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भूलकर भी महाशिवरात्रि को न चढ़ाएं शिवलिंग पर ये चीज, वरना टूट पड़ेगा महादेव का प्रकोप

कैच ब्यूरो | Updated on: 19 February 2020, 12:12 IST

हिंदू धर्म की हर एक पूजा में अलग-अलग चीजों का इस्तेमाल किया जाता है. उन हर एक चीज का अपना एक अलग ही महत्व होता है. ऐसे ही हम आपको बताने जा रहे है आज शिव और गणपति की पूजा में एक ऐसी चीज के बारे में जो भूलकर भी नहीं उन्हें चढ़ानी चाहिए. चलिए बताते हैं आपको कौन सी है वो चीज जो भगवान शिव और गणपति को पसंद नहीं है.

भगवान शिव और गणपति की किसी भी पूजा में कभी भी तुलसी नहीं चढ़ाई जाती है. कहा जाता है कि माता तुलसी भगवान शिव और गणेश जी को पसंद नहीं हैं. आखिर इसके पीछे की ऐसी क्या वजह है चलिए जानते हैं…

पूर्व जन्म में तुलसी का नाम वृंदा था और वो जालंधर नाम के एक राक्षस की पत्नी थी. वो राक्षस वृंदा पर काफी अत्याचार करता था. राक्षस को सबक सिखाने के लिए भगवान शिव ने विष्णु भगवान से आग्रह किया. तब विष्णुजी वने छल से वृंदा का पतिवर्त धर्म भंग कर दिया.

जब इसके बारे में वृंदा को पता चला कि भगवान विष्णु ने उनका पतिव्रत धर्म भंग किया है तो उन्होंने विष्णु जी को श्राप दिया कि आप पत्थर के बन जाओगे. तब वृंदा को विष्णु जी श्राप देते हैं कि मैं तो तुम्हारा जालंधर से बचाव कर रहा था, अब तुम मेरे श्राप से लकड़ी के बन जाओगे. इस श्राप के बाद वृंदा कलांतर में तुलसी का पौधा बन जाती हैं.

महादेव की पूजा में तुलसी की जगह बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं क्योंकि तुलसी शापित है. दूसरा शिवजी की पूजा में तुलसी पत्र इसलिए भी चढ़ाए जाता है, क्योंकि वो भगवान शिव श्रीहरि की पटरानी हैं और तुलसी जी ने अपनी तपस्या से भगवान श्रीहरि को पतिरूप में प्राप्त किया था.

वहीं ये कहावत ये भी है कि एक बार गणेश जी गंगा किनारे तप कर रहे थे तो वहीं माता तुलसी, अपने विवाग की इच्छा को पूरी करने के लिए तीर्थ यात्रा कर रही थीं. सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए वो एक दिन उसी गंगा के तट पर जा पहुंची जहां भगवान गणेश तप कर रहे थे.

भगवान गणेश को तप करते देख वो उन पर मोहित हो गई और उन्होंने गणेश भगवान से विवाह का मन बना लिया. उन्होंने गणेश जी की तपस्या को भंग करते हुए उनसे विवाह करने का प्रस्ताव रखा. तपस्या भंग होने से गुस्साएं गणेश जी ने उनसे विवाग का प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा कि वो ब्रह्माचारी हैं और इस बात पर तुलसी माता ने उन्हें श्राप दिया कि उनके दो विवाह होंगे. इस पर गणेश जी तुलसी माता को श्राप देते हैं कि उनका विवाह एक असुर शंखचूर्ण से होता है.

तुलसी माता ये श्राप सुनकर गणेश जी से माफी मांगी तब भगवान गणेश जी उन्हें क्षमादान देते हुए कहा कि वो सतयुग में भगवान विष्णु और कृष्ण जी की प्रिय होने के साथ कलयुग में संसार को जीवन और मोक्ष देंगी लेकिन मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना अब अशुभ माना जाएगा उसी दिन से भगवान गणेश जी की पूजा में कभी भी तुलसी नहीं चढ़ाई जाती है.

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First published: 19 February 2020, 12:12 IST
 
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