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भारतीय फुटबॉल के 6 ऐसे नायक जिन्हें भुला दिया गया

भार्गब सर्मा | Updated on: 7 February 2017, 13:49 IST
QUICK PILL
  • आजादी\r\nके बाद के शुरुआती सालों में\r\nभारत को एशिया के फुटबॉल खेलने\r\nवाले अग्रणी देशों में माना\r\nजाता था.
  • सैलेन\r\nमन्ना से सुनील क्षेत्री तक\r\nकई भारतीय फुटबॉलरों को उनके\r\nहिस्से की लोकप्रियता हासिल\r\nहुई लेकिन कई ऐसे खिलाड़ी भी\r\nहैं जिनके योगदान को सराहा\r\nनहीं गया.

भारतीय पुरुष फुटबॉल टीम ने १९४८ में हुए लंदन ओलंपिक में भागीदारी के साथ अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत की थी. उसके बाद से इस खेल का सफ़र काफ़ी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. आजादी के बाद के शुरुआती सालों में भारत को एशिया के फ़ुटबॉल खेलने वाले अग्रणी देशों में माना जाता था. 1951 और 1962 में हुए एशियाई खेलों में भारत ने गोल्ड मेडल जीता.

भारत 1964 में हुए एशियाई खेलों में इसराइल से फ़ाइनल में हारकर दूसरे स्थान पर रहा था. जिसमें चार टीमों आपस में लीग फार्मेट में मुक़ाबला किया था. 1956 के ओलंपिक में भारतीय टीम अंतिम आठ में ऑस्ट्रेलिया को हराकर सेमीफाइनल में पहुंची थी. बाद के सालों में भारतीय महिला और पुरुष दोनों फ़ुटबॉल टीमों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली-जुली सफलता हासिल की.

भारत को मिली शुरुआती सफलताओं से जाहिर है कि उसके पास फुटबॉल के अपने देसी हीरो भी रहे होंगे. सैलेन मन्ना से सुनील क्षेत्री तक कई भारतीय फुटबॉलरों को उनके हिस्से की लोकप्रियता हासिल हुई. लेकिन कई ऐसे खिलाड़ी भी हैं जो या तो इतिहास की गर्त में कहीं खो गए या फिर उनके योगदान को सराहा नहीं गया.

आइये, भारतीय फुटबॉल के 6 नेपथ्य के नायकों को जानें.

तालिमेरेन एओ

आजाद भारत की पहली फ़ुटबॉल टीम के कप्तान तारिमेरेन एओ का जन्म 1918 में चांगकी, नागालैंड (तात्कालिन असम) में हुआ था. जब नगा राष्ट्रवाद अपने उफान पर था उस समय 1948 के लंदन ओलंपिक्स में एओ भारतीय दल झंडे के साथ भारतीय दल का नेतृत्व कर रहे थे. उनके नेतृत्व में भारत ने अपनी आधिकारिक शुरुआत की लेकिन उनकी टीम को फ्रांसीसी टीम से 2-1 से हार का सामना करना पड़ा.

उसी साल उन्हें मोहन बागान फ़ुटबॉल क्लब की कप्तानी भी मिली. वो क्लब में पाँच साल पहले जुड़े हुए थे. उन्होंने मोहन बागान के लिए 1952 तक खेला और उसी साल इस खेल से एओ ने संन्यास ले लिया. उनकी मौत के 50 साल बाद क्लब ने उनके योगदान को पहचाना और उन्हें मरने के बाद मोहन बागान रत्न से सम्मानित किया गया. 2009 में उनकी उपलब्धियों की याद में पहले डॉक्टर टीएओ मेमोरियल फुटबॉल टूर्नामेंट की शुरुआत हुई.

थजाथेरी अब्दुल रहमान

जब भी केरल के फुटबॉल खिलाड़ियों की बात होती है तो दिमाग में सबसे पहले आईएम विजयन का नाम आता है. लेकिन विजयन से बहुत पहले थजाथेरी अब्दुल रहमान ने फ़ुटबॉल में केरल के झंडे को शान से लहराया था. बेहद प्रतिभाशाली रहमान ने 1956 के मेलबोर्न ओलंपिक के क्वार्टर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को 4-2 से हराने में अहम भूमिका निभायी थी.

मशहूर ओलंपिक खिलाड़ी होने के कारण केरल में वो 'ओलंपियन रहमान' के नाम से जाने जाते हैं. 1955 से 1966 के बीच उनकी टीम ने पांच बार संतोष ट्रॉफी का खिताब जीता. उन्होंने चार बार बंगाल की ओर से और ए बार बैंगलुरु की ओर से खिताब जीता. 60 के शुरुआती दशक में वो मोहन बागान के एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी थे. उन्होंने कुछ सालों तक क्लब की कप्तानी भी की.

शिओ मेवालाल

कई फुटबॉल इतिहासकार शियो मेवालाल को भारत का सर्वश्रेष्ठ सेंटर फॉरवर्ड खिलाड़ी मानते हैं. उन्होंने 1951 के एशियाई खेलों में ईरान के खिलाफ हुए फाइनल मैच में शानदार प्रदर्शन किया था. भारत के तात्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी उस मैच में उनके खेल की प्रशंसा की थी. लेकिन इतिहास के पन्नों में भुला दिए गए. यहाँ तक कि उनकी मौत से पहले कोलकाता के रेलवे अस्पताल ने उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया था क्योंकि अस्पताल के अधिकारी उनके बारे में जानते नहीं थे.

बिहार के दौलतपुर में जन्मे मेेवालाल ने अपने जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा कोलकाता में गुजारा. उनका परिवार उनके बचपन में ही बिहार से कोलकाता चला गया था. ईस्ट बंगाल रेलवे एफसी टीम के लिए खेलने वाले मेवालाल आजादी के बाद देश के बेहतरीन स्ट्राईकर के रूप में उभरे. 1948 के ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ हारने वाली भारतीय टीम के वह अहम हिस्सा था. तीन साल बाद ही नई दिल्ली में हुए एशियन गेम्स में उन्होंने भारतीय फुटबॉल टीम को गोल्ड मेडल दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने टूर्नामेंट में तीन गोल दागे जिसमें फाइनल में ईरान के खिलाफ किया गया विजयी गोल भी शामिल है.

बेमबेम देवी

भारत की महान महिला फुटबॉल खिलाड़ी के तौर पर सम्मान पाने वाली बेमबेम देवी ने दस साल की उम्र से ही अपने घर के नजदीक ही लड़कों के साथ फुटबॉल खेलना शुरू किया. इम्फाल में पैदा हुईं बेमबेम देवी ने कुछ ही सालों में मणिपुर की सीनियर टीम में अपनी जगह बना ली और 1995 में मात्र 15 साल की उम्र में उन्होंने भारत के लिए खेलना शुरू किया. उन्होंने अपने करियर में मणिपुर प्रादेशिक टीम को 16 राष्ट्रीय खिताबी जीत दिलायी. जिनमें नौ में वो बतौर कप्तान खेल रही थीं.

उन्होंने साल 2010, 2012 और 2014 में दक्षिण एशियाई खेलों में भारत को खिताब दिलाया. भारतीय उपमहाद्वीप की बेहतरीन मिडफिल्डरों में शुमार की जाने वाली बेमबेम मालद्वीव के लिए भी खेली थीं. उन्होंने वहाँ के न्यू रेडिएंट क्लब से खेलते हुए उसे दो राष्ट्रीय खिताब दिलवाए. फ़ुटबॉल में उनके इतने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद अब तक अर्जुन पुरस्कार पाने वालों की सूची में उनका नाम न होना थोड़ा चौंकाता है.

शायलो माल्सौम्ताल्वांगा

किसी शीर्ष क्लब में खेलने वाले मिजोरम के पहले फुटबॉलर शायलो माल्सौम्ताल्वांगा अपने राज्य में एक लिजेंड बन चुके हैं. भारतीय फुटबॉल प्रेमियों के बीच 'मामा' के रुप में लोकप्रिय माल्सौम्ताल्वांगा 2002 में ईस्ट बंगाल में शामिल हो गए और इस घटना ने कई मिजो नौजवानों को उनके कदमों पर चलने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने आगे चलकर कोलकाता के दिग्गजों के साथ दो लीग टाइटल और 2003 का एशिया कप जीता.

मैदान पर सबसे ज्यादा सक्रिय रहने वाले माल्सौम्ताल्वांगा फील्ड के हर हिस्से में अपनी धाक जमाते नजर आते हैं. वो ईस्ट बंगाल के लिए नियमित रुप से खेलते हैं. इंडियन सुपर लीग में वो दिल्ली डायमोनोज के लिए खेलते हैं. लेकिन ये हैरत की बात है कि ३० साल कके शायलो को भारत की राष्ट्रीय टीम में महज तीन बार खेलने के मौका मिला है.

बाला देवी

बाला देवी ने 3.13 के औसत से मात्र 15 मैच में 47 गोल किए हैं. यह मात्र 2014 के सत्र का आंकड़ा है. मणिपुर में जन्मी बाला देवी हाल के सालों की भारत की सबसे अच्छी फ़ुटबॉल खिलाड़ी मानी जाती हैं. 2010 और 2014 के सैफ महिला चैंपियनशिप की हासिल जीतों में वो एक आधार स्तम्भ रहीं. साल 2014 के सीज़न में उन्होंने कुल 16 गोल दागे थे.

महिला फुटबॉल के लिए भारत में किसी पेशेवर ढांचे की गैर-मौजूदगी के बावजूद बाला देवी को पिछले कुछ सालों में अच्छी सफलता मिली है. वो मणिपुर की टीम की महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. पिछली नैशनल चैंपियनशिप में उन्होंने 7 मैचों में 29 गोल दागे थे.

इसी साल फरवरी 2015 में बाला देवी ने केरल में हुए राष्ट्रीय खेलों में मणिपुर को मेडल दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हाल में ही जून में उन्होंने 7 मैचों में 25 गोल करते हुए न्यू रेडिएंट क्लब को मालद्वीप का राष्ट्रीय खिताब दिलाया. उन्हें टूर्नामेंट का बेस्ट प्लेयर चुना गया.

First published: 1 January 1970, 5:30 IST
 
भार्गब सर्मा @bhargabsarmah

संवाददाता, कैच न्यूज़. फ़ुटबॉल और दूसरे खेलों पर लिखते हैं.

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