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अंतरिक्ष में कैसे रहते हैं अंतरिक्षयात्री, टॉयलेट करने का तरीका जानकर रह जाएंगे दंग

कैच ब्यूरो | Updated on: 25 July 2019, 15:10 IST

बीती 22 जुलाई को इसरो ने चंद्रयान 2 का प्रक्षेण किया. ये मिशन इसरो के सबसे महत्वाकांक्षी मिशन में से एक है. ऐसे में हम आपको अंतरिक्ष और अंतरिक्ष यात्रियों के बारे में कुछ बातें बताने जा रहे हैं. जिनके बारे में आपने आजतक नहीं सुना होगा. अंतरिक्ष यात्रों और उनकी यात्राओं के बारे में तो आपने सुना ही होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि अंतरिक्ष में अंतरिक्षयात्रियों को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

दरअसल, अंतरिक्ष यात्रा के बारे में सुनना जितना अच्छा लगता है, ये उससे कहीं ज्यादा मुश्किल होती है. अंतरक्षि यात्रियों को जीरो ग्रैविटी जिंदा रहने और दैनिक जीवन के तमाम काम करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. उसमें भी सबसे अधिक परेशानी तब होती है जब उन्हें मल-मूत्र का त्याग करना होता है.

बता दें कि 19 जनवरी 1961 को अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री एलन शेफर्ड जब पहली बार अंतरिक्ष में गए तो उन्हें वहां सिर्फ 15 मिनट रहना था. ये दुनिया के किसी वैज्ञानिक या इंसान की अंतरिक्ष में पहली यात्रा थी. क्योंकि एलन शेफर्ड को केवल 15 मिनट ही अंतरिक्ष में गुजारने थे इसलिए उनके टॉयलेट की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी, लेकिन लॉन्च में देरी होने की वजह से शेफर्ड को अंतरिक्ष सूट में ही पेशाब करनी पड़ी.

उसके कुछ सालों बाद अंतरिक्ष यात्रियों के लिए कंडोम की तरह दिखने वाला एक पाउच बनाया गया. इस पाउच के साथ भी एक परेशानी थी और वह यह थी कि यह बार-बार फट जाता था. वहीं शौच के लिए अंतरिक्ष यात्रियों को पीछे की तरफ एक बैग चिपकाकर रखना पड़ता था. इससे अंतरिक्ष यात्री फ्रेश तो हो जाते थे लेकिन उसकी बदबू से उन्हें काफी परेशानी होती थी.

लेकिन अपोलो मून मिशन के दौरान पेशाब के लिए बनाए गए पाउच को एक वॉल्व से जोड़ दिया गया था. इस वॉल्व को दबाते ही पेशाब स्पेस में चली जाती थी. इसमें भी एक परेशानी थी कि अगर वॉल्व दबाने में एक सेकेंड की देरी भी हुई तो यूरिन अंतरिक्ष यान में ही तैरने लगती. इसे पहले खोल देने से अंतरिक्ष के वैक्यूम से शरीर के अंग बाहर खींचे जा सकते थे. इसलिए अंतिरक्ष यात्रियों को एस्ट्रोनॉट्स पाउच में ही पेशाब करनी पड़ी.

उसके बाद 1980 के दौरान नासा ने मैग्जिमम एब्जॉर्बेसी गार्मेंट बनाया, जो एक तरह का डायपर था. इसे खास तौर पर महिला अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बनाया गया था. लेकिन इसका प्रयोग पुरुष अंतरिक्ष यात्री भी करते थे. इसके बाद नासा ने जीरो-ग्रैविटी टॉयलेट बनाया. इसमें अंतरिक्ष यात्री को पीछे बैग तो नहीं बांधना पड़ता, लेकिन शौच करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है.

क्योंकि अंतरिक्ष में मल अपने आप बाहर नहीं आता. इसलिए वे एक विशेष तरीके का गलव्स पहनकर उसकी मदद से मल को जीरो-ग्रैविटी टॉयलेट में डालते हैं. साथ ही जीरो ग्रैविटी टॉयलेट में एक पंखा लगा होता है जो मल को खींचकर कंटेनर में डाल देता है. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में अब इसी टॉयलेट का इस्तेमाल किया जाता है.

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First published: 25 July 2019, 15:10 IST
 
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