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Muharram 2018: आज ही के दिन कर्बला में शहीद हो गए हजरत इमाम हुसैन, जानिए शहादत से जुड़ीं बातें

सुहेल खान | Updated on: 21 September 2018, 11:16 IST

आज दसवां मुहर्रम है. हिजरी कलैंडर के मुताबिक मुहर्रम साल का पहला महीना है. इस्लाम धर्म के मानने वाले मुहर्रम के महीने को गम यानि दुख देने वाला महीना मानते हैं. क्योंकि इसी महीने में पैगम्बर मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन कर्बला में जंग करते हुए शहीद हो गए. इसीलिए आज के दिन शिया मुस्लिम मातम मनाते हैं और जुलूस निकाल कर उनकी शहादत को याद करते हैं.

इस बार मुहर्रम का महीना 11 सितंबर को शुरु हुआ जो 9 अक्टूबर तक चलेगा. इन सबमें 10 वां मुहर्रम सबसे खास है. 10वें मुहर्रम के दिन ही इस्‍लाम की रक्षा के लिए हजरत इमाम हुसैन कर्बला में शहीद हो गए. इस्‍लामिक मान्‍यताओं के मुताबिक इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह रहता था जो इंसानियत का दुश्मन था.

यजीद खुद को खलीफा मानता था, लेकिन अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था. वह चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसके खेमे में शामिल हो जाएं. लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया था. पैगंबर-ए इस्‍लाम हजरत मोहम्‍मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया. जिस महीने हुसैन को उनके परिवार के साथ शहीद किया वो मुहर्रम का महीना था.

क्यों किया जाता है मामत

इस दिन शिया मुसलाम मातम करते हैं और हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं. मुहर्रम के महीने में मुसलमान शोक मनाते हैं और अपनी हर खुशी का त्‍याग कर देते हैं. मान्‍यताओं के मुताबिक बादशाह यजीद ने अपनी सत्ता कायम करने के लिए हुसैन और उनके परिवार वालों पर जुल्‍म किया और 10 मुहर्रम को उन्‍हें बेदर्दी से शहीद कर दिया. हुसैन का मकसद खुद को मिटाकर भी इस्‍लाम और इंसानियत को जिंदा रखना था. यह धर्म युद्ध इतिहास के पन्‍नों पर हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गया. मुहर्रम कोई त्‍योहार नहीं बल्‍कि यह वह दिन है जो अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है.

कर्बला में हुई थी जंग

वर्तमान में कर्बला इराक का प्रमुख शहर है जो राजधानी बगदाद से 120 किलोमीटर दूर है. मक्‍का-मदीना के बाद कर्बला मुस्लिम धर्म के अनुयायियों के लिए प्रमुख स्‍थान है. इस्‍लाम की मान्‍यताओं के मुताबिक हजरत इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ 2 मुहर्रम को कर्बला पहुंचे थे. उनके काफिले में छोटे-छोटे बच्‍चे, औरतें और बूढ़े भी थे. यजीद ने हुसैन को मजबूर करने के लिए 7 मोहर्रम को उनके लिए पानी बंद कर दिया था.

मुहर्रम की 9 तारीख की रात हुसैन ने रोशनी बुझा दी और कहने लगे, 'यजीद की सेना बड़ी है और उसके पास एक से बढ़कर एक हथ‍ियार हैं. ऐसे में बचना मुश्किल है. मैं तुम्‍हें यहां से चले जाने की इजाजत देता हूं. मुझे कोई आपत्ति नहीं है.' जब कुछ देर बाद फिर से रोशनी की गई तो सभी साथी वहीं बैठे थे. कोई हुसैन को छोड़कर नहीं गया.

10 मुहर्रम की सुबह हुसैन ने नमाज पढ़ाई. तभी यजीद की सेना ने तीरों की बारिश कर दी. सभी साथी हुसैन को घेरकर खड़े हो गए और वह नमाज पूरी करते रहे. इसके बाद दिन ढलने तक हुसैन के 72 लोग शहीद हो गए, जिनमें उनके छह महीने का बेटा अली असगर और 18 साल का बेटा अली अकबर भी शामिल था. बताया जाता है कि यजीद की ओर से पानी बंद किए जाने की वजह से हुसैन के लोगों का प्‍यास से बुरा हाल हो गया. प्‍यास की वजह से उनका सबसे छोटा बेटा अली असगर बेहोश हो गया.

वह अपने बेटे को लेकर दरिया के पास गए. उन्‍होंने बादशाह की सेना से बच्‍चे के लिए पानी मांगा, जिसे अनसुना कर दिया गया. यजीद ने हुर्मल नाम के शख्‍स को हुसैन के बेटे का कत्‍ल करने का फरमान दिया. देखते ही देखते उसने तीन नोक वाले तीर से बच्‍चे की गर्दन को लहूलुहान कर दिया. नन्‍हे बच्‍चे ने वहीं दम तोड़ दिया. इसके बाद यजीद ने शिम्र नाम के शख्‍स से हुसैन की भी गर्दन कटवा दी. कहते हैं कि हुसैन की गर्दन जब जमीन पर गिरी तो वह सजदे की अवस्‍था में थी.

कर्बला की जंग में हुसैन के बेटे जैनुअल आबेदीन को छोड़कर पूरा परिवार शहीद हो गया था. जैनुअल आबेदीन इसलिए बच गए थे क्‍योंकि वह बीमार थे और इस वजह से जंग में शरीक नहीं हो पाए थे. उस दिन 10 तारीख थी. मुहर्रम महीने के 10वें दिन को आशुरा कहते हैं. इस घटना के बाद इस्‍लाम धर्म के लोगों ने इस्लामी कैलेंडर का नया साल मनाना छोड़ दिया. बाद में मुहर्रम का महीना गम और दुख के महीने में बदल गया.

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First published: 21 September 2018, 11:06 IST
 
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