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मीरा राय : माओवादी से तेज रफ्तार धावक बनने की कहानी

असद अली | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • मीरा राय को परिवार चलाने के लिए 14 साल की उम्र में नेपाल की माओवादी सेना में भर्ती होना पड़ा था. आज वो माउंट रेसिंग में पूरी दुनिया की सफलतम एथलीट बन कर उभरी हैं.
  • मीरा के जीवन और संघर्ष पर बनी एक डाक्युमेंट्री फिल्म दिसंबर में रिलीज होगी.

उनका बचपन दुर्गम पहाड़ी इलाकों में अपने वजन से दोगुनी भारी चावल की बोरी ढोते हुए बीता. बाद में वो नेपाल की माओवादी सेना में सैनिक के रूप में भर्ती हो गईं. अब वो रेसिंग की दुनिया का अंतरराष्ट्रीय सितारा हैं. क्योंकि उन्होंने दुनिया की सबसे मुश्किल माने जानी वाली माउंटेन रेस में जीत हासिल की है.

नेपाल की मीरा राय 14 साल की उम्र में माओवादी सेना में भर्ती हो गयी थीं क्योंकि उन्हें "तीन वक्त का खाना और दो हजार रुपये भत्ता देने का वादा किया किया गया था, जिसे वो अपने घरवालों को भेज सकती थीं."

अब उनकी उम्र 25 साल है और इस साल अप्रैल में उन्होंने फ्रांस के 80 किलोमीटर लंबे मॉ ब्लां रेस में नया रिकॉर्ड बनाया है. रेस के दौरान उन्होंने क़रीब 20 हजार फुट चढ़ाई की, एक ग्लेशियर को पार किया और फिनिश लाइन तक पहुंचने के लिए 50 मील तक ट्रेलिंग की.

राय ने साल 2014 में रेसिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू किया. अब तक उन्होंने 20 माउंटन रेसों में भाग लिया है और 13 पदक जीत चुकी हैं.

बचपन और माओवादी सेना

मीरा की कहानी नेपाल की पहली महिला राष्ट्रपति बनने वाली बिद्या देवी भंडारी की कहानी से कम प्रेरणादायक नहीं है. वो आठवीं की परीक्षा में फेल हो गयी तो स्कूल की पढ़ायी छूट गयी. वो थोड़ पैसे कमाने के लिए पहाड़ पर चावल की बोरियां ढोने का काम करने लगीं.

उनका गांव नेपाल के कोशी इलाके के भोजपुर जिले में है. मीरा कहती हैं, "मैं हमेशा से एथलीट टाइप थी."

वो कहती हैं, "मुझे पानी के लिए पहाड़ से काफी नीचे जाना पड़ता था. मुझे लगता था कि मैं अपने गांव के ज्यादातर लड़के-लड़कियों से ज्यादा तेजी से पानी लाती हूं."

लगातार चावल की बोरियां ढोकर बाजार तक ले जाने के काम ने उन्हें काफी सख्त बना दिया. उन्हें पड़ोस के बच्चों के संग दौड़ लगाने और जीतने में मजा आता था.

माओवादी सेना में भर्ती होने के बारे में वो कहती हैं,"माओवादी सेना के भर्ती करने वाले मेरे गांव आये थे. वो किशोर-किशोरियों को भर्ती कर रहे थे. उन्होंने पैसा और बेहतर रोजीरोटी का वादा किया....तो मैंने अपना परिवार और गांव छोड़कर उनमें शामिल हो गयी. तब मेरी उम्र क़रीब 13-14 साल रही होगी."

उस समय मीरा की उम्र भले ही कम रही हो लेकिन वो हमउम्र बच्चों की तुलना में ज्यादा समझदार थीं. वो कहती हैं, "मुझे पता था कि मुझे जीवन में खाना पकाने और साफ-सफाई से ज्यादा करना था. मैं कुछ बनना चाहता थी, मैं कुछ हासिल करना चाहती थी."

उनके पास तब ज्यादा विकल्प नहीं थे. माओवादी एक विकल्प बनकर आये. उन्होंने 'तीन वक्त के खाने' और 'शारीरिक प्रशिक्षण देने' का भी वादा किया था.

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मीरा किसी राजनीतिक विचारधारा के बजाय अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के दबाव में माओवादी सेना में भर्ती हुई थीं. सेना में भर्ती होने के बाद क़रीब दो साल तक दुर्गम पहाड़ों में उनके सघन प्रशिक्षण दिया गया.

वो कहती हैं, "मैंने वहां बहुत कुछ सीखा. हमने वहां लगातार प्रशिक्षण लेते थे, राइफल लेकर दौड़ते थे. मैंने वहां राइफल समेत तमाम दूसरी तरह की बंदूकें चलाना सीखा."

माओवादियों ने राय को केवल सैन्य प्रशिक्षण नहीं दिया. वो कहती हैं, "मैंने वहां लिखना-पढ़ना भी सीखा. हम एक दूसरे के लिए खाना भी बनाते थे. हमने वहां घर बनाना सीखा."

खेल-कूद और दौड़ प्रशिक्षण का जरूरी हिस्सा थे जिसमें मीरा को बहुत मजा आता था.

वो बताती हैं, "हम फ़ुटबॉल और वॉलीबाल खेलते थे. खूब दौड़ लगाते थे. मुझे दो हजार रुपये भी मिलते थे जो मैं घर भेज देती थी. उस पैसे की वजह से मेरा भाई स्कूल जाने लगा."

21 नवंबर, 2006 को नेपाल सरकार और माओवादियों के बीच शांति समझौता हुआ जिससे दोनों के बीच 10 साल लंबे संघर्ष का अंत हुआ.

इस समझौता मीरा के जीवन में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ. वो कहती हैं, "जब लड़ाई ख़त्म हुई तो बहुत से पूर्व-माओवादी सेना में भर्ती हो गये. मेरी उम्र कम थी इसलिए मुझे नहीं लिया गया और घर वापस भेज दिया गया."

मुश्किलों से होड़

मीरा ने मार्च, 2014 में पहली बार पेशेवर दौड़ में हिस्सा लिया. नेपाल की राजधानी काठमांडु में रहने वाले ब्रितानी नागरिक रिचर्ड बुल की संस्था 'ट्रेल रनिंग नेपाल' (टीआरएन)ने दौड़ का आयोजन किया था.

हिमालयन आउटडोर फेस्टिवल के दौरान हुई 50 किलोमीटर(31 मील) की इस दौड़ में मीरा के प्रदर्शन से बुल काफी प्रभावित हुए. उन्होंने मीरा की मदद के लिए क्राउडफंडिंग से पैसा जुटाना शुरू किया.

बुल कहते हैं, "मीरा को खुश रहना आता है, वो हर नये मौके का दिल से स्वागत करती है चाहे वो कोई नई दौड़ हो या किसी से मिलना हो या किसी से कुछ सीखना हो."

मुश्किल हालात से लड़ने की उनमें गजब की जिजीविषा है. बुल कहते हैं, "जरा सोचिए, अगर आपको किसी दूसरे देश ही नहीं बल्कि दूसरे महाद्वीप में पहुंचने के अगले ही दिन एक रेस में भाग लेना हो तो आप क्या करेंगे? जबकि आपके शरीर को पूरा आराम भी न मिला हो."

जब मीरा के सामने ऑस्ट्रेलिया स्काई रनिंग रेस में ऐसे स्थिति आयी तो उन्होंने लेग जैम(पैर की जकड़न) के बावजूद उसमें हिस्सा लिया और तीसरा स्थान प्राप्त किया.

बुल मुस्कराते हुए कहते हैं, "अमरीकी हैप्पिनेस गुरु जिन गुणों के बारे में बात करते हैं वो उनमें जन्मजात हैं. उन्हें यहां आकर मीरा का अध्ययन करना चाहिए."

नया जीवन

मीरा की अब तक की सबसे यादगार जीत मॉन्ट ब्लांक में मिली है लेकिन इटली में हुई दौड़ में दूसरे स्थान पर आना भी उनके लिए खास है. वो ट्रेल रनिंग की जानी मानी खिलाड़ी स्वीडेन की एमिली फ़ोर्सबोर्ग से महज चार मिनट पीछे रही थीं. जबकि एमिली करीब छह साल से पेशेवर धावक हैं.

मीरा कहती हैं, "मैंने 1000 यूरो जीते थे. मैंने पूरे जीवन में इतना पैसा नहीं देखा था."

साल 2014 में नेपाल की राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय करीब 660 यूरो थी. वो कहती हैं, "जीवन में पहली बार मेरा परिवार आर्थिक चिंता से मुक्त हुआ."

पहाड़ों से फिल्मों तक का सफर

हॉन्गकॉन्ग में रहने वाले एथलीट और फ़ोटोग्राफ़र लॉयड बेल्चर मीरा की कहानी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके जीवन पर एक डाक्युमेंट्री फ़िल्म बनायी है. ये फ़िल्म दिसंबर में रिलीज होने वाली है.

मीरा कहती हैं, "मैं मेरे जीवन पर फ़िल्म बनाने के लिए उनका आभार व्यक्त करती हूँ...अगर मुश्किल हालात के बावजूद मैं कुछ कर सकी तो दूसरे भी ऐसा कर सकते हैं."

First published: 13 November 2015, 2:17 IST
 
असद अली

संवाददाता, कैच न्यूज़

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