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ओलंपिक खेलों का आयोजन आयोजक देश के लिए घाटे का सौदा है

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 18 August 2016, 14:52 IST

ओलंपिक सिर्फ रिकॉर्ड तोड़ने, पदक जीतने और ग्लैमरस खेल सितारों के बारे में बात करने के लिए नही हैं. यह एक व्यापार भी है और अर्थव्यवस्था पर भी इसका बड़ा असर पड़ता है. ओलंपिक का आयोजन करने वाले देश मुनाफे के लिए अरबों रुपये बुनियादी ढांचे पर खर्च करते हैं जिससे उनकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिले. 

खेल खत्म होने के बाद अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है? हानि होती है या कुछ ठोस वित्तीय मुनाफा होता है? इन प्रश्नों के जवाब जरूरी हैं, विशेष तौर पर जब ब्राजील की अर्थव्यवस्था नकारात्मक वृद्धि, बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी के संकट से जूझ रही है.

यहां ओलंपिक और अर्थव्यवस्था से जुड़े कुछ तथ्य पेश हैं:

67

फीसदी

  • शेयर 2000 से 2020 के बीच मेजबान देशों के हैं जो विकसित हैं. 
  • बाकी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं.
  • हालांकि, इस अवधि के दौरान 49 फीसदी विकसित और 44 फीसदी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं ने ओलंपिक आयोजन के लिए बोली लगाई. 
  • यह साफ है कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने मेजबान देश के तौर पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन किया. क्या आर्थिक ताकत की वजह से ऐसा हुआ?

78,300

करोड़ रुपये

  • लंदन ओलंपिक के आयोजन में खर्च हुए.
  • 2005 में जब लंदन ने बोली में जीत हासिल की थी तब प्रस्तावित खर्च 20,880 करोड़ रुपये था.
  • उल्लेखनीय है कि 1968 से 2012 के बीच सभी ओलंपिक खेलों के प्रस्तावित खर्च में 150 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई है. सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी मांट्रियल (1976) और साराजेवो (1984) ओलंपिक में हुई.

3,01,500

करोड़ रुपये

  • बीजिंग ओलंपिक के आयोजन में खर्च हुए थे.
  • 1988-2016 के बीच हुए ओलंपिक आयोजनों में बीजिंग ओलंपिक सबसे खर्चीला रहा. इसमें खेलों और सामान्य बुनियादी ढांचे की कीमत भी शामिल हैं.
  • ओलंपिक आयोजित करने वाले देशों को पर्यटन, स्पांसरशिप, टिकट ब्रिकी, लाइसेंस और मीडिया रेवेन्यू से आय होती है.
  • आय का आधा हिस्सा टेलिविजन प्रसारण अधिकारों से आता है. हालांकि, इसमें आईओसी भी अपना हिस्सा लेती है. टेलिविजन प्रसारण अधिकारों में आईओसी 30 फीसदी तक लेती है.
  • सिर्फ टिकट, घरेलू स्पांसरशिप और लाइसेंस के अधिकारों से होने वाली आय में मेजबान देशों का पूरा हिस्सा होता है.

30

साल

  • चीन को अपने नेशनल स्टेडियम (बर्ड्स नेस्ट) के निर्माण की लागत वसूलने में लगेगा. बीजिंग ओलंपिक के दौरान चीन ने 91 हजार दर्शकों की क्षमता वाला स्टेडियम बनाया था जिसे बर्ड्स नेस्ट के नाम से जाना जाता है. सिटी लैब के अनुमान के अनुसार इसमें निर्माण में करीब 3000 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे. 
  • नेटईज़ मीडिया ग्रुप के चीफ स्पोर्ट्स एडिटर यान क्वैंग के अनुसार ओलंपिक स्थलों के निर्माण के लिए लागत पर्याप्त था. लेकिन आयोजक ओलंपिक खत्म होने के बाद आयोजन स्थलों का उपयोग करने में विफल रहे.
  • 1976 में हुए मांट्रियल ओलंपिक में कनाडा को भारी नुकसान उठाना उड़ा. यहां प्रति व्यक्ति 46,900 रुपये घाटा हुआ और नुकसान के भरपाई के लिए तंबाकू पदार्थों पर अलग से टैक्स लगाया गया.

33500-40200

करोड़ रुपये

  • अटलांटिक की रिपोर्ट के अनुसार हर बार ओलंपिक आयोजनों से होने वाला लाभ है.
  • इसमें से आधा हिस्सा आईओसी को मिलता है.
  • आयोजन पर होने वाला खर्च तकरीबन आय से दोगुना होता है.
  • एक रिसर्च के अनुसार ओलंपिक का आयोजन करना एक खराब सौदा है. इसके तीन कारण हैं. बोली प्रक्रिया को निजी हितों ने हाईजैक कर लिया है. (2024 ओलंपिक के लिए बोस्टन की असफल बोली). बड़े पैमाने पर निर्माण (उदाहरण के लिए चीन का बर्ड्स नेस्ट और एथेंस के आयोजन स्थल). ओलंपिक के दौरान पर्यटन में थोड़ी सी ही बढ़ोत्तरी होती है. (अटलांटा, बीजिंग और लंदन में अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या में गिरावट दर्ज हुई).
  • हालांकि, बार्सिलोना अपवाद है, यहां 1992 के बाद पर्यटन में बढ़ोत्तरी हुई है.
  • रिसर्च के अनुसार जहां ओलंपिक होते हैं वहां कुछ समय से लिए निर्यात, निवेश और रोजगार में तेजी आती है. मुनाफे के लिहाज से लांस एंजिल्स (1984) और बार्सिलोना (1992) ओलंपिक सफल रहे हैं.

ओलंपिक का वैश्विक नेताओं के लिए गर्व का विषय होता है. लेकिन ज्यादातर आयोजनों में इससे अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है और लागत वसूलने में लंबा वक्त लगता है. आर्थिक मामलों में समझदारी दिखाते हुए पिछले कुछ समय में बोस्टन, हैम्बर्ग, म्यूनिख, ओस्लो और स्टॉकहोम जैसे देश अपनी बोली वापस ले चुके हैं.

First published: 18 August 2016, 14:52 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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