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उत्तर भारत की राजनीति में कमंडल की वापसी क्यों हुई?

अमीक़ जामेई | Updated on: 23 March 2017, 10:24 IST

भाजपा के पक्ष में आए उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों ने दलित-पिछडों और मुसलमानों की राजनीति पर सवालिया निशान लग गया है. आरक्षण, महिला और वंचित जातियों की पुरज़ोर मुख़ालिफ़त के बावजूद आरएसएस ने 80-90 दशक में जन्मी मंडल राजनीति को आईना दिखा दिया है.

तक़रीबन ढाई दशक पहले मंडल आंदोलन के नाते देश में ऐसे कई नेता हुए जिन्होंने वंचित समाज के बीच सामाजिक न्याय की उम्मीद जगाई. शिक्षा और नौकरियों में इस समाज के बढ़ते प्रतिनिधित्व के कारण ही उत्तर भारत के दो बड़े राज्य बिहार और यूपी मंडल आंदोलन के नेताओं के हाथ में रहा. मगर आज वही वंचित समाज उत्तर प्रदेश में अपने ही नेताओं को लेकर गुस्से में है.


वजह साफ है कि इस आंदोलन के ज़्यादातर नेताओं ने वंचित समाज के कल्याण की आवाज़ तो उठाई लेकिन बाद में सिर्फ अपनी-अपनी जातियों को ख़ुश करने में जुट गए. यह एक ऐसी गलती थी जिसे भारतीय जनता पार्टी ने सही वक़्त पर भांपते हुए लपक लिया और 2014 के आम चुनाव से एक बहुत बड़े नाख़ुश समाज को अपने पाले में कर लिया है. वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि 63 फीसदी पिछड़े और मुसलमानों को भी मिला लें तो 85 फीसदी वाले बहुजन प्रदेश में आरएसएस और भाजपा बाज़ी मार ले जाए.

 

हल्के में लिया संघ को


आरएसएस ने 2014 में हुए आम चुनाव के बाद से ही प्रधानमंत्री को विकास पुरुष के साथ-साथ पिछ्ड़े समाज से आए हुए एक नेता के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया था लेकिन यही बात समाजवादियों या सेकुलर पार्टियों को समझ में नहीं आई. तब कांग्रेस के रणनीतिकार किसी उच्च वर्ग के स्वर्ण नेता की तलाश में थे. समाजवादी पार्टी के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को उनके क्रीमी लेयर सलाहकार सामाजिक न्याय की लडाई को जस्ट-चिल पिल बता रहे थे और सपा सरकार के कार्यकाल में मंडल कमीशन की 13 अनुशंसाओं में से 2 को छोड़कर एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ा पाए थे.


यहां तक की इलाहबाद में पिछड़ा समाज के आंदोलनरत युवाओं पर अखिलेश की पुलिस ने लाठियां भाजी थी जबकि उन्हें यह पता होना चाहिए था कि समाजवाद का पहला सिद्धान्त सामाजिक न्याय है जिसके बल पर क्यूबा जैसा देश तमाम चुनौतियों के बावजूद आजतक खड़ा है.

 

उत्तर प्रदेश चुनाव में आरएसएस यह समझाने में पूरी तरह कामयाब रहा कि मंडल आयोग की सिफ़ारिशों से जब सिर्फ यादव ही हर नौकरी और पद पर विराजमान है तो उसमे अन्य जातियों को क्या फायदा है? कमाल यह है कि ब्राह्मणवादी संगठन होने के बावजूद संघ गैर यादव में अपनी पैठ बनाने में कामयाब रहा. ग़ैर यादव और ग़ैर जाटव समाज के नेताओं को संगठन के प्रमुख पदों पर पर बिठाकर इस समाज में भरोसा भी जगा लिया.

हालांकि यही कोशिश समाजवादी पार्टी ने अति पिछड़े समाज के नेता नरेश उत्तम को को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर की लेकिन उनके समाज में यह मैसेज नहीं पहुंचाया जा सका. सच कहा जाए तो सेकुलर दलों का सामाजिक न्याय को नजरअंदाज़ करना भारी पड़ा है, और अब उसे सज़ा मिली है.


बहुजन समाजवादी पार्टी की मुखिया मायावती के साथ भी यही हुआ. वंचितों को शोषण की बेड़ियों से आज़ाद कराने का जो आन्दोलन कांशीराम ने चलाया था, मायाराज में वह करोड़ों के टिकटों की ख़रीद-फ़रोख़्त में बदल गया. जहां 'मिले मुलायम कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम' जैसे स्लोगन जो दलितों में जागृति, शोषण के विरूद्ध एक रोष जगाते थे. वहीं मायावती ने दलित आन्दोलन को सवर्णों के हाथ में गिरवी रख दिया और बसपा का नया नारा हो गया, 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है.' सपा और बसपा की ऐसी ही कारगुज़ारियों का नतीजा आज 2017 के चुनाव परिणाम के रूप में हमारे सामने है जिसमें भाजपा ने एक शक्तिशाली सरकार बना ली है.


माना जाता है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में टिकट के लिए रुपए नहीं लिए जाते लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बहुजन समाजवादी पार्टी ने टिकटों की बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. पूरे पांच साल मायावती का वंचितों के सभी आंदोलन से गायब रहना और गैर जाटव जातियों को नज़रअंदाज़ करना सीधेतौर पर संघ को फायदा पहुंचाने वाला रहा. ग़ैर जाटव जातियां जिनका आरएसएस भगवाकरण कर चुका है, उनमें बसपा का सौ से ज़्यादा मुसलमानों को टिकट देना आग में घी डालने जैसा साबित हुआ.

 

सामजिक न्याय ही विकल्प

 

मंडल कमीशन के दौरान देश में कई महत्वपूर्ण घटनाएं क्रमवार हुई हैं. 1989 में राम मंदिर का शिलान्यास, 1990 में मंडल आंदोलन उसे कुचलता है, कमंडल के ज़रिये 1992 बाबरी मस्जिद की शहादत, बम्बई बम धमाका और फिर 2002 में हुआ गुजरात नरसंहार. इन सभी घटनाओं से पूरे देश का सामाजिक ताना-बाना कमज़ोर हुआ और इस पर पर्दा डालने के लिए गुजरात के कथित विकास मॉडल को आगे कर दिया गया. हालांकि इसी पूरे घटनाक्रम के दौरान संघ अपनी रफ़्तार से लगा रहा और सेकुलर दलों के नेता सामजिक न्याय को दरकिनार करते रहे.

यूपी की हार सामाजिक नेताओं के लिए एक सबक है. संगठन/पार्टी में आदिवासी, दलित, महिला, पिछ्ड़े और अल्पसंख्यक को नेतृत्व थमा कर और मंडल की 11 अनुशंसाओं के काम को आगे बढ़ाने की कोशिश करके इस समाज में दोबारा उम्मीद जगाई जा सकती है.

कर्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग मंत्रालय के जनवरी, 2016 के आकड़ों के हिसाब से विभिन्न मंत्रालय में सरकार के अधीन इदारों में समूह एक की नौकरियों में पिछ्ड़े वर्ग का प्रतिशत 5.4%, समूह दो में 4.2%, समूह तीन में 6.3% और समूह चार में 5.1% था. अगर मंडल की अनुशंसाओ पर काम हुआ होता तो आज यह नौबत नहीं आती. मंडल पार्ट-2 का दम भरने वाले लालू प्रसाद यादव भी जब सत्ता में थे वो इसे बढ़ा नहीं पाए लेकिन वो इस लड़ाई को जिंदा रखने की लिस्ट में आगे रहेंगे.

आरएसएस आदिवासी, दलित और पिछड़ों के बीच अपनी विचारधारा का प्रचार-प्रसार तो कर सकता है लेकिन उन्हें शिक्षा, नौकरियों में उनके अधिकार लेने नहीं देगा. लिहाज़ा, बहुजन राजनीति के यही सवाल अगर मज़बूती से उठाए जाएं तो आरएसएस को वापस पीछे ढकेला जा सकता है. इस आन्दोलन में पिछड़े मुसलमानों को भी अपने क्रीमी लेयर नेताओं को लात मार आगे आना होगा.

अभी भी वक़्त है अगर तमाम वंचित जातियों और अल्पसंख्यकों को इन सवालों पर एकजुट किया जा सके तो इनकी एकता 2019 में भारत का भविष्य तय कर सकती है.

First published: 23 March 2017, 9:23 IST
 
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