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आर्थिक महाशक्तियों का ही खेल है ओलंपिक

बिनो के जॉन | Updated on: 23 August 2016, 8:24 IST
QUICK PILL
  • रियो ओलंपिक 2016 में पीवी सिंधू को मिले रजत और साक्षी मलिक को मिले कांस्य पदक से भारत में खेल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को प्रोत्साहन मिलेगा. इन दोनों पदकों ने निश्चित तौर महिलाओं से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने का काम किया है.
  • वास्तव में पदक का सीधा संबंध इस बात से है कि कौन देश आर्थिक रूप से कितना शक्तिशाली है. जैसे ही कोई देश आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरता है, उसी अनुपात में खेलों में उसका प्रदर्शन सुधरता है.
  • बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, बेहतर योजना और फंड की प्रचुरता से कई चीजें आसान हो जाती है.
  • रियो में भारत चार खेलों में चौथे स्थान पर रहा. अगर हमारे पास बेहतर कोच और इच्छाशक्ति होती तो हम शायद इन कोशिशों को पदक में तब्दील कर सकते थे.

रियो ओलंपिक 2016 में पीवी सिंधू को मिले रजत और साक्षी मलिक को मिले कांस्य पदक से भारत में खेल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को प्रोत्साहन मिलेगा. इन दोनों पदकों ने निश्चित तौर महिलाओं से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने का काम किया है.

लेकिन यह दो मेडल भारत जैसे बड़े देश के लिए सांत्वना पुरस्कार की तरह है. प्रत्येक चार साल पर आयोजित होने वाले ओलंपिक खेल भारत की पोल खोल देते हैं.

मकसद का अभाव

हमारा सबसे बड़ा दुख यह है कि हम इस बार पिछले ओलंपिक के प्रदर्शन को बनाए रखने में विफल रहे. लंदन ओलंपिक में भारत को छह पदक मिले थे. अधिक पैसा खर्च करने के बावजूद भी हम ओलंपिक के लिए शायद ही कभी तैयार हो पाते हैं.

अब हमारे पास ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट जैसी निजी पहल है और इससे एथलीटों को मदद मिली है. ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट की शुरुआत पूर्व ओलंपियंस ने मिलकर की है. लेकिन जिस तरह से हमारे खेल संघ काम करते हैं, वह सभी प्रयासों पर पानी फेर देेता है.

रियो में भारत चार खेलों में चौथे स्थान पर रहा. अगर हमारे पास बेहतर कोच और इच्छाशक्ति होती तो हम शायद इन कोशिशों को पदक में तब्दील कर सकते थे. हालांकि हमारे एथलीट के दिमाग में कभी स्वर्ण पदक नहीं होता और न ही उन्हें खुद पर भरोसा करना सिखाया जाता है. ओलंपिक में चार खेलों में बाहर होना हमारे तेजी से मजबूत होते देश के सपने की हवा निकालता है.

पहली दुनिया से मुकाबला नहीं

दरअसल हम एक बीच की स्थिति वाले देश हैं. इसलिए ओलंपिक में खराब प्रदर्शन को लेकर दुखी होने का कोई मतलब नहीं है. कारण यह है कि ओलंपिक खेलों की रूपरेखा पहली दुनिया के देशों ने तैयार की और यह उन्हीं के लिए ही था.

वास्तव में पदक का सीधा संबंध इस बात से है कि कौन देश आर्थिक रूप से कितना शक्तिशाली है. जैसे ही कोई देश आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरता है, उसी अनुपात में खेलों में उसका प्रदर्शन सुधरता है. बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, बेहतर योजना और फंड की प्रचुरता से स्थितियां बदलती चली जाती हैं.

ओलंपिक के पदकों की सूची में आपको टॉप 10 में कोई अफ्रीकी या विकासशील एशियाई देश नजर नहीं आएगा.

आर्थिक महाशक्ति की रैकिंग भी इसी की तरह है. 1960 में ओलंपिक शुरू होने के बाद से इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है. 1968 में ओलंपिक में सोवियत यूनियन ने 50 स्वर्ण पदक जीते जबकि अमेरिका को 33 स्वर्ण पदक मिले. पूर्वी जर्मनी को 20 जबकि पश्चिमी जर्मनी को 13 और जापान 13 स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहा.

2000 में अमेरिका को 37 स्वर्ण पदक मिले और रूस 32 स्वर्ण पदक के साथ दूसरे नंबर पर रहा. 28 स्वर्ण के साथ चीन तीसरे नंबर पर रहा जबकि ऑस्ट्रेलिया चौथे नंबर पर रहा. ब्रिटेन 11 स्वर्ण पदक के साथ 10वें स्थान पर रहा.

औपनिवेशिक काल के बाद के ओलंपिक में शीर्ष 10 देशों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है. बस उनकी स्थिति ऊपर नीचे हुई है.

चीन का प्रभाव

खेलों की दुनिया में चीन का उदय उसकी आर्थिक ताकत से जुड़ा है. वास्तव में 1960 में चीन की स्थिति भारत जैसी रही और उसे महज एक रजत पदक मिला. 1968 में भी यही स्थिति रही. लेकिन 2000 में चीन 28 स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहा. वहीं बीजिंग ओलंपिक में चीन को घरेलू लाभ मिला और वह 51 स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहा. 

बीजिंग ओलंपिक में चीन 40 सालों में पहली बार अमेरिका को दूसरे स्थान पर ढकेलने में सफल रहा. हालांकि इस सदी में चीन आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभर चुका था. 2006 में चीन की जीडीपी 2.6 ट्रिलियन डॉलर थी जो पिछले साल बढ़कर 9.4 ट्रिलियन डॉलर हो गई. भारत की जीडीपी अभी भी 2 ट्रिलियन डॉलर बनी हुई है.

संयोग नहीं है जीतना

हालांकि हमारे लिए यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि खेल भावना के लिए जाने वाले देश ब्राजील और अर्जेंटीना ओलंपिक में सबसे बुरे प्रदर्शन वाले देश हैं. ऐसा कोई खेल नहीं है जिसमें अर्जेंटीना की स्थिति खराब हो. रियो में फुटबॉल, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल, टेनिस और वॉलीबॉल में अर्जेंटीना की टीम सेमीफाइन तक पहुंची. ब्राजील की भी कुछ ऐसी ही कहानी रही.

हालांकि भारत के उलट इन दोनों देशों ने ऐसे खिलाड़ी पैदा किए गए है, जिनकी हम तारीफ करते हैं. अर्जेंटीना पदक सूची में 27वें स्थान पर रहा. वहीं आयोजक होने के बावजूद ब्राजील 13वें पायदान पर पहुंचा और उसे 7 स्वर्ण पदक मिले. यह लंदन ओलंपिक में जीते गए स्वर्ण पदक से तीन ज्यादा रहा.

खेलों में बेहतर होने के बावजूद दोनों देश तैराकी में, एथलेटिक्स में पीछे हैं. दोनों देश शीर्ष देशों की तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर का मुकाबला नहीं कर सकते.

कह सकते हैं ओलंपिक औपनिवेशिक देशों का खेल नहीं है. हालांकि यह देश ओलंपिक में शिरकत करते हैं और इनसे बस वैश्विक मंच पर होने की इनकी मौजूदगी का पता चलता है.

हालांकि यह उम्मीद की मजबूत किरण है. अधिकांश देश को एक भी स्वर्ण नहीं मिला. भारत भी इनमें शामिल है. वहीं फिजी जैसे छोटे द्वीप को एक स्वर्ण पदक मिला. कतर जैसा देश दूसरे देशों के एथलीट को खरीदता है ताकि वह मेडल अर्जित कर सके.

दक्षिण अफ्रीका कभी फुटबॉल वर्ल्ड कप का आयोजन कर चुका है. इस बार इसकी रैंकिंग 30वीं है. दक्षिण अफ्रीका को दो स्वर्ण के साथ कुल 10 स्वर्ण पदक मिले हैं. वहीं दक्षिण कोरिया आठवें नंबर पर रहा. दक्षिण कोरिया को 9 स्वर्ण पदक मिले.

इसके अलावा कीनिया और जमैका जैसे देश हैं जिन्हें अप्रत्याशित विजेता कहा जाता है. वहीं सोवियत संघ से टूटकर अलग हुए देशों को महज 10 पदक मे सिमटना पड़ा.

अर्थव्यवस्था से इतर

आर्थिक महाशक्ति होने से इतर अन्य स्थिति भी है. वैश्विक विशेषज्ञ एंडर्स एरिक्सन बताते हैं कि 10,000 घंटे की प्रैक्टिस आपको किसी भी क्षेत्र में विजेता बना सकती है. उन्होंने 1993 में यह सिद्धांत दिया था. माल्कम ग्लैडवेल ने इस सिद्धांत को  उठाकर 2008 में अपनी मशहूर किताब आउटलायर्स लिख डाली. लेकिन एरिक्सन ने अपनी हालिया किताब में बताया है कि 10,000 घंटे का नियम कोई निर्धारित नियम नहीं है.

एरिक्सन का कहना है कि चैंपियन बनने के लिए लगातार प्रैक्टिस करने की जरूरत होती है. भारत समेत अधिकांश देश कुछ ही घंटों में प्रैक्टिस खत्म कर देते हैं. अधिकांश देशों को बेहतर कोच नहीं मिलते. अधिकांश भारतीय एथलीट बिना किसी तकनीक और योजना के लगातार प्रैक्टिस करते रहते हैं.

हैदराबाद में बना पुलेला गोपीचंद बैडमिंटन एकेडमी वैसी जगह है जहां खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण दिया जाता है. भारत और अन्य छोटे देशों के पास ऐसे ही शानदार केंद्रों की जरूरत है. वास्तव में भारत के कई स्टेडियम साल भर खाली पड़े रहते हैं. खेलों की पूरी कमान कुछ कोच और कुछ संस्थाओं के पास है. वहीं विकसित देशों में इसकी संख्या बेहद अधिक है.

भारत को खेल संस्कृति की जरूरत है. भारत के साथ पहले ही कई समस्याएं हैं. आनुवांशिक तौर पर खेले के लिए माकूल नहीं होना, खेल संस्कृति का अभाव और बच्चों को खेल में जाने देने का जोखिम नहीं उठाने की प्रवृत्ति के साथ हम संस्कृति और श्रम को लेकर उदासीन भी रहते हैं.

First published: 23 August 2016, 8:24 IST
 
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