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1400 साल पहले मुस्लिम महिलाएं पढ़ सकती थीं मस्जिद में नमाज

लमत आर हसन | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

जब महिलाएं मस्जिद में जाने की इजाजत मांगे तो उन्हें मत रोकें: पैगंबर मोहम्मद (मुस्लिम शरीफ, हदीस 884)

इस्लाम के आगमन के करीब 1400 साल बाद बहुत सी मुस्लिम महिलाओं को लगता है कि उन्हें मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं है.

मुझे भी यही लगता था. जब मैंने खुद हदीस (पैगंबर मोहम्मद के बयान) पढ़ने का फैसला किया. मुझे करीब आधे दर्जन संदर्भ ऐसे मिले जिनमें पैगंबर के जीते जी महिलाओं के मस्जिद में नमाज का जिक्र किया गया है.

इसके बाद मैंने तय किया कि मैं दिल्ली की कुछ मस्जिदों में जाकर देखूंगी कि क्या मुझे वहां नमाज पढ़ने की इजाजत मिलती है या नहीं.

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यह जानने की शुरुआत मैंने ज़ाकिर नगर की अबु बकर मस्जिद से की. ये इस इलाके की सबसे पुरानी मस्जिद है. मैं यहां ज़ोहर (दोपहर के बाद) की नमाज़ के लिए पहुंची थी. वहां नमाज पहले से चल रही थी इसलिए जमात की मौजूदगी के कारण मैं अंदर नहीं जा सकती थी.

मैंने वहां रुककर नमाज पूरा होने का इंतजार किया. जब नमाजी बाहर निकल गए तब मैं अपने सिर पर दुपट्टा रखकर अंदर गई.

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अंदर मौजूद कुछ लोगों ने मुझपर ध्यान नहीं दिया. फिर मैंने मस्जिद के बाहर भीख मांग रहे एक शख्स से कहा कि वो इमाम से ये पूछ ले कि क्या मैं वहां नमाज पढ़ सकती हूं. कुछ देर बाद उसने मुझसे आकर कहा कि मैं नमाज पढ़ सकती हूं.

जब नमाजी बाहर निकल गए तो मैं अपने सिर पर दुपट्टा रखे हुए अंदर गई. अंदर मौजूद कुछ लोगों ने मुझपर ध्यान नहीं दिया

मैं दबे पांव मस्जिद के एक किनारे जाकर नमाज पढ़ने की तैयारी करने लगी. मुझे ऐसा लग रहा था कि हर नजर मुझ पर ही होगी. मैंने अपनी नमाज पूरी की.

मैं चाहती थी कि वहां कुछ देर और रहूं. कुरआन की कुछ आयतें पढूं. लेकिन मुझे अहसास था कि मैं इस समय ऐसी जगह हूं जिसे मर्दों की दुनिया कहा जा सकता है.

बाहर निकलते ही मैंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की हिजाब पहनी हुई कुछ छात्राएं दिखीं. मैं ये सोचने लगी कि "ये लोग कहां नमाज पढ़ती होंगी."

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मेरा अगला पड़ाव जंगपुरा की शाही जामा मस्जिद थी. वहां की भीड़ से पहले मैं थोड़ा असहज हुई. फिर गेट पर खड़े एक आदमी से पूछा कि क्या मैं नमाज पढ़ सकती हूं. उसने एक कोने की तरफ इशारा किया.

ये साफ था कि मुझे जमात में नमाज नहीं पढ़ने दी जाएगी. वो मुझसे उम्मीद कर रहे थे कि मैं एक कोनेे में चुपचाप अदृश्य सी होकर नमाज पढ़ लूंगी.

इस मस्जिद में मरम्मत का काम हो रहा था. मेरे ज़हन में ख्याल आया कि यहां औरतों के लिए एक कमरा या मंजिल क्यों नहीं बनवायी जाती.

मुझे ये बात बुरी लग रही थी कि अल्लाह की इबादतगाह में जाने के लिए मुझे दूसरों की इजाजत की जरूरत पड़ रही है. हर जगह यही हो रहा था. पहले इजाजत मांगो. फिर उसके मिलने का इंतजार करो. फिर एक असहज कर देने वाले माहौल में नमाज पढ़ो.

पैगंबर साहब के जमाने में अपनी बीवी को मस्जिद जाने से रोकने वालों की आलोचना की गई

पैगंबर मोहम्मद के जमाने में अपनी बीवी को मस्जिद जाने से रोकने वालों की आलोचना की गई. मुस्लिम शरीफ की हदीस 885 के अनुसार, "बिलाल बी. अब्दुल्लाह ने कहा, अल्लाह के लिए हमें उन्हें रोकना चाहिए. अब्दुल्ला बी, इसपर उमर उनकी तरफ पलटे और उन्हें डांटा. मैंने उन्हें किसी को इस तरह डांटते कभी नहीं देखा था. उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें वो बता रहा हूं जो अल्लाह ने बताया है और तुम कह रहे हो कि हमें उन्हें किसी भी तरह रोकना चाहिए."

पैगंबर मोहम्मद ने महिलाओं को रात में भी मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ने की इजाजत दी थी. (बुखार शरीफ, हदीस 22)

इस बात पर आज हैरत होती है कि इस धारणा ने कैसे जगह बनाई कि महिलाओं को मस्जिद से दूर रहना चाहिए क्योंकि उससे वहां जाने वाले मर्दों का ध्यान बंटता है.

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आम तौर पर मस्जिद में औरतों का जाना रुक गया लेकिन उन्हें भी मर्दों की तरह पांच वक्त की नमाज पढ़नी होती है. खास कर तब जब वो घर से बाहर होती हैं. इस्लाम के झंडाबरदारों को शायद इस बात की फिक्र नहीं होती.

आखिर मुस्लिम मर्द पैगंबर की बातों को अपनी पसंद के हिसाब से चुन-चुन कर क्यों स्वीकार करते हैं. जैसे रात के खाने के बाद मीठा खाने की उनकी आदत. लेकिन औरतों को बराबरी का दर्जा देने की पैगंबर के विचार को इतनी स्वीकार्यता मिलती नहीं दिखती.

पैगंबर महिलाओं को शिक्षा देने के भी समर्थक थे. कुरआन में इल्म शब्द 140 बार आया है. अल-तिरमिदी के अनुसार पैगंबर ने कहा था, "इल्म हासिल करना हर मुसलमान का फर्ज है."

इस पर कोई क्यों बात नहीं करता?

First published: 7 March 2016, 11:14 IST
 
लमत आर हसन @LamatAyub

संवाददाता, कैच न्यूज़

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