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बुद्ध पूर्णिमा 2020 : वो घटनाएं जिन्होंने सिद्धार्थ को राजपाट छोड़ने पर कर दिया मजबूर

कैच ब्यूरो | Updated on: 5 May 2020, 15:23 IST

Buddha Purnima 2020: बुद्ध पूर्णिमा का भारत में खास महत्व माना जाता है और बुद्ध पूर्णिमा का उत्सव 7 मई को है. गौतम बुद्ध एक बड़े प्रेरणा स्रोत माने जाते हैं. बुद्ध या सिद्धार्थ गौतम का जन्म 567 ईसा पूर्व के लुम्बिनी में हुआ था. उनके पिता शाक्य वंश के एक प्रमुख थे. ऐसा कहा जाता है कि उनके जन्म से बारह साल पहले ब्राह्मणों ने भविष्यवाणी की थी कि वह या तो एक महान सम्राट या बनेंगे यह एक महान संत बनेंगे. बेटे को तपस्वी बनने से रोकने के लिए पिता ने सिद्धार्थ को राजमहल से कभी बाहर नहीं आने दिया. लेकिन उनके जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं थी, जिसने उन्हें सत्य खोजने पर मजबूर कर दिया.

कहा जाता है कि कपिलवस्तु की गलियों में सिद्धार्थ ने बीमार व्यक्ति, इंसान के बुढ़ापे और इंसान के शव को देखा, जिसने उन्हें सत्य की खोज करने के लिए मजबूर कर दिया. जब सिद्धार्थ वह महल में वापस आये, तो अपने सवालों का उत्तर पाने के लिए तड़प उठे, उन्होंने महल छोड़ने का संकल्प ले लिया. भगवान बुद्ध का जीवन बेहद प्रेरणादायक रहा. उन्होंने लोगों को जीने की नई राह दिखाई. ऐसा लिखा गया है कि वसंत ऋतु के दिनों में एक दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर कर रहे थे, वहां उन्हें एक बूढ़ा व्यक्ति दिखाई दिया. उस वृद्ध व्यक्ति के दांत टूट हुए थे, बाल सफ़ेद हो गए थे. वह लाठी पकड़े कांपता हुआ रास्ते से जा रहा था. जिसे देखकर वह सोचने पर मजबूर हो गए.


दूसरी बार सिद्धार्थ को एक बीमार व्यक्ति दिखाई दिया. व्यक्ति की हालत इतनी ख़राब थी कि वह सांस तक ठीक से नहीं ले पा रहा था. शरीर सूख गया. चेहरा पीला पड़ गया था. इस घटना ने भी सिद्धार्थ को प्रभावित किया. तीसरी घटना सिद्धार्थ के जीवन में एक व्यक्ति को अर्थी का दिखना था. चार व्यक्ति उसे उठाकर ले जा रहे थे. उसके साथ कई लोग कोई रो रहे थे. कोई छाती पीट रहा था, कोई अपने बालों को नोच रहा था.इस दृश्य ने सिद्धार्थ को बहुत विचलित किया.

चौथी बार सिद्धार्थ बगीचे की सैर को निकला, तो उसे एक संन्यासी दिखा. प्रसन्नचित्त संन्यासी ने सिद्धार्थ को आकर्षित किया. जिसके बाद उन्होंने सोचा ‘'धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है. धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है. धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है. क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी सौम्य?'' उन्हें प्रसन्नचित्त संन्यासी ने आकृष्ट किया और वे संसार के मोह-बंधन से मुक्त होकर त्याग के रास्ते पर निकल पड़े.

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First published: 5 May 2020, 15:13 IST
 
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