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स्कूल ड्रॉपआउट ने बनाया चलने वाला घर

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 September 2016, 15:00 IST

तमिलनाडु स्थित रामनाथपुरम के नजदीक मेलापुडुकुड्डी में रहने वाले 65 वर्षीय एम सहुल हमीद ने एक ऐसा घर बनाया है जो चल सकता है. हालांकि एक स्कूल ड्रॉपआउट हमीद को इसे बनाने में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा और उनके घरवालों समेत तमाम लोग उन्हें पागल भी कह रहे थे. 

रैफ्ट फाउंडेशन टेक्नोलॉजी पर आधारित इस घर को कक्षा पांच से ड्रॉपआउट और सऊदी अरब में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में करीब दो दशकों तक काम करने वाले हमीद ने बनाया. सऊदी अरब में काम करने के दौरान उन्होंने भवन निर्माण के लिए प्री-फैब्रीकेटेड स्ट्रक्चर्स और कई फाउंडेशन तकनीक सीखीं थीं.

द हिंदू में छपी खबर के मुताबिक कुछ साल पहले जब हमीद घर वापस आए तो उन्होंने रैफ्ट टेक्नोलॉजी पर आधारित सॉलिड फुटिंग के जरिये मकान बनाने का मन बनाया. लेकिन उनकी इस बात को सुनकर उनके घरवालों, रिश्तेदारों और मित्रों ने काफी विरोध किया. 

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कई ने कहा कि ऐसे मकान नहीं बनाया जाता. अगर तुमने ऐसा मकान बनाया तो यह गिर जाएगा. लेकिन हमीद ने किसी की नहीं सुनी और 25 लाख रुपये में अपने मकान बनाने का काम शुरू कर दिया.

लेकिन अब उनके दृढ़ निश्चय और लगन के बल पर मेलापुडुकुड्डी में उनका 1,080 वर्गफीट का दो मंजिला घर मजबूती से खड़ा हुआ है. छह साल पहले जब उन्होंने 90 सेंटीमीटर मोटाई वाला कंक्रीट स्लैब डाला और उसपर पिलर्स खड़े किए, ग्रामीणों ने उनपर जमकर तानाकशी की और कहा कि देखो यह अपने पैसे और वक्त की बर्बादी कर रहा है.

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लेकिन हमीद कहते हैं कि उन्होंने सभी व्यक्तियों को गलत साबित कर दिया. उनकी पत्नी और पांच बच्चों जिनमें से तीन इंजीनियरिंग कर रहे हैं, ने अपनी आपत्ति जताई थी, लेकिन उन्हें रोक नहीं सके.

हमीद की पत्नी सारीगथुल बेगम कहती हैं, "हम इस घर के ढांचे की मजबूती को लेकर काफी संशकित थे लेकिन मेरे पति ने कहा था कि यह मजबूत होगा, और यह मजबूत है." इसके बाद उन्होंने नजदीक में इसी तकनीक पर आधारित एक और मकान बनाने का प्रस्ताव रखा और उनके पूरे परिवार ने अपनी सहमति जताई.

हमीद कहते हैं कि ग्राउंड फ्लोर पर तीन बेडरूम और पहली मंजिल पर दो बेडरूम वाले इस घर को स्लैब के नीच आयरन रोलर्स (लोहे के बेलन) लगाकर चलाया जा सकता है. हालांकि उन्होंने इस घर को चलने के लिए नहीं बनाया है. उन्होंने कहा, "मैं कुछ नया करना चाहता था और चलने वाला घर बनाया."

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यह तकनीक रेतीली जमीन के लिए काफी सटीक है और वे इसमें दिलचस्पी रखने वाले लोगों से अपने अनुभव बांटने को तैयार हैं. इतना ही नहीं हमीद को जिले के तमाम इंजीनियरिंग कॉलेजों ने सिविल इंजीनियरिंग के छात्रों को इस बारे में जानकारी देने के लिए भी बुलाया.

मदुरयै, देवकोट्टाई, रामेश्वरम समेत कई अन्य स्थानों से इंजीनियरों ने आकर उनका घर देखआ और उनकी ईजाद तकनीक की तारीफ की. वो कहते हैं कि इसी तकनीक का इस्तेमाल करके घूमने वाले मकान भी बनाए जा सकते हैं.

First published: 15 September 2016, 15:00 IST
 
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