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जनतंत्र में जैतापुर

कुमार सुंदरम | Updated on: 27 January 2016, 23:51 IST
QUICK PILL
  • सरकार जैतापुर से बाहर के कार्यकर्ताओं और स्वतंत्र वैज्ञानिकों को \'उकसाने \r\nवाले बाहरी तत्व\' बताकर जिले के अंदर नहीं आने देती और स्थानीय नेताओं को बार-बार जिलाबदर कर दिया जाता है. जैतापुर से खबरें आने का एकमात्र स्रोत अरेवा कंपनी की पीआर मशीनरी है.
  • अरेवा कंपनी को इस परियोजना की बेसब्री से दरकार है क्योंकि फुकुशिमा \r\nदुर्घटना के उपरांत एक के बाद एक कई देशों ने परमाणु ऊर्जा से कन्नी काट ली\r\n है. इसके चलते अरेवा दिवालिया होने के कगार पर खड़ी है.

कल नई दिल्ली में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के राष्ट्रपति  फ्रांस्वा ओलांद के साथ संयुक्त घोषणाएं कर रहे थे तब 1800 किमी दूर कोंकण के जैतापुर में हज़ारों किसान और मछुआरे भारत और फ्रांस के बीच हुए परमाणु समझौते का विरोध कर रहे थे. ज़ाहिर है उनकी आवाज़ देशभक्ति और मोदी की डिप्लोमेसी के शोर के बीच दब कर रह गयी.

जैतापुर के स्थानीय लोग लम्बे समय से इस प्रस्तावित परियोजना का विरोध कर रहे हैं. यह उनकी सुरक्षा, ज़मीन, जीविका और पर्यावरण से जुड़ा मामला है. मार्च 2011 में जापान में फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना होने के एक महीने बाद जब लोगों ने शांतिपूर्वक एक रैली निकाली तो पुलिस ने उस पर फायरिंग की और तबरेज़ सोयकर नाम के एक युवा मछुआरे की मौत हो गयी.

दो महीने पहले जब जापान के प्रधानमंत्री भारत आए और जैतापुर संयंत्र के लिए ज़रूरी कल-पुर्ज़ों के लिए समझौता हुआ तो हज़ारों लोग 'जेल भरो' आंदोलन में शामिल हुए और 13 स्थानीय पंचायतों ने इस परियोजना का विरोध किया. लेकिन इस स्थानीय लोकतंत्र को कुचलकर जो डीलें हो रही हैं, उनको महान लोकतंत्रों का मिलन कहने का चलन है.

सरकार इलाके से बाहर के कार्यकर्ताओं और स्वतंत्र वैज्ञानिकों को 'उकसाने वाले बाहरी तत्व' बताकर जिले के अंदर नहीं आने देती और स्थानीय नेताओं को कई बार जिलाबदर किया जा चुका है. ऐसे में, सबसे प्रामाणिक स्थानीय चीज अब सिर्फ फ्रांसीसी कंपनी अरेवा ही बची है, जो यहां परमाणु प्लांट लगा रही है.

स्थानीय लोकतंत्र को कुचलकर जो डीलें हो रही हैं, उनको महान लोकतंत्रों का मिलन कहने का चलन हो गया है

अरेवा कंपनी को इस परियोजना की बेसब्री से दरकार है क्योंकि फुकुशिमा दुर्घटना के उपरांत एक के बाद एक कई देशों ने परमाणु ऊर्जा से कन्नी काट ली है. इसके चलते अरेवा दिवालिया होने के कगार पर खड़ी है.  खुद फ्रांस ने परमाणु ऊर्जा पर अपनी निर्भरता को अगले दशक में एक तिहाई तक कम करने का फैसला किया है.

अमेरिका ने भी 1973 के बाद से कोई नया नाभिकीय कारखाना नहीं बनाया है और कमोबेश यही हालत सभी पश्चिमी देशों की है जहां सुरक्षा चिंताओं के चलते परमाणु उद्योग में गिरावट का दौर है. यह मुक्त बाज़ार के नियमों पर आर्थिक रूप से टिक नहीं पाता.

वैश्विक परमाणु उद्योग की 2015 की स्टेटस रिपोर्ट के मुताबिक़ यह सेक्टर गंभीर संकट में है और भारत, चीन व अन्य विकासशील देशों में नए बाज़ार तलाश रहा है. इन देशों की सरकारें कई प्रकार से इस क्षेत्र को सब्सिडी देने को तैयार हैं साथ ही यहां सस्ते मजदूर भी सुलभ हैं. इसके साथ ही, सरकार अपनी पुलिस और नौकरशाही की असीमित ताकत से जबरदस्ती किसानों से ज़मीन छीनकर कंपनियों को दे सकती है. तीसरी दुनिया के देश पर्यावरणीय व सुरक्षा सरोकारों को भी ताक पर रख सकते हैं जो कि पश्चिमी देशों में अब संभव नहीं है.

संदेहास्पद तकनीक

जैतापुर में अरेवा कंपनी के जो छह प्लांट लगाए जा रहे हैं, वे यूरोपियन प्रेशराइज़्ड रिएक्टर (ईपीआर) नामक डिज़ाइन वाले हैं. यह डिज़ाइन बेहद विवादास्पद है. इसे खुद फ्रांसीसी परमाणु सुरक्षा नियामक एजेंसी ने पिछले साल असुरक्षित घोषित कर दिया है. विडम्बना यह है कि जिस हफ्ते एएसएन की वह रिपोर्ट आई उसी सप्ताह भारत के प्रधानमंत्री ने अपनी पेरिस यात्रा के दौरान उसी डिज़ाइन के लिए समझौता किया.

ईपीआर डिज़ाइन के कारखाने दुनिया में कहीं भी अस्तित्व में नहीं है. फिनलैंड एकमात्र देश है जिसने फ्रांस से इस डिज़ाइन के लिए समझौता किया था, लेकिन वहां यह संयंत्र 2009 में ही बनकर तैयार होने की योजना के बावजूद अब तक वहां इसका निर्माण मुकम्मल नहीं हुआ है.

अरेवा ने इसके 2018 तक पूरा होने का वादा किया है. फिनलैंड में इसकी लागत शुरुआती समझौते में तय राशि से अभी ही दोगुनी पहुंच चुकी है और अरेवा की गैरज़िम्मेदारी और गंभीर सुरक्षा सवालों को लेकर वहां की सुरक्षा नियामक एजेंसी ने अरेवा को कोर्ट में घसीटा है.

इस परियोजना के शुरुआती दो संयंत्रों का खर्च ही 120 हज़ार करोड़ बैठेगा. भारत के समूचे विज्ञान व तकनीक विभाग के बजट के बराबर. इस आधार पर जैतापुर से मिलने वाली बिजली की दर 19 रूपए प्रति यूनिट तक हो सकती है, जिसको बाज़ार दर पर बेचने के लिए बाकी का खर्चा सरकार उठाएगी और इस तरह यह योजना महाराष्ट्र का दूसरा एनरॉन साबित हो सकती है.

ईपीआर डिज़ाइन के कारखाने दुनिया में कहीं भी अस्तित्व में नहीं है सिवाय फिनलैंड के

भारत के पास न तो इस डिज़ाइन का कोई अनुभव है न विशेषज्ञता. अपने बढ़ते घाटों के मद्देनज़र अरेवा ने अपने परमाणु इंजीनियरिंग कारोबार को थोड़ा समेटा है और जैतापुर में एल एंड टी जैसी भारतीय कंपनियों को साझीदार बनाने का न्यौता दिया है. इसे लपक कर मोदी सरकार संयंत्र के साथ तकनीक मिलने का ढिंढोरा पीटने लगी है.

मंगलवार को जारी द्विपक्षीय घोषणापत्र में जैतापुर को 'मेक इन इंडिया' की सफलता बताया गया है. भविष्य में ईपीआर डिज़ाइन की खामियों को अरेवा भारतीय कंपनियों के मत्थे मढ़ देगी और गैर-अनुभवी कंपनियों के जुड़ने पर पहले से असुरक्षित इस डिज़ाइन का रिस्क और बढ़ेगा.

ईपीआर डिज़ाइन से जुड़े सवालों के अतिरिक्त भी जैतापुर परियोजना में कई गंभीर आशंकाएं जुड़ी हैं.  2011 में इंडियन साइंस जर्नल में छपे एक शोधपत्र में दो विख्यात भूगर्भशास्त्रियों ने यह ध्यान दिलाया कि कोंकण का यह इलाका भूकम्प के लिहाज से संवेदनशील है. ठीक प्रस्तावित साइट के नीचे से भूकम्प पैदा करने वाली एक दरार गुजरती है और परमाणु कारखाने के जीवनकाल में बड़ा भूकम्प आना संभव है जिससे फुकुशिमा जैसी दुर्घटना हो सकती है.

पिछले बीस सालों में 92 भूकम्प उस इलाके में आने की जानकारी तो पहले से सार्वजनिक दायरे में है.  हाल में ग्रीनपीस ने आरटीआई के सहारे यह खुलासा किया है कि 2006 से ही परमाणु ऊर्जा कार्पोरेशन के पास इस खतरे से जुड़ी एक रिपोर्ट मौजूद है, जिसको अब तक अध्ययन करने के नाम पर टाला जा रहा है. इस गंभीर रिपोर्ट पर कोई निष्कर्ष आए बगैर जैतापुर परियोजना को मंजूरी क्यों दी गयी और बात आगे क्यों बढ़ाई जा रही है?

परमाणु दुर्घटना और किसी भी अन्य दुर्घटना में अंतर यह होता है कि परमाणु दुर्घटना शुरू होती है ख़त्म नहीं होती

दुर्घटना खतरा वैसे तो हर उद्योग में हैं. लेकिन परमाणु दुर्घटना और किसी भी अन्य दुर्घटना में अंतर यह होता है कि परमाणु दुर्घटना शुरू होती है ख़त्म नहीं होती. किसी अन्य औद्योगिक या प्राकृतिक त्रासदी में अगले दिन या अगले घंटे से ही राहत और पुनर्निर्माण शुरू हो जाता है, लेकिन परमाणु दुर्घटना की स्थिति में यह असंभव है क्योंकि आने वाले कई सालों तक पूरा इलाका विकिरण से विषाक्त हो जाता है.

यह अदृश्य विकिरण अपने मूल स्रोत के पास तो इतना घातक होता है कि वहां पहुंचने पर मिनटों में जान जा सकती है. फुकुशिमा के चार साल बीतने पर यह संभव हुआ कि उस अभिशप्त बिजलीघर में रोबोट भेजे जाएं, क्योंकि अब तक इतने सघन विकिरण में काम कर सकें ऐसी मशीनें नहीं बनी थीं. इस साल अप्रैल में जब पहली बार एक छोटा रोबोट भेजा गया तो उसने तीन घंटों के अंदर ही दम तोड़ दिया, वहां विकिरण की मात्रा इतनी अधिक थी.

सोवियत रूस के चेर्नोबिल में तीस साल पहले हुई दुर्घटना के कारण आज भी अब यूक्रेन में पड़ने वाले उस तीस किलोमीटर के दायरे में इतना सघन रेडिएशन है कि पूरा इलाका जनशून्य है और प्रिप्यात जैसे शहर भुतहे खंडहर में तब्दील हो चुके हैं.

फुकुशिमा के बीस किलोमीटर के दायरे में भी हालत इसी तरह के हैं. फुताबा, नामिए और मिनामी सोमा जैसे शहर ठिठक गए हैं. लोग उस सुबह अपना न्यूनतम सामान लेकर जैसे बना बस भाग पड़े और स्कूल, घर, स्टेशन, दफ्तर साराकुछ साजो-सामान के साथ वैसे ही हैं जैसे किसी बच्चे ने पूरे इलाके को 'स्टेच्यू' बोल दिया हो.

भारत-अमेरिका परमाणु डील के तहत देश में सिविल-सैन्य परमाणु संयंत्रों को अलग किया जा चुका है, फिर भी अपारदर्शिता क्यों?

भारत में परमाणु ऊर्जा इसलिए भी अधिक खतरनाक हो जाती है क्योंकि भारत में स्वतंत्र सुरक्षा निगरानी तंत्र मौजूद नहीं है. भारत का परमाणु ऊर्जा नियमन बोर्ड (एईआरबी) खुद उसी अणु ऊर्जा आयोग के नीचे काम करता है, जिसकी इसको निगरानी करनी है. अपनी फंडिंग और विशेषज्ञों दोनों के लिए यह परमाणु उद्योग पर ही निर्भर है.

राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर परमाणु मसले की जानकारी से आम जनता को वंचित रखा जाता है. कूडनकुलम मामले में तत्कालीन केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी को संयंत्र के लिए साइट के चुनाव व सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज साझा करने से मना कर दिया गया था.

भारत-अमेरिका परमाणु डील के तहत देश में मिलिटरी और नागरिक परमाणु संयंत्रों को अलग किया जा चुका है, फिर इतनी अपारदर्शिता क्यों? यह बात हैरत में डाल देने वाली है कि इन संयंत्रों के नज़दीक रहने वाले भारतीय नागरिक विदेशों में सहज ही मिलने विकिरण मापने वाले गाइगर-काउंटर लेकर अपने इलाके में रेडिएशन की मात्रा नहीं देख सकते, क्योंकि ऐसा करना गैर-कानूनी है.

जैतापुर का भूगोल

जैतापुर में और भी कई गंभीर मसले हैं. कोंकण भारत के सबसे खूबसूरत इलाकों में से एक है, जहां जैव-विविधता और प्राकृतिक सम्पदा सचमुच बेजोड़ और नाज़ुक है. जैतापुर में बनने वाला परमाणु प्लांट दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा अणु-बिजलीघर होगा.

इस परियोजना के लिए तैयार पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन भी संदेहास्पद हैं. इन्हें नागपुर की एक सरकारी संस्था ने तैयार किया जिसकी परमाणु मामले में विशेषज्ञता नहीं है. 2010 में फ्रांसीसी राष्ट्रपति के भारत आगमन के ठीक एक दिन पहले आनन-फानन में इस परियोजना को मंजूरी दे दी गई थी.

इस बारे में तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि ऐसा कूटनीतिक हितों को पर्यावरण के सरोकारों से ऊपर मान कर किया गया है. तब संसद में भाजपा नेताओं ने इस मंजूरी को खारिज कर के पर्यावरणीय अध्ययन दुबारा और स्वतंत्र तरीके से कराने की मांग की थी. आज भाजपा उसी अध्ययन को मेक इन इंडिया के तहत आगे बढ़ा रही है.

ज़मीन तो सिर्फ तीन गाँवों की गयी है और वहां भी मुआवजा सिर्फ उन्हीं मुठ्ठी भर लोगों को मिला है जिनके पास ज़मीन के कागज़ात थे. लेकिन विकिरण-जनित बीमारियों की मार आस-पास के दर्जनों गांवों पर पड़ेगी इसलिए सभी आन्दोलनरत हैं.  इस इलाके में विश्वप्रसिद्ध अल्फोंसो आमों की पैदावार होती है जिनका ज़्यादातर यूरोप में निर्यात होता है.

यूरोपीय देशों में परमाणु प्लांटों के नज़दीक से पैदा होने वाले खाद्य पदार्थ को खरीदने पर पाबंदी है. लिहाजा रत्नागिरी से होने वाला आम का अंतरराष्ट्रीय निर्यात पूरी रह ठप पड़ जाएगा. आम-उत्पादकों के साथ-साथ इस धंधे में लगे कारोबारियों और ट्रांसपोर्टरों के सामने भी संकट आ सकता है.

जैतापुर परमाणु प्लांट से जो गर्म अपशिष्ट पानी निकलेगा वह आस-पास के समुद्री तापमान को 5 से 7 डिग्री बढ़ा देगा जिससे मछलियों की तमाम प्रजातियां या तो तट से दूर चली जाएंगी या फिर दम तोड़ देंगी. यह संकट मछुआरों की उस बड़ी आबादी पर है जिसकी आजीविका मछलियों पर टिकी है.

पिछले साल ऐन गणतंत्र दिवस के दिन मोदी ने मुख्य अतिथि बराक ओबामा को सौगात में यह आश्वासन दिया था कि किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में हम अमेरिकी कंपनियों को जिम्मेवार नहीं ठहराएंगे. परमाणु दायित्व का बोझ भारतीय आम जनता के पैसों पर डालने की पिछली सरकार की ऐसी कोशिशों को तब भाजपा ने संसद में 'देशद्रोह' कहा था.

मोदी=मनमोहन

लेकिन मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर अपनी पारी ठीक वहीं से शुरू की जहां मनमोहन सिंह ने छोड़ी थी. सत्ता संभालते ही दुनिया के दौरे पर निकले प्रधानमंत्री ने हर प्रमुख देश से परमाणु डील को तमगों की तरह टांकना शुरू किया. बाज़ार के अर्थशास्त्र को पुलिस मैन्युअल में बदलकर यह घोषणा कर दी गयी कि परमाणु संयंत्रों और 'विकास' के दूसरे प्रोजेक्टों का विरोध करने वाले समूह देश की अर्थव्यवस्था को दो से तीन प्रतिशत का नुकसान कर रहे हैं.

गणतंत्र को राजपथ की परेड में सीमित कर देने और कार्पोरेट हितों के लिए सेना-पुलिस के इस्तेमाल से ज़मीनी आवाजों को कुचलने का नाम पिछली सरकार में 'भारत निर्माण' था, अब यह 'मेक इन इंडिया' है. जैतापुर इसी द्वंद्व में फंसे एक ज़मीन के टुकड़े का नाम है जहां असली हिन्दुस्तान सांस लेता है.

First published: 27 January 2016, 23:51 IST
 
कुमार सुंदरम @pksundaram

The author is a researcher with the Coalition for Nuclear Disarmament and Peace.

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