Home » खेल » DDCA muck: the questions facing the Subramaniam panel and their answers
 

डीडीसीए घोटाला: किन बातों पर रखनी होगी सुब्रमण्यन आयोग को नज़र?

जी राजारमन | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • दिल्ली का कोटला क्रिकेट मैदान कथित तौर पर डीडीसीए के भ्रष्टाचार की मिसाल बन गया है. आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता राघव चड्ढा के मुताबिक यहां न तो खिलाड़ियों की सुविधा विश्वस्तरीय है और न ही क्रिकेट के प्रशंसकों को पार्किंग जैसी बुनियादी सुविधा मयस्सर हैं.
  • अरुण जेटली के कार्यकाल में डीडीसीए में हुए कथित भ्रष्टाचार का मामला अरविंद केजरीवाल और केंद्र सरकार के बीच राजनीतिक जंग की शक्ल ले चुका है. केजरीवाल ने इस मामले में जांच आयोग का गठन कर दिया है.

दुनिया भर के क्रिकेट मैदान को देखने के बाद अलग तरह की अनुभूति होती है. चाहे वह मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड हो, लॉर्ड्स, ईडन गार्डन, वांडरर्स या फिर बेसिन रिजर्व. इन मैदानों पर मौजूद होना आपको इस अहसास से सराबोर कर देता है कि यहां बहुत कुछ ऐतिहासिक रहा है.

वहीं दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के इतिहास में केवल डीडीसीए का भ्रष्टाचार और अव्यवस्था दिखाई देती है. जब आप कोटला के मुख्य प्रवेश द्वार से गुजरते हैं तो वहां आपको कई दफ्तरों से होकर गुजरना होता है. यह दफ्तर डीडीसीए के शक्तिशाली अधिकारियों का ठिकाना है. आपके मन में सहज ही यह सवाल आएगा कि यहां सब कुछ इतना गंदा क्यों है?

अब यह गंदगी सबके सामने है. दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन में लंबे समय से चल रहे कथित भ्रष्टाचार का मामला सबके सामने है. इसे लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और लंबे समय तक डीडीसीए के प्रेसिडेंट रहे देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली के बीच तलवारें खिंच चुकी हैं. आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच राजनीतिक जंग में कांग्रेस केजरीवाल के पक्ष में खड़ी हो चुकी है.

दिल्ली सरकार ने डीडीसीए में हुए कथित घपले की जांच के लिए जिस आयोग का गठन किया है, वह उसके क्षेत्राधिकार में नहीं आता है

जेटली ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ 10 करोड़ रुपये के मानहानि का दावा ठोंका है जबकि केजरीवाल ने पूर्व सॉलिसीटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यन की अध्यक्षता में डीडीसीए में हुए कथित घपले की जांच के लिए जांच आयोग बनाया है. 

नहीं निकलेगा नतीजा

तमाम बातों के साथ एक बात यह भी तय है कि सुब्रमण्यन आयोग सभी तरह के आरोपों की जांच नहीं कर पाएगा. आखिरकार डीडीसीए कंपनी एक्ट के तहत सेक्शन 25 की कंपनी है, कोई सार्वजनिक निकाय नहीं है. ऐसे में दिल्ली सरकार ने जिस आयोग का गठन किया है उसके दायरे में डीडीसीए नहीं आता है.

अब क्रिकेट का सवाल आता है. चाहे भ्रष्टाचार के सबूत हों या नहीं लेकिन पिछले कई दशकों में डीडीसीए कई तरह की बीमारियों से ग्रसित रहा है. तो किसी आयोग से बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला लेकिन उम्मीद हमेशा बनी रहती है.

सच्चाई यह है कि डीडीसीए कंपनी एक्ट के तहत सेक्शन 25 की कंपनी है जो सार्वजनिक संस्था नहीं है

बीसीसीआई के प्रतिनिधियों, दिल्ली क्रिकेट की हस्तियों और समाज के मशहूर लोगों से बनी उच्चाधिकार समिति डीडीसीए का पुनर्गठन कर सकती है. चाहे वह सुब्रमण्यन समिति हो या फिर विशेषज्ञों से बनी काल्पनिक समिति. यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि समाधान क्या होगा. आखिरकार क्रिकेट को उनके खिलाड़ियों और प्रशंसकों के लिए बनाए रखा जाना चाहिए.

भ्रष्टाचार हुआ या नहीं?

डीडीसीए में हुए कथित घपले की पोल जेटली की ही पार्टी के सांसद ने खोली है. बीजेपी सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद कई सालों से जेटली को निशाना बनाते रहे हैं. उन्होंने अपने आरोपों की सत्यता प्रमाणित करने के लिए कई सबूत और दस्तावेज भी पेश किए.

आजाद ने अपने ट्विटर अकाउंट से जेटली को लेकर कुछ आपत्तिजनक ट्वीट भी किए. हालांकि बाद में उन्होंने दावा किया कि उनके ट्विटर अकाउंट को हैक कर लिया गया है. अब बीजेपी ने आजाद के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है.

सोमवार यानी 21 दिसंबर को कीर्ति की पत्नी पूनम झा आजाद को सेंसर बोर्ड के सदस्य पद से हटा दिया गया जो सीधे सीधे सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत आता है. वित्त मंत्रालय के साथ जेटली के हाथों में इस मंत्रालय की भी कमान है.

आजाद ने जिस घपले का भंडाफोड़ किया है उसे एसएफआईओ और सीबीआई अपनी रिपोर्ट में शामिल कर चुके हैं. दोनों एजेंसियां डीडीसीए मामले में कई शिकायतों की जांच कर रही है. दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से बनाई गई समिति ने भी भ्रष्टाचार के आरोपों पर सहमति जताई है.

मौजूदा स्थिति के मुताबिक स्नेह बंसल अपने अधिकारों का विकेंद्रीकरण कर चुके हैं. बंसल ने बतौर प्रेसिडेंट जेटली की जगह ली थी. हाल ही में हाई कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मुकुल मुदगल के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई थी जिसने कोटला में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ हुए टेस्ट मैच की जांच की.

कोटला की साज सज्जा पर सवाल

कोटला की साज सज्जा पर कुल 114 करोड़ रुपये खर्च किए गए जबकि यह बजट 24 करोड़ रुपये का था. यह भी उन भ्रष्टाचार के आरोपों में शामिल हैं जो जेटली के डीडीसीए प्रेसिडेंट रहते हुआ.

जेटली का दावा है कि विश्व स्तरीय स्टेडियम बनाने के लिए काफी पैसों की जरूरत होती है. लेकिन कोटला शायद ही विश्व स्तरीय स्टेडियम है. चाहे यह बात खिलाड़ियों के नजरिए से कही जाए या फिर जनता के नजरिये से. खिलाड़ियों को जहां कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है वहीं प्रशंसकों को पार्किंग से लेकर बुनियादी सेवाओं के इस्तेमाल में जद्दोजहद करनी पड़ती है.

कोटला क्रिकेट ग्राउंड के पास फायर और नगर निगम की स्थायी मंजूरी तक नहीं है

डीडीसीए का प्रतिनधित्व करने वाली कुछ ही टीमें विवादों से परे रही हैं. इसकी सबसे बड़ी समस्या चयन समिति की गुणवत्ता है. ज्यादा संख्या में टूर्नामेंट नहीं होने से खिलाड़ियों के चयन में बहुत ज्यादा विकल्प नहीं होता है. स्पोर्ट्स वर्किंग कमेटी अलग-अलग टीमों के लिए चयनकर्ताओं की नियुक्ति करती है. इस समिति में 111 क्लबों के 10 प्रतिनिधि होते हैं जो डीडीसीए स्पोर्ट्स कमेटी के मेंबर होते हैं. यह पैनल चयनकर्ताओं को प्रभावित करने की क्षमता रखता है.

तो सवाल यह है कि स्पोर्ट्स कमेटी इतनी शक्तिशाली कैसे हो गई? 1994 में डीडीसीए एग्जिक्यूटिव कमेटी ने स्पोर्ट्स वर्किंग कमेटी के  चयन के अपने अधिकार को छोड़ते हुए चुनाव की वकालत की. 

2009 में वीरेंद्र सहवाग ने दिल्ली की तरफ से खेलना छोड़े जाने की धमकी दी क्योंकि स्पोर्ट्स कमेटी चयन प्रक्रिया पर प्रभाव डालने के लिए जबरदस्त दबाव बना रही थी. यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने यह धमकी दी हो. हालांकि हर बार जेटली से बात होने के बाद उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया.

डीडीसीए प्रेसिडेंट स्नेह बंसल को 1.55 करोड़ रुपये के राउंड ट्रिपिंग के बाद अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ी

सहवाग महत्वपूर्ण खिलाड़ियों के चयन की तरफ इशारा नहीं कर रहे थे. वह उस खरीद फरोख्त का जिक्र कर रहे थे जिसमें 13वें से 15वें नंबर के खिलाड़ियों को शामिल किया जाता है. सहवाग ने कई बार इस मामले को उठाया लेकिन उन्होंने आखिरी मौके पर इससे अपने को दूर कर लिया.

जेटली ने भी इस पैनल को यूं ही छोड़ दिया. उन्होंने कहा, 'सिस्टम को चलाने का बेहतरीन तरीका यह है कि आप अपनी ही संस्था से नहीं टकराएं. आपको अपनी संस्था में सुधार करना होगा और आप सुझाव दे सकते हैं. मुझे नही लगता कि वे एग्जिक्यूटिव कमेटी के खिलाफ हैं. मुझे नहीं लगता कि वह ऐसा होगा.'

आश्चर्य है कि दिल्ली के कप्तान गौतम गंभीर स्पोर्ट्स वर्किंग कमेटी के साथ जुड़े दिखाई दे रहे हैं. 

प्रॉक्सी को लेकर उठे सवाल

डीडीसीए सेक्शन 25 की कंपनी है और इसमें 4,500 सदस्य हैं जो बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का चुनाव करते हैं. इनमें से किसी का क्रिकेट के साथ कोई जुड़ाव नहीं है. 

सहवाग को इसके लिए शुक्रिया कहा जाना चाहिए कि उन्होंने एक दशक पहले शानदार पहल करते हुए रणजी ट्रॉफी के खिलाड़ियों को डीडीसीए का मेंबर बनाया. लेकिन पंजीकरण की प्रक्रिया पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है.

सहवाग 2009 में दिल्ली के लिए खेलना छोड़ना चाहते थे क्योंकि स्पोर्ट्स कमेटी चयन प्रक्रिया पर दबाव बना रही थी

कुछ ऐसे सदस्य हैं जो प्रॉक्सीज को नियंत्रित करते हैं और इस वजह से उनका पूरा नियंत्रण बना रहता है. प्रॉक्सी सिस्टम ही डीडीसीए में कई समस्याओं की जड़ है. पिछले कुछ सालों में सरकार की तरफ से नियुक्त किए गए डायरेक्टर्स को ही देखा जा सकता है जिनका क्रिकेट से कोई लेना-देना नहीं है. विभाकर शास्त्री और सचिन पायलट से लेकर मौजूदा डायरेक्टर प्रवेश वर्मा, सुनील यादव और राजन तिवारी की नियुक्ति पूरी तरह से राजनीतिक रही और इन्होंने दिल्ली क्रिकेट को कुछ नहीं दिया.

युवाओं का क्या होगा?

डीडीसीए एकेडमी को लेकर कोई संकेत नहीं है जहां खिलाड़ियों को खेलने और भविष्य सुधारने का मौका मिले. दिल्ली क्रिकेट के किसी भी शुभचिंतक के लिए खेल की गुणवत्ता को बढ़ाया जाना उसकी प्राथमिकता होगी. 

जस्टिस मुदगल ने साफ किया था कि डीडीसीए के सभी वित्तीय लेन देन के मामलों में पारदर्शिता होनी चाहिए. हालांकि उस वक्त उन्हें आश्चर्य का सामना करना पड़ा जब उन्हें इस बात की जानकारी हुई कि डीडीसीए में कोई वित्तीय और प्रशासनिक दिशानिर्देश ही नहीं हैं. अगर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है तो बीसीसीआई से आने वाले फंड के इस्तेमाल में गड़बड़ी को रोक पाना मुश्किल होगा. इस व्यवस्था को खत्म किए जाने की जरूरत है.

सर्टिफिकेट और लाइसेंस, साफ सुथरी चयन प्रक्रिया और प्रॉक्सी सिस्टम का खात्मा कर डीडीसीए बेहतर क्रिकेट की शुरुआत कर सकता है. और ऐसी स्थिति में क्रिकेट के प्रशंसक भी बड़े गर्व के साथ कोटला जाएंगे.

First published: 23 December 2015, 8:29 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी