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उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत से भी राज्यसभा में शक्ति संतुलन नहीं बदलेगा

चारू कार्तिकेय | Updated on: 15 March 2017, 7:41 IST

आम तौर पर लगाए जा रहे कयासों के विपरीत भाजपा को पांच राज्यों में मिली शानदार जीत राज्यसभा में उसके प्रतिनिधित्व में कोई खास बदलाव लाने वाली नहीं है.

ऊपरी सदन में एनडीए सांसदों की संख्या सदन की कुल संख्या के आधे से 44 कम है और 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले वह राज्यसभा में केवल 13 सीटें और बढ़ा सकता है.

आइए एक नजर डालें राज्यसभा के मौजूदा गणित पर:

सदन का आधा संख्या बल यानी कि 123 सीटें पाने के लिए एनडीए को 44 और सीटें चाहिए. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले जिन 13 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होना है, उनमें से 10 उत्तर प्रदेश में हैं, एक मणिपुर, एक उत्तराखंड और एक सीट गोवा में है. अब चूंकि भाजपा गोवा और मणिपुर विधानसभाओं में फौरी तौर पर कांग्रेस से बंधी हुई है. इसलिए वह राज्यसभा में उनकी दो सीटें तो छोड़ेगी ही. उस सूरत में भाजपा के पास मात्र 11 सीटें ही बचती हैं.

मणिपुर सीट तो खाली है ही लेकिन गोवा की सीट कांग्रेस के पास है और इस वर्ष जुलाई तक यथास्थिति बनी रहेगी. उत्तराखंड में तीन सीटें राज्यसभा की हैं और तीनों ही कांग्रेस के पास हैं. एक सीट मई 2018 में खाली होगी लेकिन बाकी दो सीटें मई 2022 तक खाली होने वाली नहीं हैं.

इसी प्रकार पंजाब की सात राज्यसभा सीटों पर भी 2022 के अप्रैल-जुलाई तक चुनाव होने के कोई आसार नहीं हैं. इनमें से एक सीट भाजपा के पास है और उसकी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के पास तीन सीटें हैं जबकि बाकी सीटें
कांग्रेस की हैं.

अब केवल यूपी ही रह जाता है, जिसके बल पर भाजपा राज्यसभा में वर्चस्व बढ़ा सकती है. यूपी की राज्यसभा में 31 सीटें हैं. इनमें से 10 सीटों पर अप्रैल 2018 में चुनाव होने हैं. 10 सीटों पर नवम्बर 2020 में चुनाव होगा और 11 पर जुलाई 2022 में. जिन सांसदों के भविष्य का फैसला 2018 में होना है, वे हैं- सपा के नरेश अग्रवाल, जया बच्चन, किरणमय नंदा, चौधरी मुनव्वर सलीम, आलोक तिवारी और दर्शन सिंह यादव. बसपा की मायावती, मुनकाद अली और कांग्रेस के प्रमोद तिवारी तथा भाजपा के विनय कटियार.

विधानसभा चुनावों में विपक्षी दलों के पास कुल 78 सीटें हैं. इसलिए भाजपा के लिए राज्यसभा में यूपी की सारी 10 सीटें जीतना इतना भी आसान नहीं होगा. कुल मिलाकर भाजपा पांचों राज्यों में मिलाकर अधिकतम नौ सीटें जीत सकती है. इतने पर भी एनडीए गठबंधन के लिए बहुमत पाने में 35 सीटें कम रहेंगी.

इन पांच राज्यों के अलावा 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले 67 राज्यसभा सीटें खाली होंगी. इनमें 11 पश्चिम बंगाल की, 7 गुजरात की, 6 बिहार की व चार-चार सीटें कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में हैं. साथ ही तीन-तीन सीटें केरल, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, दिल्ली व तेलंगाना की हैं. एक-एक सीट हरियाणा, सिक्किम और हिमाचल प्रदेश की हैं. इसी अवधि में चार मनोनीत सदस्यों का भी कार्यकाल समाप्त होने को है. भाजपा के पास इनमें से 18 सीटें हैं. बाकी 30 सीटें गैर भाजपा शासित राज्यों की हैं.

इस प्रकार एनडीए को 20 सीटों पर चुनाव लड़ना होगा. इसका मतलब हुआ कि 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार का कार्यकाल समाप्त होने से पहले एनडीए शायद ही राज्यसभा में बहुमत पा सके. हाल ही में आए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों का केंद्र पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. बल्कि राज्यसभा का पुनर्गठन होने से राष्ट्रपति व
उपराष्ट्रपति चुनाव जरूर प्रभावित हो सकते हैं.

राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ने वाला प्रभाव

तेलंगाना की टीआरएस हालांकि एनडीए गठबंधन का हिस्सा नहीं है लेकिन ज्यादातर मुद्दों पर यह एनडीए को समर्थन देती है. यह अन्नाद्रमुक और बीजद की ही लाइन पर चलते हुए एनडीए को समर्थन देगी, जिन्होंने भाजपा के साथ मतभेदों के बावजूद उसे मुद्दों पर आधारित समर्थन दिया. ये तीनों ही दल 25 जुलाई 2017 से पहले होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मोदी सरकार को समर्थन देंगे.

राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव संविधान के अनुच्छेद 55 में बताए गए आनुपातिक प्रतिनिधित्व के फार्मूले पर आधारित जटिल प्रक्रिया के तहत होता है. इसके अनुसार, दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों, सभी राज्यों की विधानसभा में निर्वाचित विधायकों तथा दिल्ली व पांडिच्चेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों के वोट राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं.

2017 तक की स्थिति के अनुसार, ये मतदाता हैं- 776 सांसद और 4,120 विधायक. हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों के बाद जो तस्वीर उभरती है, वह इस प्रकार है- कुल विधायकों में से 423 सांसद और 1650 विधायक एनडीए के हैं. उस पर टीआरएस, अन्नाद्रमुक और बीजद का साथ मिलने से एनडीए इस स्थिति में रहेगा कि वह अपने उम्मीदवार को राष्ट्रपति निर्वाचित करवा सके.

उपराष्ट्रपति चुनाव

उपराष्ट्रपति पद पर 10 अगस्त 2017 तक चुनाव होने हैं. उपराष्ट्रपति पद का चुनाव संसद के दोनों सदनों के प्रतिनिधियों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर होता है. लोकसभा में बहुमत में होने के चलते एनडीए बड़ी ही आसानी से अपने उम्मीदवार को इस सीट पर निर्वाचित करवा लेगा. इस बीच, राज्यसभा में इसके सांसदों की संख्या बढ़ना इसकी स्थिति को और मजबूत करेगा.

First published: 15 March 2017, 7:41 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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