Home » राजनीति » Young leaders' message to Congress: Weed out old guard, take on Modi
 

युवा कांग्रेसी चाहते हैं कि पुराने सिपहसालार अब गद्दी छोड़ें

आकाश बिष्ट | Updated on: 25 March 2017, 9:16 IST


हाल के चुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन से बहस छिड़ गई है कि पार्टी अपनी पहले वाली मजबूत स्थिति में आने के लिए क्या करे. बहस की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि भाजपा कांग्रेस के गढ़ पर धीरे-धीरे कब्जा कर रही है. अकेली सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद मणिपुर और गोवा में कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी और इसके लिए वह खुद जिम्मेदार है.


नतीजों की घोषणा के तुरंत बाद कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने विभिन्न मंचों से कहा कि पार्टी को मोदी की बुलडोजर जैसी शक्ति को रोकना है और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अहमियत बनाए रखनी है. कुछ ने मोदी से मुकाबले के लिए गठबंधन का सुझाव दिया, तो कुछ ने हारे उम्मीदवारों की जवाबदेही तय करने के कहा.


वरिष्ठ नेताओं ने एक बार फिर अपना मत रखा, बिना विचारे कि उन्हें अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को जमीनी स्तर पर क्या कहना चाहिए था. कैच ने कांग्रेस के कई युवा नेताओं से बात की यह जानने के लिए कि फिर से मजबूत बनने और नरेंद्र मोदी और भाजपा का मुकाबला करने के लिए पार्टी को क्या करना चाहिए.

 

आधा-अधूरा बदलाव मंज़ूर नहीं


युवा नेता एकमत हैं कि आधे-अधूरे और ऊपरी परिवर्तन का वक्त अब बीत चुका है. अगर वह भाजपा से मुकाबले की इच्छा रखती है, तो पार्टी की पूरी जांच और मरम्मत की जरूरत है. नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा, ‘यूपी चुनावों से पहले गुलाम नबी आजाद को उम्मीदवारों के नाम तय करने थे. क्षेत्रीय नेताओं से बात करने की बजाय उन्होंने लखनऊ से एक वरिष्ठ नेता को बुलाया, जिन्होंने नाम बताए. स्थानीय नेताओं से परामर्श के बिना फैसले से सब हैरान थे.’


जिन युवा क्षेत्रीय नेताओं से कैच ने बात की, उनमें से ज्यादातर अनुशासनात्मक कार्रवाई और राजनीतिक कॅरियर खत्म होने के डर से अपनी पहचान छिपाना चाहते थे. उन्होंने पार्टी के दिग्गजों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भ्रमित करने का आरोप लगाया और कहा कि उनकी वजह से आम कार्यकर्ताओं की बात केंद्रीय नेतृत्व तक कभी नहीं पहुंच पाती.


गुजरात के एक नेता ने कहा, ‘वक्त आ गया है, जब हार के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाए अन्यथा वर्कर्स का पार्टी से विश्वास उठ जाएगा, जो धीरे-धीरे हो भी रहा है. अब पुराने सिपहसालारों की जगह राहुल के नेतृत्व में नए चेहरे लाने का वक्त है और इससे आप नई कांग्रेस को उदय होते देखेंगे.’


नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया के कार्यकर्ता ने आगे कहा कि पुराने लोग जमीनी सचाई से अपना जुड़ाव खो चुके हैं और अपने वर्कर्स की जगह प्रशांत किशोर जैसे लोगों पर निर्भर हैं. ‘हमें नए चेहरों की आवश्यकता है क्योंकि हमारे वरिष्ठ (नेता) अपनी अपील खो चुके हैं और उन्हें केवल पार्टी में अपनी पोजिशन की चिंता है. वोटर सोचते हैं कि नेता भ्रष्ट, सत्ता के भूखे हैं और वे वही करेंगे या कहेंगे, जो उन्हें प्रासंगिक बनाए रखने के लिए जरूरी है.’


कर्नाटक के एक अन्य युवा नेता ने कहा कि 2004 के बाद वरिष्ठ नेतृत्व शासन में इतना मशगूल थे कि वे पार्टी के बारे में भूल गए. उन्होंने कहा, ‘सरकार पार्टी से ज्यादा शक्तिशाली बन गई और हम जमीनी सच्चाई से धीरे-धीरे कटते गए. पार्टी की अहमियत सरकार से ज्यादा होनी चाहिए, पर सभी पैसा बनाने में लगे थे और इसका नतीजा 2014 के परिणामों में सामने आया. 2009 के बाद ये नेता सत्ता में रहने के लिए संगठन का नुकसान कर रहे थे और यह सब उस समय के घोटालों में नजर आया.’


युवा नेता ने अपनी बात जारी रखी कि पिछले 15 सालों से उनके जिले में ब्लॉक कमेटी और साधारण निकायों की बैठकें नहीं हुईं. ‘स्थानीय निकाय के चुनावों के लिए उम्मीदवार, विधायक और सांसद तय करते हैं. इसलिए जब उनकी बात नहीं सुनी जाती है, तो कोई कांग्रेस का क्यों हिस्सा बनना चाहेगा. यदि संगठन मजबूत बनता है, तो लोग कांग्रेस में आना चाहेंगे, पर ऐसा नहीं हो रहा.’


बिहार के एक अन्य नेता ने कहा कि लोग पूछते हैं कि मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह, सीपी जोशी, आजाद जैसे नेताओं को बार-बार विफलता के बाद भी अहम पद क्यों दिए जा रहे हैं. उन्होंने आगे कहा, ‘अजय माकेन को दिल्ली पीसीसी का अध्यक्ष, प्रवक्ता, मध्यप्रदेश का समीक्षक, और अब तो सीडब्ल्यूसी का हिस्सा भी क्यों होना चाहिए? उन्होंने क्या काम किया है?

और यदि आप इतनी सारी जिम्मेदारी एक व्यक्ति को देते हैं, तो वह सबके साथ कैसे न्याय कर सकता है? बल्कि उनके कुछ पद किसी कम उम्र के व्यक्ति को दिए जा सकते हैं. आईएनसी वेबसाइट पर जाएं और देखें कि इन पुराने नेताओं के पास कितने पद हैं. इसमें परिवर्तन करना चाहिए.’


इन वरिष्ठ नेताओं की लोकप्रियता पर सवाल उठाते हुए बिहार के एक अन्य छात्र नेता ने पूछा, ‘वे अपने-अपने राज्य जाकर पार्टी की मजबूती के लिए काम क्यों नहीं करते? दिग्विजय एमपी क्यों नहीं चले जाते? अगर एमपी से 5 नेता हैं, तो राज्य को पांच क्षेत्रों में बांटा जाए और हरेक को एक क्षेत्र की जिम्मेदारी दी जाए. वे यह नहीं करेंगे. वे दिल्ली में रहना चाहते हैं और सत्ता का खेल खेलना चाहते हैं.’

 

गठबंधन ठीक नहीं


विभिन्न क्षेत्रों के जिन 6 युवा नेताओं से कैच ने बात की, उनमें से ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन के बिलकुल विरोध में थे. उनका मानना है कि इससे कांग्रेस का नुकसान होगा क्योंकि जैसे ही पार्टी जीतेगी, क्षेत्रीय पार्टियां उस क्षेत्र पर कब्जा कर लेंगी.


बिहार के युवा नेता ने कहा, ‘जहां भी हमारे गठबंधन रहे, हम सत्ता में हो सकते थे, पर स्थानीय स्तर पर हमें नष्ट कर दिया गया. सत्ता की भूख ने क्षेत्रीय पार्टियों को बढ़ावा दिया क्योंकि वरिष्ठ नेता सरकार का हिस्सा बनना चाहते थे, भले ही इसके लिए उन्हें कांग्रेस के हितों की कीमत पर अन्य पार्टियों का समर्थन क्यों ना करना पड़ा.’


गठबंधन के विरोध की एक वजह यह भी है कि इससे युवा नेताओं के हिस्से में कम टिकट आएंगे. दिल्ली के एक दलित नेता ने कहा, ‘कांग्रेस मारुति कार जैसी है, जिसकी यांत्रिकी पूरे भारतवर्ष में है और हमें अपनी पहले वाली मजबूती के लिए सिर्फ कुछ सुधारों की आवश्यकता है. अकेले चलने से ज्यादा लाभ होगा, हमारे साथ ज्यादा लोग जुड़ेंगे. इससे हमारा आधार मजबूत ही होगा.’

 

ये नेता इस पर भी एकमत थे कि मोदी सरकार पर संप्रदायवाद फैलाने के कांग्रेस के अरोप से भाजपा मजबूत हुई है. इसकी बजाय उन्हें विकास के मुद्दे और मोदी ने जो वादे पूरे नहीं किए, उन बातों को ज्यादा उठाना चाहिए. हिमाचल प्रदेश के एक नेता ने कहा, ‘वादे पूरे करने की उनकी विफलता को दिल्ली तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे पूरे देश के संदर्भ में बताया जाना चाहिए.

 

अगर हम संप्रदायवाद का ही मुद्दा उठाते रहेंगे, तो लोग सोचेंगे कि हम हिंदुओं के खिलाफ हैं, जबकि ऐसा नहीं है. मोदी को सत्ता से बाहर करने के लिए हमें हर संभव प्रयास करने चाहिए, भले ही इसमें ये मुद्दे शामिल नहीं हों, तो भी कोई हर्ज नहीं.’

 

 

First published: 25 March 2017, 9:16 IST
 
अगली कहानी