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पैसे का मुंह ताकती हमारी शोध परियोजनाएं

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • जून में सीएसआईआर प्रयोगशाला\r\nऔर सरकार के बीच उन अनुसंधानों\r\nपर काम करने की सहमति बनी थी\r\nजो भविष्य में मुनाफा कमा\r\nसकें.
  • देश\r\nके ज्यादातर अनुसंधान विदेशी\r\nसहायता पर निर्भर होंगे तो\r\nआगे स्थितियां और खराब होंगी.\r\nसरकार ने\r\nहाल ही में नेशनल न्युट्रिशन\r\nमॉनिटरिंग ब्यूरो (एनएनएमबी)\r\nको बंद करने\r\nका फैसला लिया है. आखिर\r\nसरकार के सामने यह नौबत क्यों\r\nआई?

28 अक्तूबर को एक राष्ट्रीय दैनिक अखबार में छपे लेख के मुताबिक द काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के अंतर्गत आने वाली सभी प्रयोगशालाओं ने जून में इस बात पर सहमति जताई है कि सभी शोध परियोजनाएं मुनाफा को ध्यान में रखकर चलाई जानी चाहिए.

इस सहमति के अगले ही दिन, सरकार ने नेशनल न्यूट्रिशन मॉनिटरिंग ब्यूरो (एनएनएमबी) को बंद करने का फैसला ले लिया.

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जुड़ी इन दोनों खबरों के बीच क्या संबंध है. क्या आर्थिक तंगी से जूझ रहा यह मंत्रालय महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को धनराशि जारी करने में सक्षम नहीं है? मौजूदा स्थितियां शोध परियोजनाओं को किस दिशा में ले जा रही है.

सीएसआईआर के अंतर्गत आने वाले नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड डेवलपमेंट स्टडीज से जुड़ी वरिष्ठ वैज्ञानिक एन मृणालिनी बताती हैं, "इसका एक नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. हमारी प्रयोगशालाएं अभी उस स्थिति में नहीं हैं जो पूरी तरह उपकरणों से लैस होकर एक क्षेत्र विशेष में शोध करने के लिए केंद्रित हो. इसके लिए उसे और धन की जरूरत होगी तभी अन्य क्षेत्रों में शोध आगे बढ़ सकेगा."

हालांकि, एक अन्य वरिष्ठ वैज्ञानिक मयंक माथुर के मुताबिक सीएसआईआर के तहत आने वाले संस्थानों को 2017 तक किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि इनकी विभिन्न शोध परियोजनाओं के लिए पहले से ही वित्तीय अनुदान जारी हो चुका है.

सीएसआईआर के अंतर्गत आने वाले सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक कहते हैं कि शोध परियोजनाओं को मुनाफा केंद्रित बनाना किसी भी लिहाज से अच्छा विचार नहीं था. लेकिन ऐसा हुआ तो सीएसआईआर के कुछ विभाग खुद को आत्मनिर्भर बना सकते हैं.

उन्होंने कहा, "हम उम्मीद करते हैं कि सीएसआईआर के निदेशक अपने विवेक का इस्तेमाल कर ऐसे विभागों को पहचानेंगे जो आत्मनिर्भर बन सकें और शोध परियोजनाओं पर किसी तरह का नकारात्मक प्रभाव न डालें."

अब एनएनएमबी का क्या, जो बीते 40 सालों सेे अतिसंवेदनशील आदिवासी समुदायों, किशोरों, बुजुर्गों समेत गर्भवती महिलाओं की आबादी के लिए पोषक तत्वों की जरूरतों का आकलन करती आ रही है.

जून 2012 तक एनएनएमबी के निदेशक रहे बी शशिकिरण के मुताबिक ब्यूरो को बंद किया जाना केवल इसके कर्मचारियों को स्थायी बनाने या न बनाने से संबंधित कानूनी और प्रशासनिक टकरावों का नतीजा है.

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अंतर्गत आने वाले एनएनएमबी ने नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन के साथ मिलकर विभिन्न गरीबी उन्मूलन योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाने का काम किया है.

एनएनएमबी से छह माह पूर्व प्रभारी अधिकारी के रूप में संन्यास लेने वाले कल्पगम पालोसा बताते हैं, "मेरे कार्यकाल के दौरान सबसे बड़ी समस्या एनएनएमबी के कर्मचारियों की थी. जिन्हें अस्थायी रूप से काम पर रखा जाता था और फिर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था. क्योंकि लोग स्थायी नौकरी चाहते हैं इसलिए यह प्रक्रिया समस्या पैदा करती थी."

शशिकिरण कहते हैं कि देश के दो तिहाई हिस्से, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी जानकारी देने के लिए एनएनएमबी ही एकमात्र स्रोत था. किसी अन्य डाटाबेस में इस तरह की जानकारी नहीं है.

उन्होंने कहा, "यह आंकड़े सरकार को अपनी इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज और मिड डे मील जैसी योजनाओं के आकलन में भी मदद करते हैं. यह अब मधुमेह और मोटापे के आंकड़ों की भी जांच करता है. यदि यह बंद हो जाता है तो निश्चितरूप से एक शून्यता की स्थिति पैदा हो जाएगी."

First published: 13 November 2015, 1:12 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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