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Muharram 2018: शुरु हुआ मुहर्रम का महीना, जानिए इस्लाम में क्यों है ये इतना पवित्र

सुहेल खान | Updated on: 11 September 2018, 16:42 IST

आज से इस्लाम धर्म का पवित्र महीना मुहर्रम शुरु हो गया. ये महीना इस्लाम धर्म का पहला महीना भी है. मुहर्रम के महीने को रमजान के महीने के बाद सबसे पवित्र महीना माना जाता है. हिजरी कैलेंडर के मुताबिक मुर्रहम के महीने से ही साल की शुरुआत होती है. ये महीना इस्लाम धर्म के चार सबसे पवित्र महीनों में से एक है. मोहर्रम महीने के दसवें दिन को आशूरा कहते हैं. इस दिन शिया मुस्लिम मातम मनाकर हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं.

कब होता है मुहर्रम

बता दें कि हिजरी कैलेंडर चांद की स्थिति के मुताबिक चलता है. इसलिए मुहर्रम की तारीख भी हर साल अलग-अलग होती है और ग्रेगोरियन कैलेंडर से मेल नहीं खाता. इस बार मुहर्रम का महीना मंगलवार यानि 11 सितंबर से शुरु हो गया. जो 9 अक्टूबर तक का है.

क्यों मनाते हैं मुहर्रम

हर धर्म के तीज-त्योहार मनाने के पीछे कोई ना कोई ऐतिहासिक वजह होती है. मुहर्रम मनाने के पीछे भी कुछ वजह हैं. इस्‍लामिक मान्‍यताओं के मुताबिक इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था. यजीद खुद को खलीफा मानता था, लेकिन अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था. वह चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसके खेमे में शामिल हो जाएं. लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया.

पैगंबर-ए इस्‍लाम हजरत मोहम्‍मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया. जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था वह मुहर्रम का ही महीना था. तब से लेकर आज तक हर साल मोहर्रम के महीने की 10 तारीख यानि अशूरा के दिन हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाता है. इस दिन शिया मुसलमान मातम करते हैं.

क्या है मुहर्रम का महत्‍व

मुहर्रम मातम मनाने और धर्म की रक्षा करने वाले हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करने का दिन है. मुहर्रम के महीने में मुसलमान शोक मनाते हैं. इस महीने में इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग कोई खुशी नहीं मनाते. इस महीने में ना शादियां होती हैं और ना ही किसी तरह के नए कपड़े खरीदे जाते हैं. यानि इस महीने को मुस्लिम गम का महीना मानते हैं.

इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक बादशाह यजीद ने अपनी सत्ता कायम करने के लिए हुसैन और उनके परिवार वालों पर जुल्‍म किया और 10 मुहर्रम को उन्‍हें कर्बला के मैदान में शहीद कर दिया. बात दें कि हुसैन का मकसद खुद को मिटाकर भी इस्‍लाम और इंसानियत को जिंदा रखना था.

करबला का इतिहास

इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है. छल-कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम बताई गई हैं. हजरत मोहम्मद ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया और इन्हीं इस्लामिक सिद्घान्तों पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों दी.

वहीं दूसरी ओर इस्लाम का जहां से उदय हुआ, मदीना से कुछ दूर 'शाम' में मुआविया नामक शासक का दौर था. मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद, जिसमें सभी अवगुण मौजूद थे, वह शाम की गद्दी पर बैठा. यजीद चाहता था कि उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि इमाम हुसैन करें क्योंकि वह मोहम्मद साहब के नवासे हैं और उनका वहां के लोगों पर उनका अच्छा प्रभाव है.

यजीद जैसे शख्स को इस्लामी शासक मानने से हजरत मोहम्मद के घराने ने साफ इन्कार कर दिया था, क्योंकि यजीद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी. यजीद की बात मानने से इनकार करने के साथ ही उन्होंने यह भी फैसला लिया कि अब वह अपने नाना हजरत मोहम्मद साहब का शहर मदीना छोड़ देंगे, ताकि वहां अमन कायम रहे.

ऐसे हुई करबल में जंग

इमाम हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोड़कर परिवार और कुछ चाहने वालों के साथ इराक की तरफ जा रहे थे. लेकिन करबला के पास यजीद की फौज ने उनके काफिले को घेर लिया. यजीद ने उनके सामने शर्तें रखीं जिन्हें इमाम हुसैन ने मानने से साफ इनकार कर दिया. शर्त नहीं मानने के एवज में यजीद ने जंग करने की बात रखी.

यजीद से बात करने के दौरान इमाम हुसैन इराक के रास्ते में ही अपने काफिले के साथ फुरात नदी के किनारे तम्बू लगाकर ठहर गए. लेकिन यजीदी फौज ने इमाम हुसैन के तम्बुओं को फुरात नदी के किनारे से हटाने का आदेश दिया और उन्हें नदी से पानी लेने की इजाजत तक नहीं दी.

ऐसे शुरू हुई जंग

इमाम जंग का इरादा नहीं रखते थे क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग शामिल थे. जिसमें उनका छह माह का बेटा उनकी बहन-बेटियां, पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे शामिल थे. यह तारीख एक मुहर्रम थी, और गर्मी का वक्त था. गौरतलब हो कि आज भी इराक में गर्मियों (मई) में दिन के वक्त सामान्य तापमान 50 डिग्री से ज्यादा होता है. सात मुहर्रम तक इमाम हुसैन के पास जितना खाना और खासकर पानी था वह खत्म हो चुका था. इमाम सब्र से काम लेते हुए जंग को टालते रहे. 7 से 10 मुहर्रम तक इमाम हुसैन उनके परिवार के सदस्य और अनुनायी भूखे प्यासे रहे.

9 मोहर्रम की रात हुसैन ने रोशनी बुझा दी और कहने लगे, 'यजीद की सेना बड़ी है और उसके पास एक से बढ़कर एक हथ‍ियार हैं. ऐसे में बचना मुश्किल है. मैं तुम्‍हें यहां से चले जाने की इजाजत देता हूं. मुझे कोई आपत्ति नहीं है.' जब कुछ देर बाद फिर से रोशनी की गई तो सभी साथी वहीं बैठे थे. कोई हुसैन को छोड़कर नहीं गया.

10 मुहर्रम को इमाम हुसैन और यजीद की फौज में जंग शुरु हो गई. हजरत इमाम हुसैन के सभी साथी एक-एक कर शहीद हो गए. उसके बाद इमाम हुसैन असर (दोपहर) की नमाज के बाद खुद ही यजीद की फौज से जंग की, लेकिन अकेले हजरत इमाम हुसैन भी लड़ते हुए शहीद हो गए. इस जंग में इमाम हुसैन के एक बेटे जैनुलआबेदीन जिंदा बचे क्योंकि 10 मोहर्रम को वह बीमार थे और बाद में उन्हीं से मोहम्मद साहब की पीढ़ी चली.

हजरत इमाम हुसैन की इसी कुर्बानी की याद में हर साल दसवें मुहर्रम को मातम मनाया जाता है. करबला का यह वाकया इस्लाम की हिफाजत के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की तरफ से दी गई कुर्बानी है. इमाम हुसैन और उनके पुरुष साथियों व परिजनों को कत्ल करने के बाद यजीद ने हजरत इमाम हुसैन के परिवार की औरतों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया.

हजरत इमाम हुसैन के शहीद होने के बाद

यजीद ने खुद को विजेता बताते हुए हुसैन के लूटे हुए काफिले को देखने वालों को बताया कि यह हश्र उन लोगों का किया गया है जो यजीद के शासन के खिलाफ गए. यजीद ने मोहम्मद साहब के घर की औरतों पर बेइंतहा जुल्म किए. उन्हें कैदखाने में रखा जहां हुसैन की मासूम बच्ची सकीना की कैदखाने में ही मौत हो गई.

First published: 11 September 2018, 16:11 IST
 
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