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फेसबुक और गूगल ने पहले ही भारतीय साइबर स्पेस पर एकाधिकार कर लिया है

असद अली | Updated on: 5 July 2016, 9:07 IST
QUICK PILL
सेंटर फाॅर इंटरनेट एंड सोसायटी के कार्यकारी निदेशक सुनील अब्राहम ने कैच न्यूज के साथ साक्षात्कार के दौरान भारत-अमरीका साइबर संबंधों पर प्रकाश डाला. साथ ही इस बात पर चिंता जताई कि भारतीय निगरानी नीतियां अब पुरानी हो चुकी हैं और इसीलिए हम फेसबुक और गूगल की एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को रोक पाने में नाकाम रहे. प्रस्तुत है उनसे बातचीत के कुछ अंश:

अमेरिका और भारत ने इस वर्ष के प्रारंभ में एक साइबर समझौते पर हस्ताक्षर किया हैं. क्या आप इस समझौते में कुछ ऐसे पक्ष देखते हैं, जिनका निकट भविष्य में काफी महत्वपूर्ण असर पड़ने वाला है?

उक्त समझाौते के तहत दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई है कि वे ‘इंटरनेट राज का व्यापक साझेदारी वाला माॅडल अपनाएंगे.’ व्यावहारिक रूप से इसका मतलब यह हुआ कि भारत इंटरनेट असाइंड नंबर अथॉरिटी (आईएएनए) को स्वीकार करेगा. इसके अनुसार आवंटित नाम और नंबरों के लिए इंटरनेट काॅर्पोरेशन (आईसीएएनएन) बनाने का प्रस्ताव है.

मेरे सहकर्मी प्रणेश प्रकाश कहते हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस नए समझौते के बावजूद इंटरनेट के मुख्य डोमेन नेम तंत्र पर अमेरिका का ही नियंत्रण है, जिसे हटाने पर कोई बात नहीं की गई है.

भारत को ब्राजील और अन्य उभरती इंटरनेट ताकतों के साथ मिल कर इस बात पर बल देना चाहिए था कि समझौते से पूर्व अधिकार क्षेत्र का सवाल सुलझा लिया जाए. हमें यह याद रखना चाहिए कि बहु साझेदारी माॅडल खुली और स्वनियमित साझेदारी के लिए निजी क्षेत्र द्वारा दिया गया मात्र एक फैन्सी नाम है. यद्यपि बहु साझेदारी माॅडल पारम्परिक सरकारी नियमन के पूरक के तौर पर उपयोगी है लेकिन इससे न तो मानवाधिकारों की रक्षा की जा सकती है और न ही किसी देश की सुरक्षा की सुनिश्चित होती है.

इस नई कार्ययोजना के संदर्भ में बौद्धिक संपदा अधिकारों के किन पक्षों की ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है?

बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) से संबंधित विशिष्ट भाषा पर भी सतर्कतापूर्वक ध्यान दिए जाने की जरूरत है. अमरीकी निगमों को अधिकतम आईपी अधिकार का फायदा मिलता है. परन्तु मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया जैसे सभी कार्यक्रम इसी आईपी अधिकार के नियमों के लचीलेपन पर निर्भर हैं और इसलिए भारत को अंतर-प्रशांत साझेदारी के किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर देना चाहिए जैसे ‘डिजीटल टू डजन’.

अमेरिका प्रशांत महासागर में इस डिजीटल टू डजन को जबरन स्वीकार्यता दिलाने की कोशिश कर रहा है. अगर अमेरिका के बहकावे में आकर हमने यह गलती कर दी तो स्वदेशी सुरक्षा अनुसंधान और उत्पाद विकास के क्षेत्र में हमारी प्रगति शून्य हो जाएगी. साथ ही अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी गंभीर समझौते करने पड़ेंगे. इसलिए अमेरिका-भारत साइबर संबंधों के मामले में आईपी अधिकार विस्तार और क्रियान्वयन को कार्ययोजना के दायरे में न ही रखा जाए तो बेहतर है.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही व्हाट्स एप पर रोक लगाने संबंधी एक याचिका खारिज की है. अतीत में आतंकी तार जैसी कूट संदेश सेवा को अपने लिए इस्तेमाल कर चुके हैं. इस तरह की संदेश सेवाओं के बारे में आपका क्या खयाल है?

निजता और सुरक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. एक के बिना दूसरा पाना संभव नहीं है. संदेशों का एक सिरे से दूसरे सिरे तक कूट अथवा गुप्त संकेतों में निरूपण ही आॅनलाइन निजता का आधार है. कानून का पालन करने वाले नागरिकों के लिए यह गोपनीयता जरूरी है. काॅमर्स, बैंकिंग, टेलीमेडिसिन, बुद्धिजीवी गुणवत्ता की सुरक्षा, साक्ष्य/स्रोत सुरक्षा, उपभोक्ता की गोपनीयता आदि के लिए कूट भाषा प्राथमिक आवश्यकता है. इसलिए ऊपर से लेकर नीचे तक कूट भाषा संदेशों पर प्रतिबंध लगाना व्यक्तिगत निजता और राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों पर कुठाराघात के समान है. अगर सरकार साइबर सुरक्षा का प्रचार करना चाहती है तो इसे कानून का पालन करने वाले नागरिकों के बीच एनक्रिप्शन का भी प्रचार करना चाहिए.

आतंकियों को नेट उपभेक्ताओं की प्रोफाइल देखने, निगरानी रखने और हस्तक्षेप करने से रोकना होगा. इस संदर्भ में बड़े डाटा विश्लेषकों की मदद ली जा सकती है, लेकिन पुलिस निगरानी की पुरानी विधि का कोई तोड़ नहीं है.

अगर संदिग्धों ने इन एनक्रिप्टेड चैनलों की पहचान कर ली तो निम्ननिखित खतरे हो सकते हैः

1. वे उपभोक्ताओं की इन इंटरनेट डिवाइस पर कोई खुफिया निगरानी साॅफ्टवेयर का इस्तेमाल कर सकते हैं.

2. किसी तरह का साइबर घुसपैठ या हमला कर सकते हैं.

3. सुपर कम्यूटरों के जरिये जबर्दस्त हमले को अंजाम दे सकते हैं.

स्नोडेन के खुलासों से साफ जाहिर है कि संगठित निगरानी से आतंकी हमलों को नाकाम करना संभव नहीं है और न ही संगठित अपराध को रोकना. अब तक दुनिया भर की शोध एवं सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, बहुत ही कम आतंकी हैं, जो कूट या एनक्रिप्शन का प्रयोग करते हैं. परन्तु जरूरी नहीं कि हालात हमेशा एक से रहें.

फिलहाल हमारे आईटी अधिनियम के तहत कोई समुचित एनक्रिप्शन नीति नहीं है. इतना समय कैसे लग गया और कौन से ऐसे मुख्य बिंदु हैं, जिनके आधार पर भविष्य में ऐसी कोई नीति बनाई जाएगी?

हमें बहुत सी अलग-अलग नीतियां बनाने की आवश्यकता है. हमें ऐसी नीति की जरूरत है जो एनक्रिप्शन, सभी सरकारी अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर व सभी सरकारी हस्तांतरण पर लागू हो. हमें ऐसी नीति चाहिए जो रक्षा अनुसंधान एवं क्रिप्टोग्राफी और गणित को प्रोत्साहन दे. हमें हमारी आपराधिक दंड संहिता को आधुनिक करने की जरूरत है ताकि कानूनी तौर पर सांकेतिक या कूट संदेशों को पकड़ा जा सके और आपराधिक न्याय प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जा सके.

खैर, हमें किसी बहुत व्यापक एनक्रिप्शन नीति की जरूरत नहीं है, जो कि एनक्रिप्शन का नियमन किसी तकनीक की तरह करे. इसे लागू करना बहुत ही मुश्किल होगा. इससे कानून की अवमानना ही बढ़ेगी.

निगरानी और उससे संबंधित तकनीक विभिन्न सरकारों के लिए बहस का मुद्दा रही है? सरकार द्वारा इस निगरानी संबंधी उपायों में हम स्वयं को कहां देखते हैं?

हमारे निगरानी और पाबंदी संबंधी कानून अब पुराने पड़ चुके हैं. तकनीक के साथ ही अब इनके आधुनिकीकरण की भी जरूरत है. साथ ही डाटा सुरक्षा और निजता कानून के लिए भी इनका नवीनीकरण जरूरी है. दरअसल, हमारा संगठन एक वैश्विक प्रयास का नतीजा है जो आवश्यक और समुचित है. निगरानी आधुनिकीकरण के इसके 13 सिद्धान्त हैं. ये बहुत से पक्षों से जुड़े हैं, जैसे वैधता, कानून की पालना, न्यायिक अधिकरण की अवमानना, संचार एवं व्यवस्था की एकता और बहुत से अन्य. इनमें से कुछ सिद्धान्तों को भारतीय परिप्रेक्ष्य के अनुसार ढालना होगा.

मंद पड़े अमेरिकी बाजार के मुकाबले चीन के बाद केवल भारत में एफबी और गूगल जैसी कम्पनियों के लिए अधिक संभावनाएं हैं, क्या आपको लगता है भारतीय बाजार पर अधिकार जमाने की जुगत में एफबी और गूगल भारत के साइबर स्पेस पर एकाधिकार जमाने वाले हैं?

मैं आपको एक खबर देता हूं. फेसबुक और गूगल पहले ही भारत में एकाधिकार जमा चुके हैं. कुछ डोमेन में उन्होंने प्रतिद्वंदियों का पूरी तरह सफाया कर दिया है. इसका एक सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे पास उनको प्रभुत्व जमाने से रोकने के लिए प्रभावी कानून व्यवस्था नहीं है. उदाहरण के लिए सोशल मीडिया के लिए हम डेटा पोर्टेबिलिटी का उपयोग कर सकते थे ताकि हम प्रतिस्पर्धा में उतर सकें, प्रतियोगी कानूनों के जरिये अन्य फर्मों को बाजारी ताकत के दुष्प्रभाव से बचाया जा सके, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम और निजता कानून का उपयोग बाजार की दौड़ में उपभोक्ता हितों का नुकसान न हो.

साथ ही यूरोपीय डाटा संरक्षण अधिनियम 2016 के अनुरूप आधुनिक निजता कानून को संशोधित करना होगा. इससे भारतीय कम्पनियां फेसबुक और गूगल जैसी कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगी.

First published: 5 July 2016, 9:07 IST
 
असद अली @asadali1989

Asad Ali is another cattle class journalist trying to cover Current affairs and Culture when he isn't busy not saving the world.

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