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बेवजह एंटीबायोटिक्स खाने से हो सकता है सेहत को खतरा

लमत आर हसन | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • एंटीबायोटिक्स को हर मर्ज के दवा के रूप में इस्तेमाल करने की आदत से हो सकता है सेहत को नुकसान.
  • कुछ एंटीबायोटिक्स से आपकी पाचन क्षमता एक साल तक के लिए हो सकती है प्रभावित.

भारतीय अपना इलाज खुद करने के लिए बदनाम हैं. ऐसे बहुत से भारतीय एंटीबायोटिक्स को रामबाण समझते हैं.

'केवल डॉक्टर के कहने पर ही दवा लें' की सलाह पर दुनिया के कम ही देशों में अमल होता होगा. हमें छोटी-मोटी बीमारियों होने पर ऐसी सलाह नागवार भी लग सकती है. आखिरकार, हमें जब भी दांत में दर्द होता है तो हम दवा की दुकान पर जाकर दवा खरीद लेते हैं. ज्यादातर लोग पेट या गले के दर्द से निपटने के लिए पहले खुद से ही एंटिबायटिक्स ले लेते हैं. यहां तक कि डॉक्टर भी कई बीमारियों के इलाज के लिए इनका काफी इस्तेमाल करते हैं.

ज्यादा एंटीबायोटिक्स लेने हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हो सकता है. कई बार हमारे शरीर में इसकी प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है. लेकिन एक ताजा शोध से एंटीबायोटिक्स से होने वाले नए खतरे का पता चला है. इस शोध के अनुसार एंटीबायोटिक्स कुछ खुराक लेने पर भी हमारी आंत में पाए जाने वाले माइक्रोबायोमी को एक साल तक के लिए गड़बड़ कर सकता है. 

आंत के माइक्रोबायोमी

हमारी आंतों में पाये जाने वाले माइक्रोबी के समूह को माइक्रोबायोमी कहते हैं. हमारी आंत में पाये जाने वाले बैक्टीरिया भोजन पचाने में अहम भूमिका निभाते हैं. ये बैक्टीरिया हमारे सेहत के लिए लाभदायक होते हैं. 

जब आमाशय और छोटी आंत किसी खाद्य पदार्थ को नहीं पचा पाते तब बड़ी आंत के बैक्टीरिया उसे पचाने में मदद करते हैं. ये बैक्टीरिया विटामिन बी और विटामिन के का उत्पादन करने में भी मदद करते हैं जिनसे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. यानी अच्छे बैक्टीरिया से हमें अपना पाचन और स्वास्थ्य बेहतर रखने में मदद मिलती है.

एंटीबायोटिक्स कैसे काम करते हैं?

जब हम संक्रमण(इंफेक्शन) से परेशान होने पर एंटीबायोटिक्स लेते हैं तो वो हमें नुकसान पहुंचाने वाले बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है. लेकिन कई बार एंटीबायोटिक्स उन बैक्टीरिया को भी नष्ट कर देता है जो हमारी सेहत के लिए लाभदायक होते हैं. 

किसी दवा के आनुषंगिक नुकसान से बचना मुश्किल होता है. इसी तरह कई बार एंटीबायोटिक्स से फायदा होने के साथ ही नुकसान भी हो जाता है. इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार छोटी-मोटी दिक्कत होते ही एंटीबायोटिक्स ले लेने की आदत से हमारी पाचन क्रिया एक साल तक के लिए गड़बड़ हो सकती है.

नये शोध का नतीजा

मेडिकल जर्नल एमबायो में प्रकाशित इस शोध के अनुसार एंटीबायोटिक्स से पहले के अनुमान से कहीं अधिक साइडइफेक्ट(दुष्प्रभाव) हो सकते हैं.  इस शोध के लिए स्वस्थ लोगों पर दो अलग अलग प्लेसिबो नियंत्रित परीक्षण किए गए. 

एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय के एजीजा जौरा के नेतृत्व में 66 स्वस्थ प्रतिभागियों पर ये संयुक्त परीक्षण किया गया. इनमें से 29 स्वीडेन में स्थित थे और 37 ब्रिटेन में. 

स्वीडेन में हुए परीक्षण में लाइंकोसैमाइड ( क्लाइंडैमाइसिन) और क्विनोलोने(सिप्रोफ्लोक्सासिन) एंटीबायोटिक्स का प्रयोग किया गया था. ब्रिटेन में हुए परीक्षण में टेट्रासाइक्लिन(माइनोसाइक्लिन) और पेनिसिलिन (एमॉक्सिलीन) एंटीबायोटिक्स शामिल थे. 

परीक्षणों से वैज्ञानिकों को पता  चला कि "खाए जाने वाली एंटीबायोटिक्स दवाएं कई महीनों तक के लिए आंत के माइक्रोबायोमे की संरचना और विविधता बदल देती हैं. कुछ मामलों में तो ये प्रभाव एक साल तक बना रहता है."

परीक्षण में इस्तेमाल किए गए चार प्रकार के एंटीबायोटिक्स से आंत के माइक्रोबी पर महीनों तक गहरा नकारात्मक असर रहा. जिन प्रतिभागियों को सिप्रोफ्लोक्सासिन दी गयी थी उनमें इसका असर 12 महीने तक रहा. 

शोधकर्ताओं ने यह भी नोटिस किया कि कुछ मामलों में इन एंटीबायोटिक्स की वजह से उन जीन के विकास में बढ़ोतरी होने लगी जो शरीर पर एंटीबायोटिक्स का असर नहीं होने देते. यानी इनकी वजह से शरीर में एंटीबायोटिक्स प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने लगी.

अच्छा बैक्टीरिया, बुरा बैक्टीरिया

शोधकर्ताओं के अनुसार क्लाइंडैमाइसिन ने उन माइक्रोबी को नष्ट कर दिया जो जलन और तनाव को नियंत्रित करने वाला अम्ल बनाते हैं.

एंटीबायोटिक्स से शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली और पाचन क्रिया भी प्रभावित हो सकती है.

जौरा कहते हैं, "मेरा सन्देश यही है कि जब वास्तव में एंटीबायोटिक्स दवाओं की जरूरत हो तभी उनका इस्तेमाल करना चाहिए."

स्वस्थ आदमी अगर कुछ दिन भी एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल करता है तो उसमें इसकी प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है और उसकी आंत के माइक्रोबायोमी पर इसका दीर्घकालीन नकारात्मक असर पड़ सकता है.

भारत जैसे देशों जहां एंटीबायोटिक्स की खपत बढ़ रही है उनके लिए ये सलाह काम की है. इस शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि ब्रिटेन के प्रतिभागियों में स्वीडन की तुलना में एंटीबायोटिक्स प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा थी. यानी ब्रिटेन के प्रतिभागियों में बीमारी में दी जाने वाली एंटीबायोटिक्स कम कारगर होगी.

एंटीबायोटिक्स से होने वाले नुकसानों की वजह से पिछले 20 सालों में स्वीडेन में इनके इस्तेमाल में भारी कमी आयी है.

एंटीबायोटिक्स के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का विकसित होना पूरी दुनिया में आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. 

टीयूएफटीएस डॉटएडू के अनुसार, "ऐसा लगता है कि एंटीबायोटिक्स ने बैक्टीरिया को नियंत्रित करने या उन्हें नष्ट करने की अपनी क्षमता खो दी है. दूसरे शब्दों में  बैक्टीरिया एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में सफल होते जा रहे हैं."

First published: 16 November 2015, 5:39 IST
 
लमत आर हसन @LamatAyub

संवाददाता, कैच न्यूज़

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