Home » खेल » Sakshi Malik speaks to Catch about newfound fame, women in Haryana and that Shobha De tweet
 

नई-नई शोहरत और हरियाणा की महिलाओं की स्थिति के बारे में क्या सोचती हैं साक्षी मलिक?

प्रियता ब्रजबासी | Updated on: 2 September 2016, 19:00 IST

ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता पहलवान साक्षी मलिक के बड़े-बड़े पोस्टर जिन पर लिखा है- ‘राष्ट्र का गौरव साक्षी मलिक’ और ‘‘रोहतक की अपनी ओलंपिक पदक विजेता को बधाइयां’, इन दिनों रोहतक की सड़कों पर इस तरह से लगाए गए हैं कि लगता है हर सड़क रोहतक, हरियाणा में साक्षी के घर की ओर मुड़ती है. शनिवार 27 अगस्त को साक्षी के घर पर जश्न का माहौल था. साक्षी तीन दिन पहले ही रियो से नई दिल्ली पहुंची थी; उस वक्त रोहतक में सुबह 11 बजे उनके घर के बाहर शांति थी, लेकिन घर ऐसे सजा हुआ था, जैसे यहां कोई शादी होने वाली हो.

उनके घर के अंदर की कहानी कुछ अलग थी. अलग-अलग कमरों से लोगों के बोलने की आवाजें आ रही थी. साक्षी के रिश्तेदार और पड़ोसी घर के अलग-अलग कोनों में बैठे थे. रसोई में चाय पर चाय बनाई जा रही थी और हर पांच मिनट में लोगों को परोसी जा रही थी.

एक ओर ढेर सारे बुके और मिठाइयों के पैक डिब्बों का अंबार लगा था. घर में चारों ओर तिरंगे गुब्बारे लगे थे; इनमें से कुछ तो फुस्स हो चुके थे. दीवार पर साक्षी के बचपन व किशोरावस्था के फोटो लगे थे, जिसमें वे राष्ट्रीय स्तरीय पहलवानी प्रतियोगिताएं जीतने के बाद पुरस्कार लेती दिखाई दे रही हैं.

साक्षी मलिक बैठक में अपने माता-पिता, कोच और अधीर पत्रकारों के बीच बैठी कुछ नर्वस दिखाई दे रही थी. आंखों में मासूमियत लिए साक्षी इस माहौल में पूरी तरह सहज महसूस नहीं कर रही थी. मेहमानों के साथ सेल्फी खिंचवाती साक्षी, सवालों के जवाब देते रिश्तेदारों से मिलते हुए परेशान हो गईं.

साक्षी मलिक बैठक में अपने माता-पिता, कोच और अधीर पत्रकारों के बीच बैठी कुछ नर्वस दिखाई दे रही थी

कई पुरूष पत्रकारों को इंटरव्यू देने के बाद वे उस समय थोड़ा सहज हुई जब वह सोफे पर मेरे पास आकर बैठी. उन्होंने ऑफ द रिकॉर्ड कहा ‘जब से मैं भारत आई हूं केवल इंटरव्यू ही दे रही हूं. उम्मीद है आप ज्यादा बड़ा इंटरव्यू नहीं लेंगी. मेरे स्पॉन्सर मुझसे मिलने के लिए इंतजार कर रहे हैं.’

सबसे विचित्र बात यह कि साक्षी कैमरे के सामने बिल्कुल सहज नहीं थी. वह बार-बार मेरी तरफ देख कर पूछती अब मैं कहां देखूं, मैं व्यक्तिगत तौर पर काफी शर्मीली हूं.’ लग ही नहीं रहा था, यह वही साक्षी हैं, जिन्हें हमने रियो में रिंग में देखा था.

साक्षी चूंकि भारत की पहली महिला पहलवान हैं, जिन्होंने ओलम्पिक पदक जीता, फिर भी राष्ट्र उनके बारे में बहुत ही कम जानता है. रियो में दमदार प्रदर्शन के बाद साक्षी देश में रातों रात स्टार बन गईं. पोडियम पर साक्षी को देखना देश के लिए अविस्मरणीय पल बन गया.

उन्होंने बताया, ‘जब मैं कांस्य पदक के लिए मैच खेल रही थी, मैं बता नहीं सकती मेरे ऊपर कितना दबाव था. मैं पांच पॉइंट से पीछे चल रही थी. मुझे पता था कि भारत ने अब तक कोई मेडल नहीं जीता है. मैं अपने लिए तो जीतना चाहती ही थी पर भारत के लिए और भी ज्यादा. जब मैं शुरू में थोड़ा पीछे चल रही थी, मैंने खुद से कहा चाहे जो हो, यह मेडल तो जीतना ही है, और मैंने कर दिखाया.’ साक्षी किर्गिस्तान की आईसेलु तिनिबेकोवा से कांस्य के लिए लड़ीं.

हमने कहा, जब तुम जीती तो हमारे रोंगटे खड़े हो गए, उन्होेंने तुरंत जवाब दिया- मेरे भी. साक्षी को राष्ट्रपति ने 29 अगस्त को खेल रत्न पुरस्कार से नवाजा. उन्हें हरियाणा के मुख्यमंत्री द्वारा चलाए जा रहे अभियान ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का ब्रांड एम्बैसडर बनाया गया. एक युवा खिलाड़ी के लिए यह बहुत बड़ा दबाव है. ‘हां बहुत अधिक दबाव है. लेकिन साथ ही यह मेरे लिए बड़ा अवसर भी है, वंचित लड़कियों की मदद करने का और मैं निश्चित रूप से कुछ अच्छा करूंगी.’

बहुत अधिक दबाव है. लेकिन साथ ही यह मेरे लिए बड़ा अवसर भी है, वंचित लड़कियों की मदद करने का

साक्षी ने यह कुछ अच्छा करने की शुरुआत भी कर दी है. अपनी निजी सफलता से वे भारत में अपने खेल के विकास के लिए कुछ अच्छा करना चाहती हैं. वे कुश्ती के लिए भारत में आधारभूत ढांचा सुधारने के लिए स्वयं को मिले नकद ईनाम और उपहार के बारे में कहती हैं, 'मुझे बहुत सा पैसा और उपहार मिल रहे हैं, मैं इससे खुश हूं, पर ज्यादा खुशी होती अगर इसमें से कुछ अंश कुश्ती के विकास पर खर्च किया जाता. पूर्व में भी कुश्ती ने भारत को कई पदक दिलवाए हैं, इसके बावजूद कुश्ती का हाल बेहाल हैं.’

18 अगस्त तक साक्षी के ट्विटर पेज पर ज्यादा फॉलोवर नहीं थे. लेकिन कांस्य पदक जीतने के दो हफ्ते के भीतर ही उनके फॉलोवर्स की संख्या 73,000 तक पहुंच गई.

हालांकि वो अपनी रियो की तैयारियों में व्यस्त थीं लेकिन फिर भी शोभा डे का ट्वीट उनसे अनदेखा नहीं रहा, जिसमें शोभा ने लिखा था कि भारतीय एथलीट रियो में सिर्फ सेल्फी लेने के लिए गए हैं.

मेडल जीतने के बाद उन्होंने शोभा को टका सा जवाब दिया, ‘मुझे लगता है कि मेरा मेडल ही शोभा डे को दिया जाने वाला सबसे अच्छा जवाब है. उनकी टिप्पणी गैरजरूरी थी.’

साक्षी ने साथ में हरियाणा के पितृ सत्तात्मक समाज, खासतौर पर हरियाणा के बारे में बात करते हुए काफी कुछ कहा, उनसे बातचीत में लगता है कि राज्य में महिला मामलों पर उनकी समझ, उनकी उम्र से कहीं अधिक है. वे कहती हैं, ‘मैं खुशकिस्मत हूं जो मेरे माता-पिता ने लड़की होने के कारण मेरे साथ भेदभाव नहीं किया. मुझे बचपन से खेलों का शौक था और मैंने कुश्ती को चुना. हां,  लोगों ने बातें बनाईं. मेरे माता-पिता से मुझे कुश्ती खेलने देने के लिए सवाल उठाए. लेकिन मेरे अभिभावकों और भाइयों ने इस बात की परवाह नहीं की. मैं खुशकिस्मत थी.’

हालांकि साक्षी कहती हैं भेदभाव तो होता है, ‘मैंने अपने समुदाय की ही कई औरतों को देखा है, जिन्हें अपने सपने पूरे करने की इजाजत नहीं दी जाती. जो लोग मेरे परिवार को मेरे कुश्ती खेलने के लिए हतोत्साहित करते थे, आज मुझे बधाईयां देने आ रहे हैं. नाम और शोहरत मिलने के बाद लोगों का नजरिया मेरे प्रति बदल गया है.'

नाम और शोहरत मिलना आसान नहीं है और साक्षी भी इसका अपवाद नहीं है. अपनी नई-नई लोकप्रियता को संभाल पाना उनके लिए आसान नहीं है. मासूम मुस्कान के साथ वे कहती हैं, ‘ये वाकई मुश्किल है, लेकिन मैं सीख रही हूं.’

इसी मासूमियत और जीत के जज्बे ने करोड़ों देशवासियों का दिल जीत लिया.

First published: 2 September 2016, 19:00 IST
 
प्रियता ब्रजबासी @PriyataB

Priyata thinks in words and delivers in pictures. The marriage of the two, she believes, is of utmost importance. Priyata joined the Catch team after working at Barcroft Media as a picture desk editor. Prior to that she was on the Output Desk of NDTV 24X7. At work Priyata is all about the news. Outside of it, she can't stay far enough. She immerses herself in stories through films, books and television shows. Oh, and she can eat. Like really.

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