 1967 के आम चुनाव में फर्नांडिस ने मैदान में उतरने का निर्णय लिया. उन्हें बॉम्बे की दक्षिण संसदीय सीट से समयुक्त सामाजिक पार्टी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उस दौर के प्रसिद्ध नेता सदाशिव कानोजी के खिलाफ मैदान में उतारा.

जॉर्ज फर्नांडिस 1967 का चुनाव जीतकर पहली बार संसद पहुंचे. ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन का अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने 1974 में लाखों कामगारों के साथ हड़ताल कर दी, इस कारण हजारों को जेल में डाल दिया गया. फर्नांडिस ने जनता दल के विघटन के बाद 1994 में समता पार्टी की स्थापना की.

प्रधानमंत्री वाजपेयी के मंत्रिमंडल में वह एकमात्र ईसाई थे और संचार, उद्योग, रेलवे तथा रक्षा विभागों के मंत्री रहे. मार्च 2001 में तहलका रक्षा घोटाला सामने आने के बाद जॉर्ज फर्नांडिस ने इस गड़बड़ी की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि आठ माह से भी कम समय में गलती स्पष्ट होने पर उन्हें उसी पद पर पुनः नियुक्त कर दिया गया.

भारतीय राजनीति में जॉर्ज का योगदान

भारतीय राजनीति में जॉर्ज का अहम योगदान रहा. उनके प्रमुख योगदान में राज्यसभा में किए गए उनके कार्य और भारत के समाजवादी आंदोलन में दी गईं सेवाएं हैं.

जनता दल के संस्थापक सदस्य, लोकसभा के सदस्य, रेलवे और रक्षा मंत्री और एनडीए के संयोजक के तौर पर जॉर्ज फर्नांडिस भारतीय राजनीति में बहुत ही अहम शख्सियत रहे हैं.

पिछले कुछ सालों से जॉर्ज फर्नांडिस बीमारी से जूझ रहे हैं जिसके कारण राजनीति से उनका नाता टूट गया है. वे पर्किन्संस और अल्जाइमर रोग से पीड़ित हैं और आज उन्हें यह भी याद नहीं कि वो एक समय भारतीय राजनीति के मील के पत्थर रहे हैं.

First published: 3 June 2017, 12:25 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी