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'छत्तीसगढ़ की ये तीन चावल की किस्में कर सकती हैं कैंसर का इलाज'

कैच ब्यूरो | Updated on: 29 April 2018, 14:06 IST

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी) रायपुर और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) मुंबई संयुक्त रूप एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं जिसमें कहा गया है कि चावल से कैंसर का इलाज संभव है. छत्तीसगढ़ के जनजातीय किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर खेती किये जाने वाली तीन पारंपरिक चावल किस्में इस शोध में शामिल हैं. जिनमें फेफड़ों और स्तन कैंसर का इलाज करने की क्षमता बताई गई है.

हालांकि उनके शुरुआती निष्कर्षों की उन कार्यकर्ताओं द्वारा आलोचना की गई है जो कैंसर पर जागरूकता के लिए काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि ऐसे दावों पर विश्वास करना मुश्किल है और इसे चिकित्सा विज्ञान द्वारा प्रमाणित नहीं किया गया है.

लाईचा, गौथान और महाराजी ये तीन पारंपरिक चावल किस्मों की लंबे समय से राज्य में बड़े पैमाने पर खेती की जाती है. छत्तीसगढ़ के धम्मती, कोंडागांव और कंकड़ जिले 'लिचा' से त्वचा रोगों का इलाज करने के लिए जाने जाते हैं.

महासमंद और धामती जिलों के आसपास 'गौथान' और 'महाराजी' स्थानीय लोगों के बीच औषधीय गुण रखने के प्रसिद्द है. हालांकि इनका कभी वाणिज्यिक रूप से इस्तेमाल नहीं किया गया. क्योंकि अधिकांश किसानों ने इन किस्मों की खेती करना बंद कर दिया था.

आईजीकेवी के छात्र जो कि पिछले दो सालों से इन किस्मों पर काम कर रहे हैं और उन्होंने बीएआरसी को आगे के शोध के लिए तीन चावल किस्मों के नमूने लिए है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ‘चावल की इन तीनों किस्मों में शरीर की अन्य कोशिकाओं को प्रभावित किए बिना लंग्स (फेफड़े) और स्तन कैंसर का इलाज करने की क्षमता है.

शोध के दौरान लंग्स कैंसर के मामले में गठवन धान ने 70 प्रतिशत, महाराजी धान ने 70 प्रतिशत और लाइचा धान ने 100 फीसदी कैंसर कोशिकाओं को नष्ट कर दिया. जबकि, स्तन कैंसर की कोशिकाओं को गठवन ने 10 प्रतिशत, महाराजी ने 35 प्रतिशत और लाइचा धान ने सर्वाधिक 65 फीसदी तक नष्ट कर दिया.’

First published: 29 April 2018, 12:07 IST
 
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