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इन मुख्यमंत्रियों की शिक़ायतें हम क्यों नहीं सुनना चाहते?

शाहनवाज़ आलम | Updated on: 15 May 2017, 12:47 IST

पिछले दिनों देश के दो विपरीत छोर के राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने ‘भारत’ से गम्भीर शिकायतें कीं. जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राष्ट्रीय मीडिया से अपील की कि वे टीवी पर ऐसी बहसें न दिखाएं जिससे कश्मीर के लोगों के प्रति देश में नफरत फैले.

वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालथन हावला ने एक इंटरव्यू में कहा कि वे खुद कई बार नस्लीय हिंसा का शिकार हुए हैं. एक बार उनसे एक आदमी ने यहां तक कह दिया था कि आप ‘भारतीय’ नहीं लगते. लालथन हावला ने इस तरह की टिप्पणी करने वालों को ‘सुपीरियर मेंटेलिटी’ से ग्रस्त बताया है जो देश को ठीक से नहीं जानते.

दोनों मुख्यमंत्री ऐसे राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं जहां सेना को आफ्सपा के तहत छूट हासिल है और जहां दिल्ली के खिलाफ जनभावनाओं का पुराना इतिहास रहा है. इसलिए, इन दोनों ही नेताओं के बयान एक हद तक उन राज्यों की अवाम की साझी शिकायतें मानी जा सकती हैं, जिसमें सामरिकता का पहलू भी स्वतः जुड़ जाता है.

चूंकि शिकायत करने वाली दोनों की रियासतें भारतीय राष्ट्र राज्य के ऐसे राज्य हैं, जिनमें से एक मुस्लिम बहुल है तो वहीं दूसरा उस पूर्वात्तर का हिस्सा है जहां ‘मेनलैंड भारत’ के आर्य नस्ल के बजाए मंगोलियाई नस्ल के लोग रहते हैं. इसलिए ये शिकायतें ‘भारत’ पर साम्प्रदायिक और नस्लीय होने के आरोप में भी बदल जाती हैं.

इस नज़रिए से इन दोनों मुख्यमंत्रियों की शिकायतें हमारी ‘राष्ट्र’ की समझ और उसको सुदृढ़ करने की हमारी नीतिगत दिशा पर भी सवाल खड़े करती हैं. खास कर तब जब हम संविधान निर्माता डॉक्टर अम्बेडकर द्वारा अपने संसदीय सम्बोधनों में भारत को एक ‘बनता हुआ राष्ट्र’ (नेशन इन मेकिंग) कह कर सम्बोधित करने की रोशनी में इन सवालों को देखते हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम 70 साल बाद भी राष्ट्र नहीं बन पाए हैं और क्या जब हम वो कर रहे होते हैं जो कश्मीर की मुख्यमंत्री हमसे नहीं चाहतीं या हम जब मिजोरम के मुख्यमंत्री की मंशा के विपरीत नस्लीय व्यवहार कर रहे होते हैं, तब वास्तव में हम किस तरह के भारतीय राष्ट्र राज्य का निर्माण कर रहे होते हैं?

पूर्वोत्तरवासी आदमखोर?

दरअसल, आधुनिकता मूल्यों की समझ पर आधारित नागरिकीय बोध और परस्पर सम्मान के प्रति भारतीय समाज खास कर उसके उत्तर भारतीय हिस्से में शुरू से ही एक दिक्कत तलब समझदारी रही है. मसलन यूपी और बिहार जैसे हिंदी भाषी राज्यों जो राष्ट्रीय राजनीति को सिर्फ सबसे ज्यादा प्रभावित ही नहीं करते, बल्कि जो उसे एक सवर्ण हिंदू चरित्र भी प्रदान करता है.

गांवों में अब भी ऐसे लोगों की बड़ी तादाद मौजूद है जो यकीन करती है कि पूर्वोत्तर खास कर नागालैंड के लोग आदमखोर होते हैं और वो अपने बूढ़े और बीमार लोगों को मार कर खा जाते हैं. यह एक ऐसी अज्ञानता आधारित सर्वसुलभ जानकारी है, जिसके इर्द-गिर्द बहुत सारी कहानियां प्रचलित हैं. जिसे सुनने वाले मन में नागालैंड के लोगों के प्रति स्वाभाविक रूप से नफरत पाई जाएगी.

जाहिर है यह अज्ञानता एक ऐसा मानस तैयार करती है जो पूर्वोत्तर की किसी भी राजनीतिक समस्या के समाधान के विकल्प के तौर पर बातचीत के बजाए हिंसा को तरजीह देगी. क्योंकि उसकी समझ होती है कि पूर्वोत्तर के हिंसक और आदमखोर लोगों को बातचीत से नहीं समझाया जा सकता और उनसे किसी भी तरह की सहानुभूति तो रखी ही नहीं जानी चाहिए.

उदासीनता

मणिपुर या पूरे पूर्वोत्तर में महिलाओं के साथ सेना के जवानों द्वारा कथित बलात्कार या फर्जी मुठभेड़ों के सवाल पर हम हिंदी भाषी समाजों के उदासीन रवैये में इसे देख सकते हैं. इसकी एक दूसरी वजह जो उन्हें और दूर कर देता है, वो है उत्तर भारतीय जनमानस में भारत के एक आर्य नस्लीय राज्य होने का भ्रम जिसका स्रोत लोकप्रिय हिंदू धार्मिक साहित्य है, जिसमें नायक को आर्यपुत्र कहकर सम्बोधित किया जाता है.

इससे उपजी समझदारी के असर में रहने वाला यह भूल जाता है कि भारत दुनिया के तीन महान नस्लों के लोगों की रिहाइशगाह है. इसीलिए लालथन हावला जब भाजपा नेता तरुण विजय की उस टिप्पणी पर कि दक्षिण भारतीय लोग काले होते हैं, अपने इंटरव्यू में कहते हैं कि ऐसा कहने वाले यह नहीं जानते कि भारत के दक्षिणी हिस्से में द्रविड़, उत्तरी हिस्से में आर्य और पूर्वोत्तर भारत में मंगोलियाई नस्ल के लोग रहते हैं, तब वो हमारी कथित मुख्यधारा की भारत की सांस्कृतिक समझ पर सवाल उठा रहे होते हैं.

यहां यह याद रखना भी जरूरी होगा कि संघ परिवार पूर्वोत्तर को भारतीय प्राचीनता से महाभारत के इस प्रसंग से जुड़ा बताता है कि अर्जुन की कई पत्नियों में से एक उलुपी नागा राजकुमारी थीं. लेकिन सवाल है कि क्या मिथकीय रिश्तों के भरोसे आधुनिक राजनीतिक चेतना से उभरे सवालों के हल को छोड़ा जा सकता है?

कश्मीरी दुश्मन?

उसी तरह हर उत्तर भारतीय चट्टी-चौराहे पर हम कश्मीर विशेषज्ञ लोगों की भीड़ देख सकते हैं, जो इस मुद्दे का सैनिक हल बता रहे होंगे. भले ही इस जटिल मुद्दे की समझ उनमें न हो. सबसे अहम कि ठोस ऐतिहासिक घटनाक्रमों के बजाए उसकी यह राय पॉपुलर फिल्मों और पॉपुलर मीडिया से निर्मित है, जो उन्हें इस मुद्दे के राजनीतिक पहलू को समझाने के बजाए उसे बिना किसी पृष्ठभूमि के स्वतः पैदा हुई समस्या के बतौर दिखाता है, जिसमें सिर्फ दोनों तरफ से बंदूकें चल रही हैं. जिसमें कश्मीरी अवाम हमें दुश्मन लगती है.

ये बहसें एक ऐसी हिंसक भीड़ का निर्माण कर रही हैं, जो कश्मीर का हल सिर्फ जान लेने और जान देने में देखता है. उसे यह याद दिलाना किसी के लिए भी इस अज्ञानता से उपजी हिंसक कार्रवाई को न्योता देना है कि कश्मीर भारत का उस तरह से हिस्सा नहीं है जिस तरह यूपी या बिहार है. या खुद आईपीसी भारत को परिभाषित करते हुए स्पष्ट तौर पर कहता है कि 'भारत' से जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाए भारत का राज्यक्षेत्र अभिप्रेरित है."

इसीलिए जब महबूबा मुफ्ती यह अपील करती हैं कि भारतीय मीडिया ऐसी बहसें न दिखाए जिससे कि कश्मीरी अवाम के प्रति भारतीय अवाम में नफरत का संचार हो, तब वो दरअसल इस मुद्दे के राजनीतिक हल में बाधा बन रही इस सैन्य मानसिकता को रोकने की गुजारिश कर रही हैं. जिसे अनसुना किया जाना कश्मीर मुद्दे के जटिल होने की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही है.

लेकिन सवाल है कि जब मीडिया बहुत हद तक सरकारों की नीतियों की प्रवक्ता हो और समाज में भी सरकार से अलग सोचने की प्रवृत्ति तेजी से समाप्त हो रही हो, तब यह कैसे माना जा सकता है कि कश्मीर और पूर्वोत्तर के प्रति हमारी समझ सरकार की योजना के अनुसार नहीं बनाई जा रही है?

नीति पर सवाल

इसीलिए ये दोनों बयान दिल्ली के कश्मीर और पूर्वोत्तर नीति पर भी सवाल हैं, जो लगातार सैन्य नजरिए से चीजों को देखने की आदत अवाम से डलवा रही है. इसीलिए कश्मीर मुद्दे पर 2010 में आई पडगांवकर कमेटी की रिपोर्ट या पूर्वोत्तर के लोगों के साथ होने वाली हिंसा पर 2014 में आई बेजबरूआ कमेटी की रिपोर्ट पर हमने मीडिया में कहां कोई बहस सुनी?

दरअसल सच्चाई तो यह है कि भले हमने अपनी सीमा पर चार बड़े युद्ध लड़े हों, लेकिन उससे कहीं ज्यादा अघोषित सांस्कृतिक और नस्लीय युद्ध हम अपने नागरिक समूहों से लड़ते रहे हैं. जो एक राष्ट्र के बतौर हमारे 70 साल में भी नहीं गठित हो पाने की सबसे बड़ी वजह है. इसीलिए महबूबा मुफ्ती या लालथन हावला के बयानों को सिर्फ उनके राज्यों के लोगों की पीड़ा के बजाए भारत के अपने सबसे अहम राष्ट्रीय लक्ष्य ‘बनते हुए राष्ट्र’ से एक मुकम्मल ‘राष्ट्र’ बनने में विफल हो जाने की शर्मनाक सच्चाई के बतौर स्वीकार किया जाना चाहिए.

First published: 15 May 2017, 12:47 IST
 
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