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आख़िरकार वसुंधरा को वापस लेना पड़ा 'काला कानून'

सुनील रावत | Updated on: 20 February 2018, 11:58 IST

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने विवादास्पद काले कानून 'क्रिमिनल लॉ (राजस्थान अमेंडमेंट) बिल 2017' को वापस लेने की घोषणा कर दी है. इस कानून का लम्बे समय से पत्रकार, विपक्ष और वकील विरोध कर रहे थे. सरकार के इस कदम को मीडिया की जीत के रूप में भी देखा जा रहा है. राजस्थान पत्रिका की माने तो सीएम वसुंधरा राजे ने कहा कि ''कानून तो बना ही नहीं था इसे प्रवर समिति के पास भेजा गय था. फिर भी हम इसे वापस लेते हैं.

राजस्थान के सबसे बड़े अख़बार 'राजस्थान पत्रिका' ने इस काले कानून के खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़ी. राजस्थान पत्रिका के संपादक गुलाब कोठारी ने अपने लेख में लिखा था कि जब तक वसुंधरा राजे इस काले कानून को वापस नहीं लेती तब तक वह उनसे सम्बंधित ख़बरों का प्रकाशन नहीं करेंगे. आखिरकार सरकार को अपने कदम वापस खींचने पड़े. अख़बार ने इस सत्य की जीत बताया है और इसे अख़बार नई इसे पाठकों की जीत माना है.

इस विधेयक का विरोध इसलिए किया जा रहा था क्योंकि इसमें किसी जज, मजिस्ट्रेट और सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उनसे जुड़े किसी मामले में जांच से पहले संबंधित अधिकारियों से इजाजत लेना जरूरी था. राजस्थान विधानसभा में पिछले साल कांग्रेस ने बिल के खिलाफ जमकर हंगामा किया था.

क्यों हो रहा था बिल का विरोध

इस बिल के कारण नेताओं और अफसरों के खिलाफ आसानी से कार्रवाई नहीं हो पाती और ये उन्हें बचाने का ही काम करता . इस बिल के कानून बनने के बाद मजिस्ट्रेट किसी केस की जांच की मंजूरी नहीं दे सकते. इसके लिए सरकार या विभाग के आला अधिकारियों की इजाजत लेनी होती.

हालांकि, इसके लिए अधिकतम 6 महीने का वक्त तय किया गया था. इस दौरान अगर अफसर मंजूरी ना दे, तो इसे स्वीकृत मान लिया जाता.

केस पेंडिंग होने की स्थिति में किसी भी जज, मजिस्ट्रेट या सरकारी कर्मचारी का नाम, पता, फोटो और ऐसी कोई जानकारी नहीं दी जाती, जिससे संबंधित अधिकारी की पहचान उजागर हो. जो भी ऐसी जानकारियां उजागर करता, उसे 2 साल की सजा होती और जुर्माना भी लगाया जाता.

इस बिल के कानून का रूप लेने पर कोई भी चैनल, अखबार या वेबसाइट अधिकारियों के खिलाफ आरोपों पर खबर पब्लिश नहीं कर सकता, जब तक कि उस विभाग के आला अफसरों से इसकी मंजूरी नहीं मिल जाती.

सरकारी कामकाज से नाराज एक्टिविस्ट सरकार या संबंधित विभागों के खिलाफ पीआईएल फाइल करते हैं. इस बिल के कानून बनने के बाद इस काम में रूकावट आ सकती थी, क्योंकि नए बिल के लागू होने पर केस चलाए जाने से पहले सरकार या विभाग के जिम्मेदार अफसर अदालत में अपनी बात रख सकते थे.

 

केस पेंडिंग होने की स्थिति में किसी भी जज, मजिस्ट्रेट या सरकारी कर्मचारी का नाम, पता, फोटो और ऐसी कोई जानकारी नहीं दी जाती, जिससे संबंधित अधिकारी की पहचान उजागर हो. जो भी ऐसी जानकारियां उजागर करता, उसे 2 साल की सजा होती और जुर्माना भी लगाया जाता.

 

इस बिल के कानून का रूप लेने पर कोई भी चैनल, अखबार या वेबसाइट अधिकारियों के खिलाफ आरोपों पर खबर पब्लिश नहीं कर सकता, जब तक कि उस विभाग के आला अफसरों से इसकी मंजूरी नहीं मिल जाती.

सरकारी कामकाज से नाराज एक्टिविस्ट सरकार या संबंधित विभागों के खिलाफ पीआईएल फाइल करते हैं. इस बिल के कानून बनने के बाद इस काम में रूकावट आ सकती थी, क्योंकि नए बिल के लागू होने पर केस चलाए जाने से पहले सरकार या विभाग के जिम्मेदार अफसर अदालत में अपनी बात रख सकते थे.

First published: 20 February 2018, 11:45 IST
 
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