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क्रिकेटः 'कोटला में मुफ्त में खेल दिखाने का काम सबसे तेज होता है'

जयदीप घोष | Updated on: 20 January 2016, 23:10 IST
QUICK PILL
  • जस्टिस मुद्गल कमेटी ने दिल्ली ज़िला क्रिकेट एसोशिएशन पर दी गयी अपनी रिपोर्ट में संस्था की गड़बड़ियों पर ध्यान दिलाया. कमेटी ने सुधार के उपाय भी सुझाए हैं.
  • मुद्गल रिपोर्ट के बावजूद डीडीसीए के कार्यशैली में बदलाव की गुंजाइश कम है. डीडीसीए को सुधार के लिए बाजार के दबाव और राजनीतिक दखलंदाजी से मुक्त होना होगा.

भारत और दक्षिण अफ्रीका टेस्ट पर पूर्व जस्टिस मुकुल मद्गल की 27 पन्नों की रिपोर्ट तथा दिल्ली ज़िला क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) के हालिया मामले से वही बात फिर सामने आयी है जो हम पहले से जानते थे.

इस रिपोर्ट में डीडीसीए की ढेर सारी कमियों और गड़बड़ियों पर उंगली उठायी गयी है.

डीडीसीए ने जिस तरह ठेके दिए और उन्हें पूरा करवाया उसपर भी मुद्गल रिपोर्ट ने तथ्यों के साथ सवाल उठाए. पिछले वित्तीय वर्ष के करोड़ों के बिल बकाया पड़े थे. ये ठेके किसने और कैसे दिए इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

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दुर्भाग्यवश, आप इस रिपोर्ट को जितना पढ़ेंगे ये आपको उतनी ही जानी-सुनी लगेगी. डीडीसीए दशकों से ऐसे ही काम करता रहा है.

जस्टिस मुद्गल रिपोर्ट में इस बात पर ध्यान दिलाया गया है कि किस तरह विभिन्न कमेटियां और सब-कमेटियां कोई भी ठोस काम नहीं करतीं. जब ठोस काम की बात आती है तो इनके ज्यादातर पदाधिकारी नजर ही नहीं आते.

क्या डीडीसीए पूर्व जस्टिस मुकुल मुद्गल की रिपोर्ट से कोई सीख लेगा?

जस्टिम मुद्गल ने विभिन्न एसोसिएशनों के बीच तालमेल की कमी और मनमानेपन का भी मुद्दा उठाया.

फिरोजशाह कोटला मैदान में सब कुछ फौरी मांग के आधार पर होता था. अगर आपको किसी मैच के लिए हरी घास चाहिए, साफ कुर्सियां चाहिए, ठीकठाक बाथरूम और वाई-फाई चाहिए तो आपको बस बताना होगा. ये चीजें आपको मिल जाएंगी. लेकिन कैसे? ये पूछने पर कोई अधिकारी कहेगा, "आप चिंता न करें सर, सब कंट्रोल में है."

यहां का सारा काम दरअसल हायतौबा के आधार पर होता है. जब तक हायतौबा न मच जाए तब तक उनके कानों में घंटी नहीं बजती.

सारे इंतजाम आखिरी वक़्त में किए जाएंगे चाहे उनकी जो भी क़ीमत चुकानी पड़े. मुद्गल रिपोर्ट में कहा गया है, "पिछले मैचों के ठेकों/वर्क आर्डरों के दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं."

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रिपोर्ट के अनुसार, "नतीजतन, कई सारे वेंडर निविदा में शामिल ही नहीं होते. जो होते हैं वो भी भुगतान में देरी की आशंका के चलते बहुत ऊंची दर देते हैं."

ज्यादातर मामलों में किसी इवेंट के ठीक पहले के हफ़्ते में टीमों का गठन किया जाता था. भारत-दक्षिण अफ्रीका टेस्ट के मामले में भी यही हुआ. जस्टिस मुद्गल ने तालमेल और संवाद की कमी पर तीखी टिप्पणी की है.

डीडीसीए मदद न करने के मामले में भी पहले से बदनाम है. अगर आप वित्त सचिव हैं तो आप यहां के ऑडिटरों से पार न पा सकेंगे. अगर आप संगठन सचिव हैं तो आपको हर आकार-प्रकार के वेंडरों के सामना करना पड़ेगा.

अगर आप एकाउंट देख रहे हैं तो इवेंट के खत्म होने के बाद जब भुगतान की बारी आएगी तो आप गायब हो जाएंगे. और इन सबमें चार चांद लगाता है डीडीसीए की तरफ से दिए जाने वाले कॉम्प्लिमेंट्री टिकट.

जस्टिस मुद्गल की रिपोर्ट में डीडीसीए की कमियों की ओर खुलकर इशारा किया गया है

जस्टिस मद्गल के अनुसार डीडीसीए की एक मात्र कमेटी तेज रफ्तार से काम करती है वो है 'टिकट कॉम्प्लिमेंट्री कमेटी.

जी हां, कोटला में मुफ्त में खेल दिखाने का काम सबसे तेज होता है. आम भाषा में ऐसे टिकट को 'पास' कहते हैं. जिसे पाने के लिए पुलिस, नगरपालिका, मंत्री, केंद्रीय कर्मचारी, वरिष्ठ पत्रकार और आम आदमी सभी बेचैन रहते हैं.

अगर ये 'पास' थोड़ी होशियारी से बांटे जाएं तो सुरक्षा और दूसरे बंदोबस्त से जुड़े कई मामले आसानी से निपट जाते हैं और इस तरह कई जरूरी मुद्दों को आराम से चारपाई के नीचे बुहारा जा सकता है.

जस्टिस मुद्गल ने किसी इवेंट के बाद इनाम बांटने और फोटो खिंचाने की होड़ पर भी टिप्पणी की है. शायद यही वो एक वक़्त होता है जब डीडीसीए के पदाधिकारी एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं.

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दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधर और जस्टिस विभु बाखरु के सामने पेश की गयी इस रिपोर्ट में ये भी सुझाव दिया है कि हालात सुधारने के लिए कौन से क़दम उठाए जा सकते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार ठेके और टेंडर देने समेत तमाम वित्तीय मामलों में ज्यादा नियमितता बरतने की जरूरत है. इसके अलावा संस्था को ज्यादा प्रभावी, दोस्ताना और सहकारी बनने की भी आवश्यक्ता है.

उम्मीद है कि डीडीसीए बाजार के दबाव और राजनीतिक दखलंदाजी से उबरने में सफल रहेगा. भविष्य में जो भी फिलहाल तो जस्टिस मुद्गल अपनी शानदार रिपोर्ट के लिए बधाई के पात्र हैं.

First published: 20 January 2016, 23:10 IST
 
जयदीप घोष @jd0893

The author has been a sports journalist for over 20 years. He has worked with leading newspapers like The Statesman, Hindustan Times and The Tribune, as well as portals like espnstar.com

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