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'सबका साथ सबका विकास' एक गलत सोच, एक गलत नारा है

चारू कार्तिकेय | Updated on: 8 March 2017, 11:07 IST

2002 के गोधरा कांड के बाद अपनी सरकार को दोषी ठहराए जाने से बचाने के प्रयास में गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए नरेंद्र मोदी गाहे-बगाहे ‘सबका साथ सबका विकास’ की बात दोहराते थे. और आज यह जुमला प्रधानमंत्री मोदी का लोकप्रिय नारा बन चुका है. 12 साल तक इस नारे को कुशलतापूर्वक आजमाने के बाद मोदी ने इसे गुजरात के बाहर 2014 के आम चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर भी जमकर इस्तेमाल किया.

अब तीन साल बाद यह नारा उत्तर प्रदेश की चुनावी फिजां में फिर से गूंजता सुनाई दे रहा है. बस, इस बार मोदी ने इस एक और ट्विस्ट दे दिया है. 4 मार्च को जौनपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि वे जहां ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करते हैं, वहीं राज्य में उनकी प्रतिद्वंदी पार्टियां ‘कुछ का साथ, कुछ का विकास’ के सिद्धान्त में विश्वास करती हैं.

भारत की सोच से दूर

प्रधानमंत्री का इशारा साफ-साफ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की ओर था. वे अपने परम्परागत अंदाज में इन दोनों पार्टियों को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति अपनाने का दोषी ठहरा रहे थे. यह पैंतरा भी मोदी गुजरात के अपने जमाने से ही अपनाए हुए हैं. गुजरात में अपने मुख्यमंत्रित्व काल में मोदी ‘सबका साथ’ का नारा लेकर चलते रहे. इसके जरिये वे यह कहने की कोशिश करते हैं कि ‘सबके साथ न्याय करना और 'कुछ' का तुष्टिकरण नहीं करना है.’

यह ‘कुछ’ मोदी और संघ परिवार के लिए उनका स्थाई और पारम्परिक दुश्मन है. भाजपा की सारी राजनीति इस ‘कुछ’ के ही इर्द-गिर्द घूमती है और पार्टी इसी ‘कुछ’ के कारण नित नए रूप में सामने आती रहती है. कभी यह ‘कुछ’ ‘घर वापसी’ का चोला पहन कर सामने आता है तो कभी ‘लव जिहाद’ का रूप धर कर. राम मंदिर, अनुच्छेद 370, समान आचार संहिता और मताधिकार समाप्त करने का आह्वान यह सब इस ‘कुछ’ के कारण ही है.

‘सबका साथ-सबका विकास’ इसी कड़ी में आता है. एक तरह से यह देश की एकता पर अप्रत्यक्ष प्रहार है. तमाम अध्ययनों के जरिए इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि हमारे समाज के कमजोर तबके के लोग वाकई सुविधाओं आदि से वंचित हैं और उन्हें अपना सामाजिक-आर्थिक स्तर सुधारने के लिए सरकार के स्तर पर अतिरिक्त समर्थन जरूरत है.

वंचितों का संघर्ष जारी

मुसलमानों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाएं. ये सभी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार आदि क्षेत्र में पीछे ही रह जाते हैं. इसके अलावा राजनीति में भी उन्हें बराबर का हक नहीं मिलता. स्वतंत्र भारत का अस्तित्व समाज के इन्हीं वर्गों के विकास के लिए रोड मैप तैयार करने की शर्तों पर सहमति के साथ गढ़ा गया था. आजादी के इन 70 सालों में कई समितियों और आयोगों ने इन पिछड़े वर्गों का अध्ययन किया और बहुत सी सिफारिशें दीं, जिन्हें माना भी गया है.

राजनीति का यह दौर ऐसा ही है कि देश को आजाद हुए लगभग तीन चौथाई सदी बीत चुकी है लेकिन इन कमजोर वर्गों का संघर्ष अभी जारी है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कुछ भी नहीं बदला. सवाल यह है कि अगर सरकार ही इन कमजोर वर्गों को साथ लेकर नहीं चलेगी तो क्या होगा? यह राज्य का दायित्व है और आरएसएस व उसके साथी इन कमजोर वर्गों के लिए सरकार के इन अतिरिक्त प्रयासों पर रोक की मांग कर रहे हैं लेकिन यह मांग अहिंसा के साथ हो तो ही ठीक है!

यहां गौर करने लायक बात यह है कि क्या एक प्रधानमंत्री को इस तरह के ‘अभियान’ में शामिल होना चाहिए? प्रधानमंत्री का सरकार के कर्तव्य को तुष्टिकरण का नाम देना कहां तक उचित है? जब मोदी कहते हैं- ‘सबका विकास’ तो वे एक तरह से भारत की उस राष्ट्रीय विचारधारा को नकार देते हैं जिसे इस देश देश के संविधान के जरिए एक व्यापक बहुमत और दूरदर्शी सोच के तहत अपनाया गया था. वे भारत के उस मूल सच से मुंह मोड़ लेते हैं जिसमें एक बड़ी आबादी को स्टेट के अतिरिक्त समर्थन की दरकार है. यह 'सबका साथ-सबका विकास' के जरिए नहीं हो सकता, इसके लिए सबका साथ और कुछ लोगों का ज्यादा विकास' करने की जरूरत है. ‘कुछ’ को वाकई सरकारी सहायता चाहिए और यह तुष्टिकरण की नीति नहीं है.

First published: 8 March 2017, 8:02 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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