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Eid Al Adha 2018 : जानिए क्यों दी जाती है कुर्बानी और क्या है इस दिन का महत्व

कैच ब्यूरो | Updated on: 21 August 2018, 15:42 IST

दुनिया में कई मजहब है और हर मजबह के अपने-अपने त्योहार और मान्यताएं होती हैं. दुनिया में सबसे ज्यादा ईसाई धर्म को मानने वाले हैं वहीं दूसरे नंबर पर इस्लाम धर्म का आता है. इस्लाम धर्म में भी कई त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन सबसे अधिक मान्यता ईद अल फितर और ईद अल जुहा यानी बकरीद की मानी जाती है.

इस साल भारत में ईद अल जुहा यानी बकरीद का त्योहार 22 अगस्त बुधवार को मनाया जाएगा. इस दिन लोग ईदहाग में जाकर ईद की नमाज अदा करते हैं उसके बाद कुर्बानी की जाती है.


क्यों मनाते हैं बकरीद

इस्लाम धर्म के जानकारों के मुताबिक हजरत इब्राहिम अपने पुत्र हजरत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर उनकी राह में कुर्बान करने जा रहे थे, लेकिन अल्लाह ने हजरत इब्राहिम से खुश होकर उनके बेटे को जीवनदान दे दिया. तभी से इस महान त्याग वाले दिन को बकरीद के रूप में मनाया जाता है.

हालांकि इस त्योहार का बकरों से कोई संबंध नहीं है और ना ही ये ऊर्दी और अरबी का शब्द है. असल में अरबी में 'बक़र' का मतलब बड़े जानवर से है, जो जि़बह किया यानी जिसकी कुर्बानी की जाती है. यही शब्द कालांतर में बदलते हुए भारत, पाकिस्तान व बांग्ला देश में बकरा ईद बन गया. ये एक अरबी भाषा का शब्द है, ईद-ए-कुर्बां और इसका मतलब है बलिदान की भावना.

इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक इस दिन दी जाने वाली कुर्बानी वो है जो हज के महीने में खुदा को खुश करने के लिए की जाती है. विद्घानों के मुताबिक कुरान में बताया गया है कि हमने तुम्हें हौज़-ए-क़ौसा दिया तो तुम अपने अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ो और कुर्बानी करो.

किस महीने में मनाया जाता है ईद अल अजहा का त्योहार

ईद अल अजहा का त्योहार हिजरी के आखिरी महीने जुल हिज्ज में मनाया जाता है. इसी महीने में दुनिया भर के मुसलमान सऊदी अरब के मक्का में हज यात्रा पूरी करते है. ईद उल अजहा का शाब्दिक अर्थ त्याग वाली ईद है. इस दिन जानवर की कुर्बानी देना एक प्रकार की प्रतीकात्मक कुर्बानी है. हज और उसके साथ जुड़ी हुई कहानी हजरत इब्राहीम और उनके परिवार के कार्यो को प्रतीकात्मक तौर पर दोहराने का नाम है.

ईद उल अजहा की कहानी

बताया जाता है कि हजरत इब्राहीम के परिवार में उनकी पत्नी हाजरा और पुत्र इस्माइल थे. एक बार हजरत इब्राहीम ने ख्वाब में देखा कि वह खुदा की राह में अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी दे रहे थे. इस ख्वाब को देखने के बाद हजरत इब्राहीम अपने दस साल के बेटे इस्माइल को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए.

पुरानी इसलामिक कहानियों के मुताबिक जब वो इस्माइल को कुर्बान करने लगे तो पुत्र मोह में हाथ बहक ना जाए, इसलिए उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं. जब आंख खुली तो उन्होंने देखा कि इस्माइल एकदम सही सलामत हैं, और अल्लाह ने उसकी जगह एक बड़े जानवर की कुर्बानी स्वीकार कर ली. तब से इस दिन अपनी सबसे प्रिय चीज को कुर्बान करने की परंपरा शुरू हुर्इ.

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First published: 21 August 2018, 15:42 IST
 
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