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महाशिवरात्रि मनाने के पीछे छिपी हैं ये कहानियां, जानिए क्यों की जाती है शिवलिंग की पूजा

कैच ब्यूरो | Updated on: 28 February 2019, 11:11 IST

महाशिवरात्रि का त्योहार इस साल सोमवार यानि 4 मार्च को पूरे देश में मनाया जाएगा. इस दिन शिवालय हर-हर महादेव के जयकारों से गूंजने लगेंगे और भोलेनाथ के भक्त नीलकंठ को गंगा जल अर्पित कर पूजा अर्चना करेंगे. हमारे देश की संस्कृति और हिंदू धर्म के बड़े पर्वों में शामिल महाशिवरात्रि का ये त्योहार हर साल फाल्गुन मास फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है.

हर व्रत त्योहार को मनाने की कोई ना कोई कहानी और इतिहास रहा है. महाशिवरात्रि का पर्व मनाने के पीछे भी कई कहानियां छिपी हुई हैं. महाशिवरात्रि के पावन पर्व के उपलक्ष्य में हम आपको महाशिवरात्रि से जुड़ी कहानी और उसका इतिहास बताने जा रहे हैं.

जानिए क्या है महाशिवरात्रि मनाने की कथा

हिंदू धर्म में मनाए जाने वाले हर त्योहार की कहानी पुराणों में लिखी है. महाशिवरात्रि का त्योहार भी उन्हीं में से एक है. पुराणों में महाशिवरात्रि का पर्व मानाने की एक कहानी लिखी हुई है. जिसके अनुसार समुद्र मंथन के दौरान जब देवतागण एवं असुर पक्ष अमृत-प्राप्ति के लिए मंथन कर रहे थे, तभी समुद्र में से कालकूट नामक भयंकर विष निकला.

इस विष को पीने के लिए कोई तैयार नहीं था, लेकिन देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने भयंकर विष को अपने शंख में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए. जिससे समस्त सृष्टि का विनाश होने से बच गया. इसीलिए भगवान विष्णु को अपने भक्तों का संकटहर्ता कहा जाता है.

भगवान विष्णु ने उस विष को शिवजी के कंठ में ही रोक कर उसका प्रभाव समाप्त कर दिया. विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलंकठ के नाम से प्रसिद्ध हो गए. इसीलिए आज भी शिवजी को नीलकंठ के नाम से भी पुकारा जाता है.

महाशिवरात्रि मनाने की दूसरी कथा

वहीं शिव पुराण में एक अन्य कथा के अनुसार एक बार ब्रह्माजी और विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन हैं? ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ बता रहे थे. तभी वहां एक विराट लिंग प्रकट हुआ. दोनों देवताओं ने सहमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा.

अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग की छोर ढूढंने निकले. छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए और ब्रह्मा जी भी इस कार्य में असफल हो गए. परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुंच गए थे. उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया.

ब्रह्मा जी के असत्य कहने पर स्वयं शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी का एक सिर काट दिया, और केतकी के फूल को श्राप दिया कि शिव जी की पूजा में कभी भी केतकी के फूलों का इस्तेमाल नहीं होगा. तब से लेकर अब तक शिवजी की पूजा में केतकी के फूल का इस्तेमाल नहीं होता.

पुराणों के अनुसार जिस दिन शिव ने पहली बार खुद को लिंग रूप में प्रकट किया, उस दिन फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि थी, इस दिन को बहुत ही शुभ और विशेष माना जाता है. इसीलिए इस दिन को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है. इस दिन शिव की पूजा करने से उस व्यक्ति को सुख और समृद्धि प्राप्त होती है.

ये है महाशिवरात्रि मनाने की तीसरी कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार एक आदमी जो शिव का परम भक्त था, एक बार लकड़ियां कटाने के लिए जंगल गया था. वो जंगल में खो गया. बहुत रात हो चुकी थी इसीलिए उसे घर जाने का रास्ता नहीं मिल रहा था. क्योंकि वह जंगल में काफी अंदर चला गया था, इसलिए जानवरों के डर से वह एक पेड़ पर चढ़ गया.

लेकिन उसे डर था कि अगर वह सो गया तो वह पेड़ से गिर जाएगा और जानवर उसे खा जाएंगे. इसलिए जागते रहने के लिए वह रात भर भगवान शिव का नाम लेकर पेड़ से पत्तियां तोड़कर नीचे गिराता रहा. जब सुबह हुई तो उसने देखा कि उसने रात में हजार पत्तियां तोड़ कर शिव लिंग पर गिराई हैं, और जिस पेड़ की पत्तियां वह तोड़ रहा था वह बेल का पेड़ था.

 

अनजाने में वह रात भर शिव की पूजा कर रहा था जिससे खुश हो कर भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया. तभी से भगवान शिव पर यानि शिव लिंग पर बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा चल रही है. यह कहानी महाशिवरात्रि को उन लोगों को सुनाई जाती है जो व्रत रखते हैं और रात्रि बेला में शिव जी पर चढ़ाया गया प्रसाद खा कर अपना व्रत तोड़ते हैं.

एक कारण यह भी है इस पूजा को करने का कि यह रात अमावस की रात होती है जिसमें चांद दिखाई नहीं देता. जिसे ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने अपनी जटाओं में अर्ध चांद सजाया हुआ हैबता दें कि महाशिवरात्रि के तुरंत बाद पेड़ फूलों से भर जाते हैं सर्द ऋतु समाप्त होने लगती है और वसंत ऋतु का आगमन हो जाता है. पूरी धरती फिर से उपजाऊ हो जाती है. यही कारण है कि पूरे भारत में शिव लिंग को उत्पत्ति का प्रतीक माना जाता है. भारत के हर कोने में शिवरात्रि को अलग अलग तरीके से मनाया जाता है.

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First published: 28 February 2019, 11:11 IST
 
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