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बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी: कई मायनों में एक यादगार टेस्ट सीरीज

जी राजारमन | Updated on: 30 March 2017, 8:54 IST


भारत-ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज के बारे में एक ही बात कही जा सकती है अगर आप अपने अतीत से अच्छी तरह वाकिफ हैं तो किसी भी तरह के दिखावे और शोरगुल से खुद को आसानी से दूर रख पाएंगे. वाकई में भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के लिए खेली गई चार क्रिकेट टैस्ट मैचों की श्रृंखला काफी दिलचस्प रही. दोनों टीमों के बीच मुकाबला शानदार रहा. मगर हम जमीन पर ही रहें तो ठीक होगा.

कुछ लोगों ने इसे दोनों देशों के बीच सर्वाधिक कड़ी प्रतिस्पर्द्धा वाली सीरीज बताया है लेकिन वे यह भूल गए कि 2001 में मुंबई में भारत पहला ही मैच हार गया था और उसे ईडन गार्डन पर फॉलो ऑन बचाने के लिए खेलना पड़ा था. इसमें वीवीएस लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ ने बेहतरीन साझेदारी की इबारत लिखी और हरभजन की गेंदबाजी की बदौलत भारत ने जीत हासिल की. चेन्नई में भारत दो विकेट से मैच जीता.

ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों को रहा फायदा


हाल ही खत्म हुई क्रिकेट सीरीज के सुर्खियां बटोरने की एक खास वजह कंगारुओं का अपनी रेंज से अधिक शानदार प्रदर्शन रहा. स्टीव स्मिथ की टीम ने पूरी सीरीज में चारों टैस्ट मैचों में दिलेरी से भारतीय टीम का मुकाबला किया. इससे पहले चार बार भारत आई ऑस्ट्रेलियाई टीम कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई. इस लिहाज से हालिया सीरीज दोनों देशों के बीच काफी अच्छी रही.


स्मिथ और मैट रेनशॉ को छोड़ कर ऑस्ट्रेलियाई बैट्समैन कोई खास कमाल नहीं दिखा पाए. ऑफ स्पिनर नाथन लॉयड ने काफी लचर बॉलिंग की लेकिन ऑफ बाएं हाथ के स्पिन गेंदबाज ओ’ कीफी ने गेंदबाजी को ऐसी फिरकी दी कि उसके बाद सारे ऑस्ट्रेलियाई बॉलर शानदार गेंदबाजी करते नजर आए. ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजी का इससे बेहतर प्रदर्शन हम पहले देख चुके हैं.

भारतीय टीम के बारे में बात करने से पहले एक नजर डालते हैं चार टेस्ट मैचों पर. शुरूआत में पुणे टैस्ट के दौरान भारतीय टीम ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों से हैरान थी तो धरमशाला में हुए आखिरी मैच में पिच पर बाउंस उपमहाद्वीपीय स्तर का नहीं था.


इस सीरीज में दो बेहद कड़े मुकाबले वाले मैच रहे. बेंगलुरु मैच, जहां भारत ने पहली पारी में केवल 85 ही रन बनाए और किसी तरह से 76 रन की बढ़त बनाते हुए यह मैच जीत पाए. उसके बाद रांची में मैच के अंतिम दिन ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों और शॉन मार्श और पीटर हैंड्सकॉम्ब ने भारतीय टीम के जीत के मंसूबों पर पानी फेर दिया.

 

पुजारा उभरे उम्मीद की किरण बन कर

 


हालांकि स्किपर विराट कोहली के खास येगदान के बिना भारतीय बल्लेबाजों को काफी मशक्कत करनी पड़ी,परन्तु वे सीरीज जीतने में कामयाब रहे, यही बड़ी बात है. इससे टीम के आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी हुई है कि वे अपने कप्तान के फॉर्म में न होने के बावजूद टैस्ट सीरीज जीत सकते हैं. इससे पहले के टैसट मैचों में विराट दोहरे शतक तक मार चुके हैं.

 

इस बार चेतेश्वर पुजारा भारत के लिए उम्मीद की किरण बन कर उभरे. पहले, बेंगलुरू टैस्ट में अजिंक्य रहाणे के साथ सधी हुई साझेदारी करते हुए बेंगलुरू टैस्ट मैच अपने पक्ष में किया और फिर रांची में दोहरा शतक लगा कर मैच भारत के नाम किया. उनके अलावा के.एल. राहुल ने 7 पारियों में छह अर्द्ध शतक लगाए. हालांकि अभी उन्हें अपना बेहतर प्रदर्शन दिखाना है.


रहाणे और रिद्धिमान साहा को हालांकि बहुत अधिक भरोसेमंद बल्लेबाज नहीं माना जाता लेकिन उनका योगदान भी सराहनीय रहा. अंतिम दो पारियों में रवींद्र जडेजा ने अर्द्ध शतक बनाए. धरमशाला में शुरुआत में ही तय हो गया था कि भारत यह सीरीज अपने नाम कर लेगा.

 

गेंदबाजों का खास योगदान

 पुणे मैच के बाद भारतीय गेंदबाजों ने भी खूब रंग दिखाया. पुणे मैच में मेहमान टीम को किसी भी पारी में 300 से ज्यादा रन नहीं बनाने देने के बावजूद मेजबान टीम 333 रन से हार गई. बल्लेबाजी की कुछ खामियों को छिपाने के लिए भी गेंदबाजों ने आक्रामक रुख अपनाया. मोहम्मद शमी को दरकिनार करना उल्लेखनीय रहा.   ऑफ स्पिनर आर. अश्विन और बाएं हाथ के गेंदबाज इस रणनीति के नायक रहे और अपने घर में सीरीज का अंत ऐसा ही होना चाहिए था. उमेश यादव ने जहां सधी हुई गेंदबाजी करके सबका दिल जीत लिया, वहीं युवा गेंदबाज कुलदीप यादव ने  बाईं कलाई की स्पिन गेंदबाजी करते हुए अंतिम मैच में अपनी गेंदबाजी की छाप छोड़ी.   

खामियां


इस टेस्ट सीरीज की सबसे बड़ी खामी यह रही कि पुणे, रांची और धरमशाला के नए खेल वेन्यू पर उम्मीद से काफी कम दर्शक आए. इससे टैस्ट क्रिकेट के नए दर्शक मिलने की आस में बनाए गए इन नए वेन्यू का मकसद विफल रहा. कुछ बेहद खराब शब्दों जैसे कि ‘ब्रेन-फेड’(अक्ल का अंधा) और ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों ने निर्णय समीक्षा प्रणाली यानी डीआरएस का मतलब ड्रैसिंग रूम समीक्षा प्रणाली कर दिया; ऐसी बातों ने सीरीज का मजा किरकिरा कर दिया. इससे लोगों का ध्यान असली क्रिकेट से हट गया.


पुराने खिलाड़ी तो जैसे यह जानते ही नहीं थे कि वे इस सीरीज का हिस्सा नहीं हैं. सबसे बुरी बात तो यह रही कि दोनों देशों की आधिकारिक वेबसाइट और ब्रॉडकास्टर सीरीज के इस अंधियारे पक्ष के बारें में लगातार खबरें चलाते रहे. इस संबंध में किसी तरह की सीमा का ध्यान नहीं रखा गया. इस लिहाज से भी यह सीरीज याद की जाएगी.

 

साथ-साथ हैं

ऐसी बातों से हालांकि क्रिकेट पर बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता. चाहे ब्रेन फेड कहें या किसी और तरह की आपसी स्लेजिंग हो. भारतीय टीम ने अपने इरादे साफ रखे. भारतीय टीम हर मोर्चें पर जवाब देने को तत्पर दिखी. जब विराट कोहली और कोच कुंबले कभी मुड़ कर इस सीरीज पर गौर करेंगे तो इस बात पर खुश होंगे कि भारतीय खिलाडि़यों ने क्रिकेट का खूब आनंद लिया. बेंगलुरु टैस्ट मैच में चमत्कारिक जीत के बाद कोहली ने कहा था ‘‘ जीत में भी हमारी साझी जिम्मेदारी है तो हार में भी.’’

 

First published: 30 March 2017, 8:54 IST
 
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