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पैरालिंपिक के गोल्ड मेडलिस्ट मरियप्पन को हर ओर से मिल रही हैं बधाइयां, जानिए उनकी संघर्ष की गाथा

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 September 2016, 14:24 IST
(एजेंसी)

रियो के पैरा ओलंपिक (शारीरिक रूप से अक्षम खिलाड़ियों के बीच कराई जाने वाली स्पर्धा) में भारत के लिए मरियप्पन थांगवेलू ने हाई जंप में पहला गोल्ड जीता है.

मरियप्पन के अलावा टी4 ऊंची कूद में वरुण भाटी ने कांस्य पदक जीत कर पैरा ओलंपिक में भारत को एक नई पहचान दिलाई है.

देश के लिए मेडल जीतने के बाद दोनों खिलाड़ियों के लिए न सिर्फ राजनीतिक बल्कि खेल जगत और फिल्मी जगत सेे भी बधाइयां मिलने का तांता लगा हुआ है.

मरियप्पन और भाटी को महानायक अमिताभ बच्चन के अलावा, आमिर खान, अनुष्का शर्मा, पूर्व क्रिकेटर और भारत रत्न सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग समेत कई लोगों ने शुभकामनाएं दी हैं.

इसके साथ ही तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने ऊंची कूद में गोल्ड पदक जीतने वाले मरियप्पन के लिए दो करोड़ रुपये के नगद पुरस्कार की घोषणा की.

इससे पूर्व मरियप्पन ने इस गोल्ड को जीतने के लिए कितना संघर्ष किया है, इससे आम जनता आज भी अछूती है. देश को तो बस इतना लग रहा है कि रियो से हमारे लिए कोई तो गोल्ड लाया, लेकिन इस गोल्ड के पीछे जो कहानी छिपी हुआ है, वो हर किसी की आंख में आंसू ला देगी.

मरियप्पन एक नाम, जो दिव्यांग है, लेकिन उसने अपने इसी दिव्यांगता को अपना हथियार बनाया और वो कर दिखाया जो पूर्ण रूप से स्वस्थ्य खिलाड़ी भी नहीं कर पाए.

मरियप्पन का जन्म तमिलनाडु के सलेम जिले के पेरियावडमगेट्टी गांव में हुआ था. उनका परिवार काफी गरीब है. आज के समय में उनकी मां सब्जियां बेचकर अपने परिवार का गुजारा करती हैं और अपने बेटे को हौसला देती हैं, कि उन्हें अपने देश के लिए गोल्ड जीतना है.

मरियप्पन के पिता ने 10 साल पहले परिवार को छोड़ दिया था. उसके बाद से ही उनका परिवार काफी तंग हालत जिंदगी गुजार रहा है.

बचपन के दिनों में मरियप्पन वॉलीबॉल खेला करते थे. जब वे पांच साल के थे तो स्कूल जाते समय एक वाहन दुर्घटना में उनका दायां पैर बुरी तरह से जख्मी हो गया और उसमें स्‍थायी रूप से कमी रह गई.

मरियप्पन आज भी अपने इलाज के लिए तीन लाख रुपये का लोन चुका रहे हैं. इस दुर्घटना में उनके परिवार को कहीं से भी किसी तरह की सहायता नहीं मिली और उनका परिवार आज भी उस दुर्घटना का केस लड़ रहा है. लेकिन इंसाफ तो उनके लिए जैसे आज भी कोसों दूर है.

मरियप्पन की मां ने संघर्ष करके उन्हें बिजनेस एडमिनिस्‍ट्रेशन में ग्रेजुएट कराया. लेकिन आज तक उन्हें नौकरी नहीं मिल पाई. उनका पूरा परिवार एक कमरे में रहता है, जिसके लिए वे 500 रुपये प्रति महीने चुकाते हैं.

गोल्‍ड मेडल जीतने के बाद खेल मंत्रालय ने 75 लाख और तमिलनाडु सरकार ने दो करोड़ रुपये देने का ऐलान किया है.

गौरतलब है कि पैरालिंपिक खेलों में यह भारत का तीसरा ही स्‍वर्ण पदक है. इससे पहले 1972 में मुरलीकांत पेटकर ने स्वीमिंग और 2004 में देवेंद्र झाझड़िया ने जेवेलिन थ्रो में गोल्‍ड जीता था.

First published: 11 September 2016, 14:24 IST
 
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