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विश्वकर्मा पूजा 2018 : ऐसे करें भगवान विश्वकर्मा की पूजा, नौकरी में होगी तरक्की, कारोबार में लाभ

कैच ब्यूरो | Updated on: 16 September 2018, 14:19 IST

पूरे देश में सोमवार यानि 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती मनाई जाएगी. भगवान विश्वकर्मा को देव शिल्पी कहा जाता है. क्योंकि उन्होंने सतयुग में स्वर्गलोक, त्रेतायुग में लंका, द्वापर में द्वारका और कलियुग में जगन्नाथ मंदिर की विशाल मूर्तियों का निर्माण किया है. ऋगवेद में इनके महत्व का वर्णन 11 ऋचाएं लिखकर किया गया है.

भगवान विश्वकर्मा की पूजा अर्चना करने से व्यापार-कारोबार में वृद्धि और नौकरी में तरक्की होती है. भगवान विश्वकर्मा अपने भक्तों की पूजा-पाठ से खुश होकर उन्हें धनवान भी बना सकते हैं. ऐसे में भगवान विश्वकर्मा की पूजा के दौरान कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना आवश्यक है.

भगवान विश्वकर्मा की पूजा का शुभ मुहूर्त

विश्वकर्मा जयंती सोमवार यानि 17 सितंबर को मनाई जाएगी. भगवान विश्वकर्मा की पूजा का शुभ मुहूर्त इस बार वृश्चिक लग्न जो कि सुबह 10:17 बजे से 12:34 तक है. जो विशेष लाभकारी व सफलतादायी है, क्योंकि मंगल पराक्रम भाव में उच्च का बैठा है. भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधि-विधान से करने पर विशेष फल प्रदान करती है. सबसे पहले पूजा के लिए जरूरी सामग्री जैसे अक्षत, फूल, चंदन, धूप, अगरबत्ती, दही, रोली, सुपारी, रक्षा सूत्र, मिठाई, फल आदि की व्यवस्था कर लें.

इसके बाद फैक्ट्री, वर्कशॉप, ऑफिस, दुकान आदि के स्वामी को स्नान करके अपनी पत्नी के साथ पूजा के आसन पर बैठना चाहिए. इस दौरान कलश की स्थापना करनी चाहिए. उसके बाद विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए. ध्यान रहे भगवान विश्वकर्मा की पूजा धैर्य के साथ करं यानि जल्दबाजी ना करें. ध्यान रहे पूजा सम्पन्न होने के बाद अपने ऑफिस, दुकान या फैक्टरी के साथियों व परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही पूजा स्थान को छोड़ें.

 

क्या है विश्वकर्मा पूजा का आध्यात्मिक महत्व

भगवान विश्वकर्मा की पूजा हर व्यक्ति को करनी चाहिए. क्यों कि भगवान विश्वकर्मा सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी कर्म सृजनात्मक है, जिन कर्मो से जीव का जीवन संचालित होता है. उन सभी के मूल में विश्वकर्मा है. अतः उनका पूजन जहां प्रत्येक व्यक्ति को प्राकृतिक ऊर्जा देता है वहीं कार्य में आने वाली सभी अड़चनों और बाधाओं को समाप्त कर देता है.

17 सितंबर को ही क्यों होती है विश्वकर्मा पूजा

बता दें कि कि भगवान विश्वकर्मा का जन्म अश्विन मास के प्रतिपदा को हुआ था, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि लगभग सभी मान्यताओं के अनुसार यही एक ऐसा पूजन है, जो सूर्य के पारगमन के आधार पर तय होता है. इसीलिए प्रत्येक वर्ष विश्वकर्मा पूजा 17 सितम्बर को की जाती है.

स्कंद पुराण के अंतर्गत विश्वकर्मा भगवान का परिचय “बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी. प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च. विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति” श्लोक के जरिए मिलता है. इस श्लोक का अर्थ है महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मविद्या की जानकार थीं. उनका विवाह आठवें वसु महर्षि प्रभास के साथ संपन्न हुआ था. विश्वकर्मा इन दोनों की ही संतान थे. विश्वकर्मा भगवान को सभी शिल्पकारों और रचनाकारों का भी इष्ट देव माना जाता है.

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First published: 16 September 2018, 14:14 IST
 
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