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पूर्व सीएजी विनोद राय के कंट्रोल के बावजूद बीसीसीआई पर बड़ी चुनौतियां बनी रहेंगी

जी राजारमन | Updated on: 1 February 2017, 8:00 IST
(कैच न्यूज़)

इसकी कल्पना शायद बहुत कम लोगों ने की होगी कि जिस भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) का प्रबंधन कई सालों से काफी चुनौतीपूर्ण बना हुआ था, उसका जिम्मा सुप्रीम कोर्ट प्रशासकों की समिति (सीओए) को दे देगा. इससे पहले बोर्ड का प्रबंधन खेल प्रशासन की कुछ असाधारण हस्तियों ने किया है. अब इसका दायित्व चार प्रशासकों पर है, जिन्होंने कभी खेल का प्रबंधन किया भी है, तो शायद बहुत कम.

बीसीसीआई का नियंत्रण अब पूर्व महालेखापरीक्षक एवं नियंत्रक विनोद राय की अध्यक्षता में प्रशासकों की टीम करेगी. टीम में पूर्व भारतीय महिला टीम की कप्तान डायना इडूल्जी, इतिहासकार और क्रिकेट लेखक रामचंद्र गुहा और आईडीएफसी के प्रबंध निदेशक विक्रम लिमये हैं.

जब भी कोई अचानक परिवर्तन होने वाला होता है, तो कुछ शंकाएं भी रहती हैं. प्रशासकों की यह समिति सुप्रीम कोर्ट की इस जिम्मेदारी को निभा भी पाएगी या नहीं? उसे इस काम में मदद मिल सकती थी यदि राष्ट्रीय चयन समिति के अध्यक्ष एमएसके प्रसाद को इस समिति में लिया जाता. उन्होंने सीईओ के तौर पर आंध्र क्रिकेट एसोसिएशन का कायाकल्प किया था. पर किसी ने भी सुप्रीम कोर्ट से उनकी सिफारिश नहीं की. 

अब तो विश्वास करना ही पड़ेगा कि सीओए के सभी सदस्य लोढ़ा समिति की सिफारिशों के अनुरूप सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ईमानदारी से लागू करेंगे.

उम्मीद है कि ये चारों क्रिकेट प्रशासन में तब्दीली लाने के लिए अपने-अपने कामों से समय निकालेंगे. इस जिम्मेदारी के लिए आवश्यक है कि यह समिति अपने काम में ढील नहीं बरतेगी और ना ही अपनी लाचारी जाहिर करेगी. खासकर गुहा और लिमये को इस समिति को प्रभावी बनाने के लिए अपना समय देने की अतिरिक्त कोशिश करनी पड़ेगी.

महती चुनौती

एक बार जब समिति लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू करना शुरू कर देगी, तब उसे महसूस होगा कि उसके सामने अहम चुनौतियां हैं. सुप्रीम कोर्ट के 18 जुलाई के आदेश के बावजूद लोढ़ा समिति उन चुनौतियों से नहीं निपट सकी. इसके बावजूद कि सुप्रीम कोर्ट ने ना केवल उसकी सिफारिशों को पूरी तरह माना, बल्कि यह सुनिश्चित करने के अधिकार भी दिए कि सुधार 4 से 6 महीने में हो जाने चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हमारी राय में बदलाव की जिम्मेदारी समिति पर छोड़ी जा सकती है, केवल इसलिए नहीं कि उसे जो समस्याएं हल करनी हैं, उनकी उसे समझ और पहचान है, बल्कि इसलिए भी कि वह अमुक समय में सुधार हो जाने की समयसीमा भी तय कर सकती है.’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हमें इस तथ्य की जानकारी है कि प्रक्रिया में समय लग सकता है, पर उम्मीद करते हैं कि यह चार महीने की अवधि में पूरा हो जाएगा या ज्यादा से ज्यादा आज से 6 महीने में. इसलिए हम जस्टिस लोढ़ा की अध्यक्षता वाली समिति से अनुरोध करते हैं कि वे सिफारिशों को लागू करने की उचित समयसीमा तय करे और उस संबंध में कार्यन्वयन पर नजर रखे.’

दिलचस्प है कि जब लोढ़ा समिति ने केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई और पूर्व भारतीय खिलाड़ी अनिल कुंबले, मोहिन्दर अमरनाथ और इडुल्जी सहित चार-सदस्यीय संचालन समिति की सिफारिश की थी, उसने राष्ट्रीय स्तर पर खिलाडिय़ों का संघ बनाने की भी बात कही थी, पर उसके लिए एक भी कदम नहीं उठाया गया है.  

मुख्य बाधा

बीसीसीआई की साधारण सभा ही केवल परिवर्तनों की व्यवस्था कर सकती है. उसे संबद्ध राज्य संघों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर करने की आवश्यकता पड़ेगी. इसका मतलब है कि बीसीसीआई की साधारण सभा की बैठक में आने के लिए नामांकित करने से पहले राज्य संघ लोढ़ा समिति की सिफारिशों की अनुपालना करे. 

जाहिर है, बीसीसीआई में सुधार तभी शुरू हो सकते हैं, जब वे निचले स्तर पर, राज्यों संघों में लागू कर दिए गए हों. प्रशासकों की समिति पर यह सुनिश्चित करने की महती जिम्मेदारी है कि राज्य संघ अपने पदाधिकारियों का कार्यकाल सीमित करे, प्रॉक्सी वोटिंग से दूर रहे, कार्य में पारदर्शिता बरते, बीसीसीआई द्वारा जांच और लेखा-परीक्षा के लिए तैयार रहे और सदस्यता और प्रबंधन में खिलाडिय़ों को शामिल करे, जैसी कि लोढ़ा समिति ने कल्पना की है.

उक्त चार सदस्यीय समिति को ज्यादा लोगों के सहयोग की जरूरत पड़ेगी. यह सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्य संघ एक-सा व्यवहार करेंगे, ताकि बीसीसीआई लोढ़ा के अनुरूप बन सके. लोढ़ा समिति का कहना था कि राज्य संघ के संविधान और कार्यों में एकरूपता आवश्यक है. 

कार्यकाल का प्रश्न

कुछ और भी बातें हैं, जिनसे भ्रांतियां हो सकती हैं. पहली, इस पर विचार करना बाकी है कि 9 साल तक राज्य संघ का पदाधिकारी रहने के बाद क्या वह बीसीसीआई का पदाधिकारी हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय निरर्हताओं में बीसीसीआई या राज्य संघ के लिए 9 साल की सीमा है, पर यहां बात थोड़ी स्पष्ट नहीं है. 

पहली बात, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो बीसीसीआई का 9 साल तक पदाधिकारी रह चुका है, वह नहीं हो सकता. फिर 3 जनवरी को संशोधन किया कि,.‘जो लगातार 9 साल तक बीसीसीआई या राज्य संघ का पदाधिकारी रह चुका हो.’

अस्पष्टता को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी को फिर संशोधन किया, ‘उसी काल में जो बीसीसीआई या राज्य संघ का 9 साल तक पदाधिकारी रह चुका हो.’

उपाध्यक्ष सीके खन्ना, संयुक्त सचिव (और कार्यवाहक सचिव ) अमिताभ चौधरी, और कोषाध्यक्ष अनिरुद्ध चौधरी जैसे कुछ लोगों ने इस परिवर्तन को बीसीसीआई में 9 साल रहने का अपना अधिकार मान लिया, भले ही वे राज्य संघ में 9 साल से ज्यादा समय के लिए पदाधिकारी रह चुके हों. 

आदेश अराजकता से उभरेगा

दूर से ऐसा लगता है कि बीसीसीआई पोर्टल में थोड़ी अराजकता रहेगी. पर यदि प्रशासकों की समिति अपना काम मेहनत से करती है और उसे पूरा करने के लिए खुद ही व्यावहारिक समयसीमा निर्धारित करती है, तो व्यवस्था बनी रहेगी और क्रिकेट से मिलने वाले राजस्व का पहले से ज्यादा उचित और ईमानदारी से उपयोग होगा.

जैसे ही भारतीय क्रिकेट प्रशासन, सीओए और बतौर उत्प्रेरक सुप्रीम कोर्ट के साथ, 21वीं सदी में कदम रखता है, सावधानी से जैसे कि वे थे, और प्रशासन और प्रबंधन के आधुनिक तरीके अपनाता है, तो  आशंकाएं और भ्रांतियां रहेंगी. पर जैसा कि हमारे देश में ज्यादातर होता है, बहुत संभव है कि आदेश अराजकता से उभरे, जो फिलहाल बीसीसीआई का मुकाबला कर सके. 

First published: 1 February 2017, 8:00 IST
 
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