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फेसबुक का मायाजालः फ्री बेसिक्स या बिजनेस टैक्टिक्स

अमित कुमार बाजपेयी | Updated on: 23 January 2016, 18:05 IST
QUICK PILL
  • देश\r\nमें इंटरनेट की शुरुआत से लेकर\r\nअब तक सेवाएं सस्ती हुई हैं\r\nऔर कंपनियों का व्यापार बढ़ता\r\nगया है. यूजर्स\r\nकी बढ़ती तादाद में ई-कॉमर्स,\r\nमोबाइल\r\nमैन्यूफैक्चरर्स, टेलीकॉम\r\nऑपरेटर्स को बड़ा ग्राहक वर्ग\r\nनजर आ रहा है.
  • फेसबुक\r\nमौजूदा इंटरनेट यूजर्स की\r\nसंख्या बढ़ाकर अपना दायरा\r\nबढ़ाना चाहता है. इसके\r\nलिए वह ग्राहकों को मनमुताबिक\r\nसेवाएं देने के लिए फ्री बेसिक्स\r\nका प्रचार-प्रसार\r\nकर रहा है.

आज से 17 साल पहले कानपुर के डमकिन्स इंटरनेट कैफे में जब पहली बार इंटरनेट का इस्तेमाल हुआ तब इस मायाजाल के बारे में लोगों को कुछ पता ही नहीं था. लोगों ने सिर्फ सुना था कि इंटरनेट बड़े कमाल की चीज है.

उस वक्त एक घंटा इंटरनेट सर्फिंग का चार्ज 150 रुपये था. पहली बार पहुंचा तो बहुत ज्यादा कंप्यूटर के बारे में भी नहीं पता था लेकिन जितना सुना था उसके मुताबिक इंटरनेट एक्सप्लोरर खोला, कुछ वेबसाइटें खोलीं, देखी और मायाजाल में इधर-उधर भटकता रहा.

कुछ ही सालों में गली-मोहल्लों में इंटरनेट-साइबर कैफे खुलने शुरू हो गए. इंटरनेट सर्फिंग के रेट वाई2के यानी साल 2000 के आते-आते करीब आधे होकर 50 से 70 रुपये प्रतिघंटा तक गिर गए. घंटे बढ़ाने या मेंबरशिप लेने पर रेट और कम हो जाता था.

इंटरनेट का मायाजाल तेजी रंग बदल रहा था. 2010 तक 10 रुपये प्रतिघंटा तक के रेट हो गए. लेकिन इस दौरान ही डाटा कार्ड-मोबाइल इंटरनेट ने रफ्तार पकड़ी और लोग अपने लैपटॉप-पीसी-मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगे. इंटरनेट आम जिंदगी का हिस्सा बन गया.

सोशल मीडिया का उदय

लेकिन यह कहानी बताने का एक मकसद है कि इस दौरान सूचना प्रौद्योगिकी को पंख लग गए. सभी स्मार्टफोन रखने वाले जेब में इंटरनेट लेकर घूम रहे हैं. इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में सोशल मीडिया की क्रांति ने लोगों को सीमित दायरों से आगे किया और सबका नेटवर्क बढ़ता गया. ऑरकुट के बाद फेसबुक ने हर इंटरनेट यूजर पर कब्जा सा कर लिया. मुफ्त में सोशल मीडिया और अपनों-परायों से नजदीकी के फेर में कब सभी को इसकी लत लग गई पता ही नहीं चला.

आज तकरीबन हर यूजर सुबह आंख खुलते ही सोशल मीडिया विशेषकर फेसबुक पर नोटिफिकेशंस देखता है और रात को सोने से पहले भी इसे जांचता है. दिन भर जो टाइम इस पर बीतता है वो अलग. आलम यह हो गया कि मोबाइल-टेलीकॉम ऑपरेटरों ने इंटरनेट-डाटा रिचार्ज पैक की जगह अब फेसबुक, व्हाट्सऐप के लिए भी अलग-अलग पैक निकाल दिए हैं.

फेसबुक बन गई जरूरत

इस फेसबुक की इतनी प्रसिद्धि और विस्तार ने इसे आज दुनिया भर के इंटरनेट यूजर्स में मशहूर नहीं बल्कि जरूरत बना दिया है. हालांकि फेसबुक इससे इतना कमा रहा है कि शायद ही आप सोच सकें. उसका अपना बिजनेस प्लान है जो सभी को मुफ्त में सेवा देकर पूरा हो रहा है.

पर अब वक्त फेसबुक के लिए दुनिया में बादशाहत कायम करने का आ चुका है. उसे अपना दायरा बढ़ाने के लिए नए-नए तरीके एख्तियार करने पड़ रहे हैं. दुनिया की इंटरनेट से दूर आबादी अब फेसबुक के निशाने पर है. कैसे भी करके उन तक पहुंचना इसका मकसद है.

इंटरनेट डॉट ओआरजी की शुरुआत

इसके लिए फेसबुक ने तकरीबन दो साल पहले इन लोगों तक पहुंच के लिए इंटरनेट डॉट ओआरजी कॉन्सेप्ट लॉन्च किया. जिसे बाद में फ्री बेसिक्स में तब्दील कर दिया गया. फ्री बेसिक्स यानी मोबाइल में बिना इंटरनेट पैक रिचार्ज कराए इंटरनेट इस्तेमाल करना. मतलब मुफ्त इंटरनेट. लेकिन यह मुफ्त इंटरनेट संपूर्ण न होकर सीमित है. यानी यह फ्री (मुफ्त) तो है लेकिन संपूर्ण नहीं है.

फ्री बेसिक्स जैसे शब्द से ही पता चलता है फ्री में बेसिक्स. सीधे शब्दों में कहें तो इंटरनेट की कुछ जरूरी सेवाएं मुफ्त में.

एक बात गौर फरमाने वाली है कि दुनिया में मुफ्त कुछ भी नहीं होता, हर चीज की कीमत होती है. ऊपर से जब बात किसी वैश्विक कंपनी की हो तो वो मुनाफा न कमाए ऐसा कैसे हो सकता है. इसलिए फ्री बेसिक्स के लिए फेसबुक से जुड़ने वाली टेलीकॉम, ऐप-वेब डेवलपर्स, मोबाइल मैन्युफैक्चरर्स आदि का मकसद साफ है कि उन्हें मुनाफा कमाना है और वे फेसबुक से जुड़कर यह लक्ष्य पाना चाहते हैं.

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पर जहां इंटरनेट ही नहीं है वहां मुफ्त में यह सेवा पहुंचाने के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने, सेवा देने, तकनीकी सहायता देने में इन कंपनियों को शुरुआत में रुपये खर्च करने पड़ेंगे. और अपने बिजनेस प्लान के तहत इसके बाद इनका मुनाफा कमाने का दौर शुरू हो जाएगा.

मुनाफा कैसे कमाएंगी कंपनियां

इसे कुछ यूं समझें तो बेहतर होगा. 2000 के दशक में बैंकिंग सेक्टर ने तेजी विस्तार किया. धड़ाधड़ शाखाएं खोलीं, ग्राहकों को बेहतर सेवा और हर वक्त बैंकिंग मुहैया कराने के उद्देश्य से एटीएम (ऑटोमेटेेड टेलर मशीन) कार्ड की मुफ्त सेवा शुरू की.

ग्राहक जब चाहे जहां चाहे पैसा निकाल ले, बैलेंस देख ले, चेक बुक का आवेदन कर दे, पैसे जमा कर दे, बिल का भुगतान कर दे समेत तमाम सेवाएं प्रदान की जाने लगीं. देखते ही देखतेे तकरीबन हर खाताधारक एटीएम कार्ड वाला हो गया.

लेकिन सभी ग्राहकों को मुफ्त में एटीएम सेवा का चस्का लगाने के बाद बैंकों ने एटीएम के लेनदेन सीमित कर दिए और शुल्क लेना शुरू कर दिया. ग्राहकों को भी पैसा देना नहीं अखरा और एक माह में कितनी बार एटीएम इस्तेमाल किया और अकाउंट से कितना पैसा कटा पता ही नहीं चला. ऊपर से एटीएम कार्ड का सालाना शुल्क भी वसूला ही जा रहा था.

यानी पहले मुफ्त में सेवा लेने की लत लगाई और फिर सेवा इस्तेमाल पर वसूली शुरू कर दी. इंटरनेट बैंकिंग में भी बैंकों ने यही काम किया. जबकि मोबाइल कंपनियों ने एसएमएस पैक देकर पहले तो जमकर एसएमएस भेजने की आदत डाली. जब सभी की आदत पड़ गई तो साल में उन दिनों को रेस्ट्रिक्टेड करते हुए सामान्य शुल्क लागू कर दिया, जिस दिन लोग सबसे ज्यादा एसएमएस करते थे.

फ्री बेसिक्स भी मुफ्त लत लगाने का जरिया

तकनीकी के दुनिया के धुरंधरों की माने तो फ्री बेसिक्स भी कुछ इसी तरह की मुफ्त लत लगाने का जरिया है. इसके तहत पहले टेलीकॉम कंपनियों के ग्राहकों की पहुंच बढ़ाना. यानी कस्बों-ग्रामीण इलाकों के जिन लोगों के पास मोबाइल फोन नहीं है या बेसिक मोबाइल है कि जगह उन्हें स्मार्ट फोन मुहैया कराना. इससे सीधे-सीधे मोबाइल हैंडसेट मैन्यूफैक्चरिंग से जुड़ी कंपनियां मुनाफा कमाएंगी फिर उन्हें सिम कार्ड-सर्विस देकर मोबाइल-टेलीकॉम ऑपरेटर पैसा वसूलेंगे.

भले ही यह नए मोबाइल यूजर इंटरनेट-डाटा पैक रिचार्ज नहीं कराएंगे लेकिन उन्हें टॉक टाइम और वैलेडिटी रिचार्ज के लिए तो रकम खर्च करनी होगी. इसके बाद फ्री बेसिक्स यानी मुफ्त इंटरनेट का तमाशा शुरू होगा.

विशेषज्ञों की मानें तो यह एक मायाजाल जैसा फ्रेमवर्क है. यानी इंटरनेट यूजर को मुफ्त में सीमित सर्फिंग-ब्राउजिंग करने दो और इसके साथ ही ऐसे कंटेट की भी झलक दिखाओ ताकि उसके मन में सीमित दायरे के बाहर जाकर मुक्त इंटरनेट इस्तेमाल करने का लालच आ जाए. लेकिन उसे दायरे से बाहर जाने के लिए कंटेंट या सेवा के हिसाब से अलग से रकम खर्च करनी पड़ेगी.

फ्री बेसिक्स के यूजर्स को इस मुफ्त के शौक से बाहर निकालना ही इसका बेसिक है. क्योंकि इसी से फेसबुक को मुनाफा होगा. हालांकि फेसबुक इससे पहले भी फ्री बेसिक्स यूजर्स को अपनी सीमित सेवाओं के साथ ही ई-कॉमर्स व अपने व्यावसायिक हितों से जुड़ी सामग्री मुफ्त में परोसता रहेगा.

जिनके पास रोटी नहीं उसके लिए इंटरनेट की वकालत

इस चीज को समझना जरूरी है. जिस तबके के लिए फ्री बेसिक्स या मुफ्त इंटरनेट पहुंचाने की इतनी बड़ी कवायद में फेसबुक लगा है, उनके पास आज भी बिजली, पानी, शौचालय, रोजगार, भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसी मूलभूत जरूरतें पूरी तरह नहीं पहुंच सकी हैं.

जिस व्यक्ति को सबसे ज्यादा जरूरत रोटी की है उसे इंटरनेट से जोड़ना कहा तक सही है. जिस गांव में बिजली नहीं आती उस गांव के लोगों को स्मार्टफोन औऱ मुफ्त इंटरनेट का तर्क क्या है. मोबाइल और इंटरनेट चीज ही ऐसी हैं जिसकी लत किसी को भी लग सकती है.

ग्रेटर नोएडा स्थित जीएल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट के निदेशक प्रो. डॉ. राजीव अग्रवाल की माने तो फ्री बेसिक्स संचार और विकास का एक बेहतर जरिया है. लेकिन नेट न्यूट्रैलिटी का सिद्धांत इसके आड़े आता है.

मसलन फ्री बेसिक्स कुछ इस तरह है कि आप भूखे आदमी को भोजन मुहैया कराते हैं. जबकि नेट न्यूट्रैलिटी का मतलब कि व्यक्ति के सामने खाने की सामग्री के विकल्प हों. फ्री बेसिक्स के समर्थक जहां इंटरनेट से महरूम लोगों को यह सेवा मुफ्त में (भले ही सीमित दायरे में) देने की बात कर रहे हैं. वहीं, नेट न्यूट्रैलिटी के समर्थक इंटरनेट के पूरे इस्तेमाल या फिर बिल्कुल नहीं का तर्क देते हैं.

राजीव कहते हैं, "मेरा मानना है कि पहले भूखे के भोजन दो. इसके बाद वो खाने में क्या खाएगा और क्या नहीं इस पर सोचेगा."

'सेव फ्री बेसिक्स' रिक्वेस्ट

सभी को पता है कि फेसबुक ने फ्री बेसिक्स को कायम रखने के लिए टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) को एक ईमेल भेजने का अभियान शुरू किया है. मेल भेजने के लिए यूजर्स को एक पहले से लिखी इबारत को अपनी आईडी से मैं सहमत हूं कहकर हस्ताक्षर कर इसे सेंड करना होता है.

फेसबुक ने दावा किया है कि भारत में उसके मौजूदा 13 करोड़ यूजर्स में से 32 लाख यह मेल भेज चुके हैं. हालांकि ट्राई के पास विदेशियों की भी ईमेल पहुंची हैं, जिसके लिए फेसबुक को आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है.

नेट न्यूट्रैलिटी को भी समझना जरूरी

इसका मतलब है सभी को पारदर्शी व समान रूप से और मुफ्त इंटरनेट सेवा मिलती रहे. सीधे शब्दों में कहे तो दुनिया भर के हर व्यक्ति के पास इंटरनेट पर सर्फिंग, ब्राउजिंग, डाउनलोडिग, सर्चिंग, चैटिंग, डाटा ट्रांसफर, कॉलिंग, म्यूजिक, वीडियो, सोशल मीडिया समेत इसकी समस्त सेवाओं की एक समान उपलब्धता हो. फिर चाहे वो किसी देश का प्रधानमंत्री हो या एक आम आदमी.

हर व्यक्ति इंटरनेट की दुनिया में एक आम आदमी ही रहे, खास न बने और न बनाया जाए. इसके साथ ही इंटरनेट पर सेवा-सुविधाएं देने वाले डेवलपर्स, सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स के पास भी इस अनंत जंजाल में अपनी सेवाएं देने की समानता हो.

फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की घोषणा के मुताबिक, 'फ्री बेसिक्स के साथ ही हम डेवलपरों को जीरो रेटिंग वाली सेवाएं दे रहे हैं. यह बेहद शक्तिशाली है. जीरो रेटिंग नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ नहीं है.'

ट्राई ने बंद कराईं रिलायंस की मुफ्त फेसबुक सेवा

बुधवार को ट्राई ने रिलायंस कम्युनिकेशंस से फ्री बेसिक्स सेवाएं फिलबाल बंद करने के लिए कहा. कुछ हफ्ते पहले ट्राई ने डाटा सेवाओं की अलग-अलग कीमतों के लिए एक मशविरा पत्र जारी कर यह पूछा था कि दूरसंचार प्रदाता कंपनियों को तमाम वेबसाइटों, एप्लिकेशनों और प्लेटफॉर्म पर सेवाएं देने के लिए अलग कीमत तय करने की इजाजत दी जानी चाहिए या नहीं.

ट्राई के मुताबिक कुछ सेवा प्रदाता अलग-अलग डाटा टैरिफ की पेशकश कर रहे हैं जिसके तहत कुछ वेबसाइटों, एप्लिकेशनों या प्लेटफॉर्म के लिए मुफ्त या छूट वाला टैरिफ दिया जाता है. ट्राई ने लोगों से 31 दिसंबर तक सुझाव देने को कहा है.

ट्राई ने स्काइप, वाइबर, व्हॉट्स ऐप, स्नैपचैट, फ़ेसबुक मैसेंजर जैसी सेवाओं को भी नियमों के तहत करने से संबंधित 20 सवालों पर भी राय मांगी है. जिसमें प्रमुख एक सवाल यह है कि क्या ऊपर लिखी कॉलिंग सर्विस देने वाली कंपनियों को टेलीकॉम ऑपरेटर के नेटवर्क के इस्तेमाल के लिए अतिरिक्त कीमत चुकानी चाहिए या नहीं.

First published: 23 January 2016, 18:05 IST
 
अमित कुमार बाजपेयी @amit_bajpai2000

पत्रकारिता में एक दशक से ज्यादा का अनुभव. ऑनलाइन और ऑफलाइन कारोबार, गैज़ेट वर्ल्ड, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, एजुकेशन पर पैनी नज़र रखते हैं. ग्रेटर नोएडा में हुई फार्मूला वन रेसिंग को लगातार दो साल कवर किया. एक्सपो मार्ट की शुरुआत से लेकर वहां होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों-संगोष्ठियों की रिपोर्टिंग.

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