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क्या लोहे पर लगी जंग से बिजली बन सकती है?

असद अली | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • सिलिकॉन सौर कोशिकाओं की एक प्रमुख कमी यह होती है कि वे सिर्फ दिखने वाली और अल्ट्रा-वायलेट लाइट को ही ऊर्जा में बदल सकती हैं.
  • जल-विघटन के जरिए पैदा की गई हाइड्रोजन का उपयोग न्यूनतम प्रदूषण के साथ वाहनों के ईंधन के तौर पर भी किया जा सकता है.

जंग अब इतिहास बना सकता है. अगली बार जब आप अपने दरवाजे की कुंडी या बालकनी की रेलिंग पर जंग देखें तो याद रखें कि वह सिर्फ आयरन ऑक्साइड का गंदा चकत्ता भर नहीं है. कुछ ऐसे समर्पित वैज्ञानिक हैं जो मानवता के फायदे के लिए जंग का सार्थक इस्तेमाल खोजने में जुटे हैं. कैसे? हालिया शोधों के अनुसार, सौर ऊर्जा के निर्माण और परिरक्षण में जंग महत्वपूर्ण स्रोत साबित हो सकता है.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों के एक दल ने हाल ही में, सफलतापूर्वक, यह सिद्ध कर दिखाया है. उन्होंने सोलर सेल बैटरियों के निर्माण में जंग का उपयोग किया. जंग से उत्पन्न हुई इन बैटरियों में पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ने की क्षमता है, और साथ ही इसके फलस्वरूप मुक्त हुई ऊर्जा का भंडारण करने में सक्षम है.

विस्तृत शोध का प्रकाशन इसी वर्ष जनवरी के आरंभ में एनर्जी एंड एनवायरमेंटल साइंस जर्नल में हो चुका है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के दल का शोध में नेतृत्व पदार्थ विज्ञान एवं इंजीनियरिंग के असिस्टेंट प्रोफेसर विलियम चयूह और इसी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर निकोलस मेलोश द्वारा किया गया. इनके शोध कार्य में स्टैनफोर्ड के ग्लोबल क्लाइमेट एंड एनर्जी प्रोजेक्ट के साथ-साथ नेशनल साइंस फाउंडेशन द्वारा सहायता प्राप्त है.

इस नए शोध का मुख्य आधार जल-विघटन तकनीक है. जल विघटन तकनीक ऐसी प्रक्रिया होती है, जिसमें पानी से हाइड्रोजन को अलग करने के लिए दिन के समय सौर ऊर्जा को कैद किया जाता और इसके बाद उपयोग करने के लिए एक ऊर्जा स्रोत के तौर पर संरक्षित कर लिया जाता है.

पारम्परिक तौर पर इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सिलिकॉन सौर कोशिकाओं का उपयोग मुख्य घटक के तौर पर किया जाता है. हालांकि सिलिकॉन सौर कोशिकाओं की एक प्रमुख कमी यह होती है कि वे सिर्फ दिखने वाली और अल्ट्रा-वायलेट लाइट को ही ऊर्जा में बदल सकती हैं. और जब उन पर इंफ्रारेड किरणें गिरती हैं तो वे ताप उत्पन्न करती हैं और कम उपयोगी हो जाती हैं. ऐसा होना सौर ऊर्जा संरक्षण के लिए अपनाई जा रही प्रक्रिया के लिए अनुकूल नहीं होता.

मेटल ऑक्साइड सौर कोशिकाओं के बारे भी अब तक यही धारणा थी. यही वह बिन्दु है जहां पर स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी का शोध महत्वपूर्ण हो जाता है. उन्होंने अपने शोध की शुरुआत अलग-अलग तापमान पर जल-विघटन के माध्यम से की, वह भी तीन अलग-अलग धातुओं के जरिए– बिस्मुथ वैनाडियम ऑक्साइड, टाइटेनियम ऑक्साइड और आयरन ऑक्साइड यानी जंग.

"तीनों ही मामलों में हमने देखा कि अधिक तापमान पर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अधिक उत्पादन हो रहा था." चयूह की प्रयोगशाला में पीएचडी पूरी कर चुके शोधार्थी और इस शोध पर प्रकाशित रिपोर्ट के सह-लेखक लिमिंग झैंग ने स्टैनफोर्ड की एक रिपोर्ट में कहा कि "हमने महसूस किया कि अधिक तापमान इन कोशिकाओं की वाहक गतिशीलता, मेटल ऑक्साइड से इलेक्ट्रॉन्स के गुजरने की गति, को बढ़ा रहा था."

दरअसल, शोध दल ने खोज निकाला कि जब जंग या मेटल ऑक्साइड सौर कोशिकाएं (metal oxide solar cells) गर्म होती हैं तो सिलिकॉन कोशिकाओं की तुलना में वे अधिक बेहतर क्षमता के साथ फोटोन्स को इलेक्ट्रॉन्स में बदलती हैं. और सबसे खास बात कि जंग बहुत सस्ता भी है.

यही शोध रिपोर्ट स्टैनफोर्ड की वेबसाइट पर भी है, जिसमें चयूह कह रहे हैं कि "हमने दिखा दिया है कि वह सस्ती, प्रचूर मात्रा में उपलब्ध और उपयोग के लिए तैयार मेटल ऑक्साइड यानी जंग बिजली पैदा करने का अधिक अच्छा साधन बन सकती है, पहले की गई उम्मीदों से भी अधिक बेहतर.’’ साथ वे आगे जोड़ते हैं, "ताप और प्रकाश के मिश्रण से, मेटल ऑक्साइड पर आधारित सौर जल विघटक कोशिकाएं सूर्य की अक्षय ऊर्जा को बाद में उपयोग हेतु संरक्षित करने में तुलनात्मक रूप से अधिक बेहतर साबित हो सकती हैं.

चयूह कहते हैं कि इसका मतलब न सिर्फ यह होगा कि सिलिकॉन सोलर सेल्स की तुलना में मेटल ऑक्साइड के उत्पादन पर ध्यान देना आर्थिक रूप से अच्छा विकल्प होगा, बल्कि जल-विघटन के जरिए पैदा की गई हाइड्रोजन का उपयोग वाहनों के ईंधन के तौर पर भी किया जा सकता है, वह भी न्यूनतम प्रदूषण के साथ.

नफोर्ड रिपोर्ट में चयूह कहते हैं कि "हम इन गैसों का भंडारण कर सकते हैं, हम इन्हें पाइपलाइनों के जरिए एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित कर सकते हैं, और जब हम उन्हें जलाते हैं तो हम कोई अतिरिक्त कार्बन उत्पन्न नहीं करते। यह कार्बन-न्यूट्रल एनर्जी साइकिल है."

और यह सिर्फ जंग ही नहीं है, जिसकी खोज कम कार्बन उत्सर्जित करने वाले भविष्य के ईंधन के रूप में की गई है, पिछले वर्ष दिसंबर में ऐसी रिपोर्ट आई थी कि पर्ड्यू यूनिवर्सिटी ने हाइड्रीसिटी पर टेस्ट कर लिया है. हाइड्रीसिटी यानी एक सोलर-हाइड्रोजन एनर्जी सिस्टम, जिसमें पूरे शहरों को बिजली देने की संभावना हो सकती है. वास्तव में इस सिस्टम को सोलर फोटोवोल्टिक सिस्टम और ऊर्जा भंडारण तकनीक के लिए भविष्य के सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर देखा जा रहा है. विविधता के साथ विकसित की जा रही सौर-केंद्रित तकनीकों को देखने के बाद यह कहना सही होगा- अब आई सूरज की बारी.

First published: 9 March 2016, 8:31 IST
 
असद अली

संवाददाता, कैच न्यूज़

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