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आईफोन 7: जानिए उन सवालों के जवाब जो हर कोई 'एप्पल' से पूछना चाहता है

पत्रिका स्टाफ़ | Updated on: 10 September 2016, 19:35 IST
QUICK PILL
एप्पल ने 7 सितंबर को सैन फ्रैंसिस्को में आईफोन-7 लॉन्च किया और इसके तुरंत बाद दुनियाभर में इस बात को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई कि इसमें नया क्या था? आलोचकों और टेक विशेषज्ञों के निशाने पर आई एप्पल को लेकर सवाल उठने लगे कि क्या कंपनी एंड्रॉयड मार्केट में अपने कंपटीटर्स से पिछड़ रही है? कंपनी की घटती बिक्री के आंकड़ों पर भी बात होने लगी.ऐसे ही करीब 16 सवाल जो हर यूजर्स के मन में उठ रहे थे उनके जवाब के लिए \'पत्रिका\' के गौरव नौडियाल ने सीधे एप्पल से बात की. कंपनी के कोर टीम के सदस्य और भारत समेत 16 देशों में कंपनी के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट \'एवरी वन कैन कोड\' को लीड कर रहे सिद्धार्थ राजहंस ने इन सवालों का विस्तार से जवाब दिया. यहां पेश है बातचीत के मुख्य अंश:

आईफोन-7 के जिन फीचर्स को नया बताया गया, वो पहले से चाइनीज मोबाइल में मौजूद हैं, फिर कंपनी इन्हें नया क्यों बता रही है. क्या एप्पल पिछड रही है?

नहीं, मैं नहीं मानता कि एप्पल पिछड़ रही है. एप्पल अभी दुनिया का एकमात्र ऐसा मैन्युफैक्चरर है, जो आईओएस डिवाइसेज बनाता है. आईओएस सबसे आधुनिक ऑपरेटिंग सिस्टम तो है ही, साथ ही सबसे सिक्योर भी है. आईओएस में कभी वायरस के कारण प्रॉब्लम जैसी समस्याएं नहीं सुनी होंगी, जबकि एंड्रॉयड डिवाइस और विंडोज में ये आम है. आईओएस 'क्लोज्ड सोर्स' ऑपरेटिंग सिस्टम है, जबकि बाकी सब 'ओपन सोर्स' हैं, प्राइवेसी और सिक्योरिटी में आईओएस सबसे आगे खड़ा है. ऐसे में आईओएस में लेटेस्ट फीचर लाने की जिम्मेदारी अकेले एप्पल की रह जाती है.

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एप्पल जिन फीचर को नया कह रही है, वो आईओएस प्लेटफॉर्म पर तो नए ही हैं. आईफोन का ऑपरेटिंग सिस्टम, हार्डवेयर और प्रोसेसर सब एप्पल ने खुद बनाया, इसलिए इनकी परफॉर्मेंस बेहतरीन है, जबकि एंड्रॉयड डिवाइसेज़ पुराने समय के असेम्बल्ड कम्प्यूटर के जैसे हैं, जिसकी हर परत अलग-अलग जगह से असेम्बल है, ऐसे में इनकी परफॉर्मेंस लॉन्ग लास्टिंग नहीं है.

ये तो दूसरों के इन्वेंशन को अपना नाम देने वाली बात हुई?

नहीं, ऐसा नहीं है. चाइनीज मोबाइल की ही बात करें तो आजकल एंड्रॉयड मार्केट में कंज्यूमर को लुभाने के लिए फीचर्स को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. मैं इसके दो क्लासिक उदाहरण रखना चाहूंगा.. पहला, कैमरा क्वॉलिटी का जो मापदंड बन गया है फोन को परखने का. कैमरे के 'मेगा पिक्सल्स' से कोई खास फर्क नहीं पड़ता. असली दम कैमरे के प्रोसेसर का होता है, जो बेहतरीन फोटो और कॉम्पजिशन बनाता है. अब इस कॉन्सेप्ट को एंड्रॉयड फोन और आईफोन पर परख कर देखिए!

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आम कंज्यूमर को तो ये नहीं मालूम ही नहीं होता कि प्रोसेसर क्या चीज है. वो कैमरे को उसके 'मेगापिक्सल' से ही परखता है, इसलिए एंड्रॉयड मार्केट में 13 मेगापिक्सल, 20 मेगापिक्सल तक के कैमरे देखे जा सकते हैं, लेकिन जब इनकी क्वॉलिटी की बात करेंगे तो, आप पुराने आईफोन-6 के 8 मेगापिक्सल के कैमरे जितनी भी क्वॉलिटी नहीं पाएंगे. iPhone को टक्कर देने के लिए काफी हाई फीचर वाले एंड्रॉयड फोन मिलेंगे, पर वो क्वॉलिटी डिलीवर नहीं कर पाते.

दूसरा, प्रोसेसर की बात करें तो एंड्रॉयड मार्केट में 'क्वॉलकॉम स्नेपड्रैगन' प्रोसेसर यूज़ होते हैं, लेकिन ऐसे कितने ब्रांड हैं जो हकीकत में इसे यूज़ करते हैं? हुआवे, जियोनी, शाओमी जैसे ब्रांड 'ऑक्टा-कोर' प्रोसेसर जब कहते हैं, तब ये 'इंफिरीअर ब्रांड' का मीडिया-टेक प्रोसेसर यूज करते हैं. एक बात स्पष्ट कर दूं कि प्रोसेसर के कोर गिनाने से उसकी क्वॉलिटी नहीं पता की जाती. एप्पल 'ए10' प्रोसेसर यूज़ करता है, जो अभी तक के प्रोसेसर्स में सबसे फ़ास्ट है. एप्पल ने ही सबसे पहला स्मार्टफोन बनाया था और उसके मुक़ाबले 'ए10' प्रोसेसर 120 गुना ज्यादा फ़ास्ट है.

क्या हम ये मानें कि एप्पल कंपटीशन की रेस को देखने के बजाय, खुद को बेहतर मान कर बैठ गया?

जैसे-जैसे ब्रांड आ रहे हैं वैसे-वैसे कंपटीशन भी बढ़ेगा. ज्यादातर ब्रांड मार्केटिंग पर ज़्यादा काम कर रहें हैं... और कंपटीशन होना भी चाहिए, ये अच्छी बात है.... लेकिन एप्पल जो कहता है, उसे डिलीवर भी करता है. हां, हम कॉस्टिंग को जरूर हायर एंड पे रखते हैं, पर ये सिर्फ़ इंडिया में लगता है... क्योंकि अभी वहां फ्लैगशिप चार्ज नहीं हैं और डॉलर से कंवर्ज़न के बाद का प्राइस ज़्यादा आता है. यूएस जैसे देशों में लोग इसलिए भी आईफ़ोन अफ़ॉर्ड कर पाते हैं, क्योंकि टेलीकॉम कंपनी के साथ वहां टाईअप में आता है.

भारतीय मीडिया में खबरें हैं कि 'एप्पल दूसरी स्मार्टफोन कंपनियों से मिल रही टक्कर से घबरा गई है'! इसमें कितनी सच्चाई है?

मैं इसे सच नहीं मानता. हम एप्पल में एक लॉन्ग टर्म प्लान को लेकर काम कर रहें हैं. हम किसी भी कंपनी के लॉन्च से डरकर रीएक्शन में प्रॉडक्ट्स नहीं उतारते. आज जो प्रॉडक्ट्स आप देख रहें हैं वो पिछले कुछ सालों की प्लानिंग का नतीजा है. हमारा रूल है कि हम अपने लास्ट प्रोडक्ट से आपको हर साल कुछ बेहतर देंगे. हमें बाकी कंपनीज के प्रॉडक्ट्स से कुछ लेना देना नहीं है. इसी पॉलिसी ने एप्पल को इतने साल से टॉप पर रखा है. हम बाकी कंपनीज के बारे में वर्कप्लेस पर बात तक नहीं करते.

'सैमसंग' और चीनी कंपनी 'हुआवे' की तकनीक से क्या एप्पल पिछड रहा है?

दोनों ही अच्छी कंपनीज में शुमार हैं और नई टेक्नोलॉजी लेकर आई हैं. हम मुक़ाबला करना चाहते तो एप्पल जैसे मल्टी बिलियन डॉलर कंपनी के लिए वायरलेस चार्जिंग लेकर आना कोई बड़ी बात नहीं थी, पर जैसा कि मैंने बताया हम एक लॉन्ग टर्म प्लान को लेकर चल रहें हैं और हम दूसरी कंपनीज के प्रॉडक्ट्स को देखकर रीएक्ट नहीं करते.

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वायरलेस चार्जिंग जैसा टेक अभी ठीक से डेवलप नहीं है. जब एप्पल इसमें उतरेगा तब आप इसमें मेजर चेंजेज देखेंगे. हम एक्चुअली फुली वायरलेस चार्जिंग लेकर आना चाहते हैं. ये ऐसा होगा कि आप दूर से स्विच चालू कीजिए और आपके हाथ में डिवाइस चार्ज होता रहेगा. सैमसंग का वायरलेस चार्जिंग नामभर का है, आपको डिवाइस को वायरलेस पैड पर तो रखना ही होता है, हम 'नाम मात्र' के लिए कोई काम नहीं करना चाहते.

जून के क्वॉर्टर में एप्पल ने चार करोड़ आईफोन बेचे, जो दो साल में सबसे कम है. ऐसा क्यों? घटती बिक्री को कंपनी अपने पिछड़ने के तौर पर देख रही है?

आम व्यक्ति को सिर्फ ये लगता है की आईफोन लॉन्च हुआ और उसके बाद सेल्स में गिरावट आई. ये उस क्वॉर्टर की बात है, जब हमने आईफोन एसई लॉन्च किया था. हमने इसे 21 मार्च को लॉन्च किया और इसके बाद ट्रेड एनालिस्ट ने इसकी तुलना रेग्युलर आईफोन लॉन्च से कर दी. इसके सेल्स के फीगर को पुराने आईफोन लॉन्चेज से कंपेयर किया जाने लगा. मैं इसके पीछे की हक़ीक़त बताता हूं.. 'हम हर साल सितंबर में ही आईफोन लॉन्च करते हैं. यही कंपनी की मेन लॉन्चिंग होती है. मार्च वाला लॉन्च दरअसल सोची समझी प्लानिंग का नतीजा था.'

किस तरह की प्लानिंग?

हम पुराना आईफोन 5एस बंद करना चाहते थे, क्योंकि उसके फीचर पुराने हो गए थे और उसे आइफ़ोन 6एस के साथ बनाना किफायती नहीं था. इसके अलावा आईफोन 6 और 6एस के आने से उसकी सेल गिर गई थी, लेकिन हमारे पास वेयरहाउस में दर्जनों आईफ़ोन 5एस रखे हुए थे. ऐसे में हमनें उन सभी पुराने आईफोन को निकालने के लिए आईफोन एसई को जन्म दिया, जिसकी बॉडी तो आईफोन 5एस वाली थी लेकिन फीचर 6एस के थे.

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जून वाली गिरावट अपेक्षित थी. वो दरअसल साल के बीच में क्लीयरेंस के तौर पे किए गए लॉन्च के बाद के सेल्स नंबर हैं. दुनिया इसे आम आईफोन लॉन्च की तरह देखती रही और हमनें बेकार पड़े हुए 5एस को अच्छे दाम में निकल दिया. यही हमारी प्लानिंग और स्ट्रैटेजी थी!

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मैंने पिछले प्रश्न में इसका डिटेल में जवाब दे दिया है.. हम इस गिरावट को नॉर्मल गिरावट नहीं मान रहे. ये कंपनी के लिए नुक़सान का नहीं बल्कि मुनाफे का सौदा था. हमने बेकार पड़े आईफोन को इस प्रॉसेस में बेच दिया और साथ ही अभी ऐक्टिव आईफोन की श्रेणी में सबसे सस्ता आईफोन एसई बनाकर दे दिया. हमारी सेल्स तो अभी वाले आईफोन लॉन्च के बाद देखने को मिलेगी.

रिसर्च फर्म आईडीसी का अनुमान है कि 2015 से 2020 के बीच आईफोन की बिक्री सालाना महज 1.5 फीसदी रफ्तार से ही आगे बढ़ेगी. कंपनी इसे कैसे देख रही है?

ये एक्स्पेक्टेड ग्रोथ नंबर्स हैं. कंपनी की नजर में काफी बेहतरीन काम हुआ है और एंड्रॉयड से आईओएस के ओर बढ़ने वाले यूजर्स की संख्या भी काफी बढ़ी है. ये नंबर सिर्फ आईफोन 6एस और 6एस प्लस के बाद के हैं. अभी इस वाले आईफोन 7 लॉन्च और आने वाले सालों के लॉन्च में हमारी ग्रोथ ऊपर जाने वाली है. एप्पल आंकड़ों और कंपटीशन में बहुत ज़्यादा केंद्रित नहीं रहता. कंपनी का लक्ष्य लोगों को अच्छी टेक्नोलॉजी देने का है. हाल ही में हम विश्व की पहली 100 फीसदी रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी बेस्ड कंपनी भी बन गए हैं.

रिसर्च का बजट तीन गुना तक बढ़ाया, इससे कंपनी को क्या फायदा हुआ?

रिसर्च तो वो एरिया है जिसमें किसी भी महान कंपनी को निवेश करना चाहिए. हम अपने यूजर्स को बेस्ट टेक्नोलॉजी देना चाहते हैं. सिर्फ़ बड़े क्लेम्स नहीं. ...और ऐसी टेक्नोलॉजी को लेकर आने के लिए रिसर्च बहुमूल्य है. हम अपनी रिसर्च एंड डेवलपमेंट टीम पर सबसे ज़्यादा निवेश करते हैं.

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अभी हम वायरलेस चार्जिंग, वर्चुअल रियलिटी, आर्टिफ़िशल इंटेलिजेंस और सेल्फ ड्राइविंग कार जैसे प्राजेक्ट्स में काम कर रहें हैं. हम जब भी इन्हें लॉन्च करेंगे ये सबसे ज्यादा एडवांस्ड सिस्टम होंगे. एक दिलचस्प बात का जिक्र करना चाहूंगा. कंपटीटर्स के प्रोडक्ट्स एप्पल से आगे होने की बात कर रहे हैं, लेकिन ये सब कहीं न कहीं एप्पल से ही प्रेरित होकर बने हैं. मसलन एप्पल के वायरलेस इअरफोन की बात आज से कुछ महीने पहले लीक हो चुकी थी. इसके बाद एंड्रॉयड कंपटीटर्स में इसे जल्दी लाने की होड़ मच गई ताकि वो खुद को एप्पल से आगे कह सकें.

एप्पल पहली बार ड्युअल लेंस कैमरा लेकर आया, लेकिन चीनी कंपनी 'हुआवे' और 'ऑनर' कई साल पहले ही यह तकनीक ला चुकी हैं. क्या एप्पल मार्केट के पॉपुलर आइडिया पर केवल अपना ब्रांड नेम चिपका रही है?

ऐसे कई सारे डेवेलपमेंट्स एप्पल के आने वाले प्रॉडक्ट्स से लीक हुई जानकारी के लेवल पर होते हैं. शाओमी, हुआवे सब स्टार्टअप्स रही हैं. इनके लिए जल्द से जल्द मोबाइल बना कर एप्पल से पहले निकालना आसान काम है. एप्पल जैसी बड़ी कंपनी ऐसा नहीं कर सकती. ये ड्युअल लेंस की टेक्नोलॉजी हम पिछले 6 साल से विकसित कर रहें हैं और इसको पूरी तरह बना कर निकालने के बाद ही हम इसे दुनिया के सामने लाए हैं.

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इसका फैसला यूजर्स पर छोड़ना बेहतर रहेगा कि एप्पल की ड्युअल लेंस टेक्नोलॉजी बेहतर है या फिर शाओमी या हुआवे की! बात क्वॉलिटी की होनी चाहिए, ये नहीं कि पहले किसने पेश किया है. बाजी किसने आगे या पीछे नहीं बल्कि सही किसने मारी बात इसकी हो तो बात बने.

फास्ट चार्जिंग टेक्नोलॉजी भी एंड्रॉयड फोन में पहले से मौजूद है. मोटो जी4 और जी4 प्लस में टर्बो चार्जिंग है. बाजार में कई एंड्रॉयड फोन में यह फीचर है.. एप्पल इसका क्या जवाब देती है?

चार्जिंग में यूज़र को क्या चाहिए? फोन जल्दी चार्ज हो जाए और ज्यादा से ज्यादा देर चार्ज रिटेन करे. आईफोन ये बखूबी करता आया है. लाइटनिंग केबल आईफोन का ही कॉन्सेप्ट था पहले से ही और आज भी इसपर खरा उतरता है. फ़ोन की बैटरी लाइफ पूरे एक दिन तक चलती है, जबकि एंड्रॉयड के बारे में यह कहना थोड़ा मुश्किल है. एंड्रॉएड फोन बैटरी को जल्दी से खोने के लिए बदनाम हैं?

आईफोन-7 का डिजाइन भी 2014 और 2016 के बीच आए आईफोन से कंपेयर किया जा रहा है, क्या लोग ही नया नहीं ढूंढ पा रहे या फिर कंपनी कुछ नया नहीं दे पाई?

ये जानबूझकर किया गया है. अगले साल 2017 में हम आईफोन की 10th एनिवर्सरी में होंगे. तब हम यूजर्स को एकदम नया डिजाइन देना चाहते हैं. इसलिए इस साल के आईफोन के फीचर्स पहले वाले आईफोन जैसे रखने का फैसला लिया गया था.

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एप्पल ने कीनोट इवेंट में दावा किया की अब ईयरफोन पोर्ट से लोगों को निजात मिलेगी, लेकिन ये तो मोटोरोला एक साल पहले कर चुका है... फिर इसमें नया क्या था?

वायरलेस इयरपॉड्स एकदम नया इंवेन्शन है. अभी तक किसी कंपनी ने ये नहीं किया है. सवाल सिर्फ़ पोर्ट हटाने का नहीं हैं, उसके बदले आप क्या दे रहे हो इसका है..!

आईफोन को लोग केवल 'लग्जरी' के लिए ही खरीदें, जबकि मार्केट में 7 प्लस के मुकाबले 'बेस्ट स्मार्टफोन' मौजूद हैं?

आईओएस सिस्टम पर चलने वाला ये अभी तक का सबसे एडवांस्ड स्मार्टफोन है. फीचर्स में भले ही एंड्रॉयड डिवाइसेज की सीरीज में कहने को काफी कुछ होगा, पर एंड्रॉयड के अपने लिमिटेशन हैं. यूएस जैसे देश में आइफोन यूज़ करने का अपना अलग ही मज़ा है. मसलन 'एप्पल पे' नामक फ़ीचर आप सब जगह यूज कर सकते हैं, आपको केवल अपने फ़ोन को टैप करना है और पेमेंट हो जाएगा.

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क्या एंड्रॉयड पेमेंट जैसे फ़ीचर के लिए सिक्योर प्लेटफ़ॉर्म नहीं है?

एप्पल 'प्राइवेसी एंड सिक्योरिटी' का प्रतीक है. हमने एफबीआई तक से समझौता नहीं किया, जो कि एप्पल के सिक्योरिटी के लिए कमिटमेंट को दिखता है. हर कीनोट इवेंट के बाद एप्पल की तुलना शुरू हो जाती है. एंड्रॉयड मेकर्स के एंटी मार्केटिंग और सार्केज्म भरे व्यूज सामने आते हैं. एप्पल को किसने ऐसा करते या कहते सुना? एप्पल नंबर वन है, इसलिए सबकी नज़र उसपर होती है.

First published: 10 September 2016, 19:35 IST
 
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