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बुद्ध पूर्णिमा 2020: बोधिवृक्ष को नष्ट करने की हो चुकी है कोशिश, जहां भगवान बौद्ध को प्राप्त हुए था ज्ञान

कैच ब्यूरो | Updated on: 5 May 2020, 14:12 IST

Buddha Purnima 2020: हर धर्म में कोई न कोई स्थान पवित्र (Holy Place) और महत्वपूर्ण (Important) माना जाता है. इसी तरह से बौद्ध धर्म (Budha Dharm) में भी बोधिवृक्ष (Bodhi tree) को पवित्र माना जाता है. बिहार (Bihar) के बोधगया (Bodhigya) स्थित बोधिवृक्ष के दर्शन के लिए सैकड़ों लोग रोजाना पहुंचते हैं. इस वृक्ष के नीचे तपस्या करने से ही भगवान बौद्ध को केवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. इसीलिए बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए लिए ये वृक्ष बहुत महत्व रखता है.

बुद्ध पूर्णिमा के दिन हजारों की संख्या में लोग यहां पहुंच बोधिवृक्ष की पूजा करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पवित्र वृक्ष को भी नष्ट करने की कोशिश की जा चुकी है. बुद्ध पर्णिमा के इस मौके पर आज हम आपको इसी के बारे में बताने जा रहे हैं कि आखिर किसने, कब और क्यों बोधिवृक्ष को काटने की कोशिश की. बता दें कि बोधिवृक्ष को तीन बार नष्ट करने की कोशिश की जा चुकी है. आज जो पेड़ सारनाथ में मौजूद है जिसे अपनी पीढ़ी का चौथा पेड़ माना जाता है.


पहली बार बोधिवृक्ष को काटने की कोशिश-

कहा जाता है कि बोधिवृक्ष को पहली बार सम्राट अशोक की एक वैश्य रानी तिष्यरक्षिता ने चोरी-छुपे कटवा दिया था. यह बोधिवृक्ष को कटवाने की पहली कोशिश थी. रानी ने यह काम उस वक्त किया जब सम्राट अशोक किसी दूसरे राज्य की यात्रा पर गए हुए थे. मान्यताओं के अनुसार रानी का यह प्रयास विफल साबित हुआ और बोधिवृक्ष नष्ट नहीं हुआ. कुछ ही सालों बाद बोधिवृक्ष की जड़ से एक नया वृक्ष उगकर आया.

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उसे दूसरी पीढ़ी का वृक्ष माना जाता है, जो तकरीबन 800 सालों तक रहा. कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने अपने बेटे महेन्द्र और बेटी संघमित्रा को सबसे पहले बोधिवृक्ष की टहनियों को देकर श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने भेजा था. महेन्द्र और संघिमित्रा ने जो बोधिवृक्ष श्रीलंका के अनुराधापुरम में लगाया था वह आज भी वहीं मौजूद है.

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बोधिवृक्ष को नष्ट करने की दूसरी कोशिश- उसके बाद दूसरी बार बोधिवृक्ष को बंगाल के राजा शशांक ने जड़ से ही उखड़ने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी इस कोशिश नाम नाकाम हो गए. कहा जाता है कि जब इसकी जड़ें नहीं निकली तो राजा शशांक ने बोधिवृक्ष को कटवा दिया और इसकी जड़ों में आग लगवा दी. लेकिन जड़ें पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाईं. कुछ सालों बाद इसी जड़ से तीसरी पीढ़ी का बोधिवृक्ष निकला, जो तकरीबन 1250 साल तक मौजूद रहा.

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बोधिवृक्ष को नष्ट करने की आखिरी और तीसरी कोशिश- बताया जाता है कि बोधिवृक्ष आखिरी और तीसरी बार सन् 1876 प्राकृतिक आपदा के चलते नष्ट हो गया. उस समय लार्ड कानिंघम ने 1880 में श्रीलंका के अनुराधापुरम से बोधिवृक्ष की शाखा मांगवाकर इसे बोधगया में फिर से स्थापित कराया. जो इस पीढ़ी का चौथा बोधिवृक्ष है और आज भी मौजूद है.

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First published: 5 May 2020, 14:18 IST
 
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