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लगातार बदलता फुटबॉल: सुअर के ब्लैडर से सिंथेटिक रबर तक

रंजन क्रास्टा | Updated on: 11 July 2016, 7:47 IST

जब हम दुनिया के सबसे लोकप्रिय और ‘खूबसूरत खेल’ फुटबॉल के बारे में बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में कई बातें आने लगती हैं, मसलन पैसा, चकाचौंध, सुगठित शरीर वाले एथलीट, खिलाड़ियों की मॉडल पत्नियां और प्रेमिकाएं, स्टेडियम और विश्व कप. इन सबके बीच एक चीज ऐसी है जिसका जिक्र शायद सबसे कम होता है और उसका नाम इस खेल के नाम में ही शामिल है- वह है बॉल.

यह बॉल इस खेल का ऐसा हिस्सा बन गया है कि हमने इसकी जटिलताओं के बारे में सोचना ही बंद कर दिया है. हम इस बात से आगे नहीं बढ़ते कि बॉल महज एक बॉल है. और यह बॉल ऐसी ही है, ऐसी ही थी और ऐसी ही रहेगी.

लेकिन सच इससे काफी अलहदा है. जैसे फुटबॉल का धीरे-धीरे विकास हुआ है, उसी तरह से हजारों सालों के दौरान यह बॉल भी अपने रूप बदलती रही है और आज इस रूप में आपके सामने है.

सुअर के ब्लैडर से रबर तक

यह बॉल हमारे बीच हजारों सालों की विकास प्रक्रिया का परिणाम है. और जब से यह बॉल हमारे बीच में है, हमने इसे इधर-उधर फेंका है या इसे किक लगायी है. शुरुआत में बॉल के लिए केवल एक ही योग्यता जरूरी थी, वह था इसका मोटे तौर पर गोल होना.

ईसा-पूर्व के चीन में चमड़े के थैले में पंख और बाल आदि भरकर बॉल बनायी जाती थी, तो मध्ययुगीन इंग्लैंड में इंसान की खोपड़ी का इस्तेमाल करने के भी किस्से हैं. जानवर की अंतड़ी से लेकर आज इस मौजूदा रूप में, जिसे हम देखते और पसंद करते हैं, एक खेल के तौर पर बॉल ने काफी लंबी यात्रा तय की है.

हालांकि, जहां तक फुटबॉल के वर्तमान बॉल का सवाल है, इसकी शुरुआत रबर के वल्केनाइजेशन से हुई थी.

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जब चार्ल्स गुडइयर ने साल 1836 में वल्केनाइज्ड रबर का पेटेंट कराया, तब से इसकी यात्रा आरंभ हो गयी. अब बॉल सुअर के ब्लैडर के आकार पर निर्भर नहीं रही. वल्केनाइज्ड रबर के तकरीबन 20 सालों के बाद गुडइयर ने मैटेरियल से बना पहला फुटबॉल पेश किया.

इसके सात साल बाद 1862 में एक अन्य आविष्कारक एचजे लिंडन ने दुनिया की पहली हवा से भरी वल्केनाइज्ड रबर बॉल बना डाली.

इंग्लिश फुटबॉल एसोसिएशन और एक स्टैंडर्ड बॉल

लिंडन के बॉल बनाने के एक साल बाद इंग्लिश फुटबॉल एसोसिएशन, जो यूनाइटेड किंगडम में फुटबॉल की प्रतिनिधि संस्था थी, ने इस खेल के नियमों को अंतिम रूप देने के लिए एक बैठक की. हालांकि, इस बात के भी दस सालों के बाद 1872 में उन्होंने बॉल से जुड़े नियमों को तय किया.

अंतिम तौर पर यह तय किया गया कि बॉल गोल आकार की होगी और उसकी परिधि मोटे तौर पर 27 से 28 इंच होगी. यह नियम आज तक चल रहा है. साल 1872 में यह तय किया गया कि फुटबॉल के बॉल का वजन 13 से 15 औंस होगा. बाद के वर्षों में इसे संशोधित किया गया और इसका वजन थोड़ा बढ़ाकर 14 से 16 औंस कर दिया गया. यह तय हुआ कि बॉल का खोल चमड़े का या फिर इसी तरह के किसी अन्य उपयुक्त मैटेरियल का होगा.

इस तरह बॉल की माप भले ही लगभग 150 साल पहले तय कर दी गयी हो, लेकिन इसकी विकास यात्रा में अभी कई पड़ाव आने बाकी थे.

1900-1950: चमड़े के बॉल का दौर

1900 तक फुटबॉल मजबूत रबर ब्लैडर से बनाये जाते थे. इसकी वजह से वह काफी ताकत को भी सहन कर लेते थे और उनका आकार नहीं बिगड़ता था. ये शोधित किये गये चमड़े के कवर में सिले रहते थे. आम तौर पर इसके 18 हिस्से होते थे, जो एक दूसरे से सिले होते थे और फिर अंत में एक सिरे पर सिलाई होती थी.

लेकिन इस बॉल की दिक्कत यह थी कि इसका चमड़ा पानी सोख लेता था और भारी सिलाई की वजह से यह काफी वजनी हो जाता था. इसे किक करने में पैर में दर्द होता था, ऐसे में इसे हेड करने के नतीजे के बारे में आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं. भले ही इसका आकार-प्रकार तय हो गया था, लेकिन इसे बनाने के लिए इस्तेमाल चमड़े का प्रकार अलग-अलग होता था.

शायद इसी बात ने 1930 के पहले विश्व कप में अर्जेंटीना और उरुग्वे के बीच खेले गये फाइनल मैच का अंतिम फैसला तय किया. इस बात पर सहमति नहीं बन सकी कि मैच में किस देश का बॉल इस्तेमाल किया जाये. 

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ऐसे में दोनों देशों ने एक-एक बॉल दी. पहले हाफ में अर्जेंटीना की बॉल इस्तेमाल की गयी और अर्जेंटीना ने 2-1 की बढ़त ले ली. दूसरे हाफ में मैच उरुग्वे की बॉल से खेला गया और उरुग्वे ने 4-2 से मैच और खिताब अपने नाम कर लिया.

साल 1930 के बाद और सुधार किये गये. ब्लैडर और चमड़े के कवर के बीच कपड़े लगाये गये ताकि उसका आकार बना रहे और बॉल अधिक टिकाऊ रहे. चमड़े को ऐसा बनाया गया कि वह कम पानी सोखे. एक नये तरह के वॉल्व का भी इस्तेमाल किया गया, इस तरह कवर को बांधने की जरूरत खत्म हो गयी.

साल 1951 में पहली बार सफेद बॉल का इस्तेमाल हुआ, ताकि फैन इसे बेहतर तरीके से देख सकें.

1950 से अब तक: वह बॉल अच्छी जो मुड़ सके

1960 के दशक में बॉल बनाने के लिए असली चमड़े का इस्तेमाल बंद हो गया. अब इसके लिए सिंथेटिक लेदर का इस्तेमाल होने लगा. स्ट्रक्चर और क्वालिटी के लिहाज से यह असली चमड़े की ही तरह था, लेकिन पानी नहीं सोखता था और जल्दी खराब भी नहीं होता था.

ये सिंथेटिक लेदर पैच पेंटागॉन (पंचभुज) और हेक्सागॉन (षटभुज) के आकार में आते. हर बॉल में 12 पेंटागॉन और 20 हेक्सागॉन एक साथ सिले होते. जब ये साथ जुड़ते, तो एक पूरे गोले का आकार बन जाता.

मूल रूप से पेंटागॉन काले होते ताकि खिलाड़ी बॉल पर बने मुड़ाव को देख सकें. साल 1970 में पहली बार विश्व कप में इस तरह की बॉल का इस्तेमाल किया गया.

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फुटबॉल की बॉल अब भी अपना रूप बदल रही है, हालांकि अब इसके बदलाव नये युग के मैटेरियल के इस्तेमाल और बेहतर सिलाई तक सीमित हो गये हैं. अब बॉल बनाते समय हर संभव कोशिश की जाती है कि किक लगाने के दौरान खिलाड़ी की ऊर्जा कम से कम बर्बाद हो. 

अब फुटबॉल की बॉल मुलायम होती है, लेकिन इसका आकार नहीं बिगड़ता. यह पानी नहीं सोखती. किक लगाने पर इसकी उड़ान की उचित ट्रेजेक्ट्री बरकरार रहती है. अब बॉल बनाते समय इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि इसे हेड करते समय खिलाड़ियों को कोई दिक्कत न हो, जैसे पहले हुआ करती थी.

First published: 11 July 2016, 7:47 IST
 
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