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अनुराग ठाकुर बर्खास्त: यह मौका खेलों की दुनिया में सफ़ाई का ऐतिहासिक मौका बनना चाहिए

जी राजारमन | Updated on: 3 January 2017, 7:45 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

इंडिया गेट पर किसी मंत्री या प्रधानमंत्री के खिलाफ मोमबत्ती जलाकर विरोध प्रदर्शन किया जा सकता है. जंतर-मंतर पर धरना देकर नौकरशाही के भी खिलाफ हंगामा खड़ा किया जा सकता है. लेकिन अगर आप न्यायपालिका के किसी आदेश को नहीं मानते हैं तो आप मुसीबत को दावत दे रहे हैं. सोमवार को बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के के साथ ठीक यही हुआ.

सुप्रीम कोर्ट की तरफ से अनुमोदित लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों के क्रियान्वयन के लिए बीसीसीआई को अधिकतम संभव समय देने के बाद सोमवार को कोर्ट ने इसके उन दो शीर्ष अधिकारियों को हटा दिया जो उसके आदेशों की अनदेखी और अवहेलना पर उतारू थे. उनकी इस सीनाजोरी की वजह से दोनों को अपने पदों से जाना पड़ा.

ऐसा लगता है कि दोनों को इस बात का अनुमान नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट इतना सख्त रवैया अपना सकता है, विशेषकर तब जबकि बीसीसीआई ने लोढ़ा कमेटी की अधिकांश सिफारिशों को मानने के लिए रजामंदी दे दी थी. अनुराग ठाकुर और अजय शिर्के को उनकी सुधार की धीमी घिसटती चाल और राज्य की ऐसोसिएशनों से कोर्ट के आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित करने में असमर्थता प्रकट करने की कीमत चुकानी पड़ी.

कार्रवाई के लिए मजबूर हुआ SC

हालात इस कदर नहीं बिगड़ते अगर बीसीसीआई ने लोढ़ा समिति द्वारा सुझाए कुछ मुख्य सुधारों की पालना करने में आनाकानी नहीं की होती. ये सुझाव थे एक राज्य-एक वोट, उम्र और पदावधि संबंधी प्रतिबंध और समझौता लागू करने के लिए न्यूनतम समय सीमा. जबकि बीसीसीआई लगातार यह तर्क देती रही कि अध्यक्ष और सचिव के पास फैसले लेने की कोई शक्ति नहीं है वे तो सिर्फ बोर्ड के सदस्यों के आदेशानुसार ही काम करते हैं.

कुछ लोगों ने एक पंजीकृत सोसायटी की तरह बोर्ड की स्वायत्ता के मुद्दे को उठाने की कोशिश भी की, लेकिन यह पूरी तरह से स्पष्ट था कि सुप्रीम कोर्ट बीसीसीआई को राज्य के काम करने वाले संगठन की तरह मानकर उसे राज्य के ही एक अंग की तरह देख रही थी. सिर्फ यही नहीं, अंतिम समय तक बीसीसीआई ने अपना रवैया नहीं बदला और कोर्ट को मजबूर किया कि वह सख्ती करने को मजबूर हो जाए.

बोर्ड को बेहतर ट्रीटमेंट मिल सकता था अगर वह कोर्ट के सभी सुझावों की पालना करता और इसके बाद कोर्ट की अनुमति से कुछ सुधारों को वापस लेने या फिर सरकार से आग्रह करता कि एक कानून पारित किया जाए जिससे उसे वैधता मिले और इस तरह वह सत्ता के गलियारों में बनी रहती. लेकिन बीसीसीआई ने शुरू से ही जो अड़ियल रवैया अपनाया उसके कारण उसने खुद को एक कोने में घिरा हुआ पाया, जहां से वह कोर्ट की दया पर ही बाहर निकल सकता था.

चुनौती बड़ी

इसके बाद अब प्रशासकों की जो समिति नियुक्त की जाएगी उस पर यह बड़ी जिम्मेदारी होगी कि देश में क्रिकेट प्रशासन में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की पहल करते हुए उनको क्रियान्वित भी करे. ऐसा करते हुए उसे सबसे पहले लोढ़ा समिति की अनुशंसाओं के मायने समझना होगा और इसके बाद उनको देश और प्रदेश स्तर पर क्रियान्वयन के चुनौतीपूर्ण कार्य को अंजाम देना होगा.

यह देखते हुए कि अधिकांश प्रदेशों में राज्य इकाईयां वर्षों से जमे हुए अधिकारियों द्वारा चलाई जा रही हैं, इनमें कुछ में तो ऐसी हालत में हैं कि उनमें उत्तराधिकार की तरह पुत्र ने ही पिता का स्थान ले लिया है. इसको देखते हुए यह तो तय है कि प्रशासकों की समिति के लिए यह लक्ष्य बहुत बड़ा और विकट होने वाला है.

एक बार ठहरकर इस बारे में सोचने पर लगता है कि खेल प्रशासन के इतिहास में यह एक सबसे दु:खद दिन के रूप में याद किया जाएगा जबकि देश के सबसे शक्तिशाली और जानेमाने खेल संगठन के दो अधिकारी कोर्ट के द्वारा हटा दिए जाते हैं. यह संभव है कि आज से कुछ समय बाद भविष्य में वर्ष 2017 के दूसरे दिन को एक ऐसे दिन के रूप में याद किया जाए जब इस देश के खेल प्रशासन ने बेहतरी की ओर एक निर्णायक टर्न लिया था.

कार्रवाई में उम्मीद की झलक

जिस तरह से किसी भूकंप का असर उसके एपिसेंटर से कॉफी दूर तक महसूस किया जाता है, उसी तरह से सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का असर देश के दूसरे राष्ट्रीय खेल फेडरेशनों पर पड़ना तय है जो कि नेशनल स्पोर्ट्स कोड तक का विरोध करते आ रहे हैं. उम्मीद है कि यह असर उससे जल्दी ही होगा जितना कि सोचा जा रहा है.

दरअसल, अब यह सिर्फ समय की ही बात है कि जब लोढ़ा समिति की सिफारिशें देश में सभी खेल संगठनों के लिए आदर्श मानक बन जाएंगी. तार्किक रूप से तो लोढ़ा समिति की अनुशंसाएं बीसीसीआई के अलावा उन सभी संगठनों पर लागू होनी चाहिए जो कि राष्ट्रीय टीम का चयन करते हुए दरअसल राज्य की ही भूमिका निभा रहे होते हैं.

बदलाव मजबूरी

यह देखना दिलचस्प होगा कि इस स्थिति में भारत सरकार और देश के अन्य मुख्य राजनीतिक दलों का रवैया क्या होता है. अब तक वे लंबे समय से देखो और इंतजार करो का ऐसा रुख अपनाए हुए थे जिस पर किसी भी टेस्ट क्रिकेटर्स या शतरंज के ग्रॉन्ड मास्टर को गर्व हो सकता था. पर अब उन्हें परिवर्तन के उस पहिए को घुमाने में अपना कंधा लगाना ही होगा जिसे कि भारत की सर्वोच्च अदालत ने चला दिया है.

सरकार ने पहले ही सभी खेल संघों को यह कह रखा है कि अगर उन्हें सरकार से अनुदान चाहिए तो उन्हें नीति आयोग के पोर्टल पर गैर सरकारी संगठन के रूप में अपना पंजीकरण कराना होगा. इससे कुछ राष्ट्रीय खेल संघों में चिंता और भ्रम देखा जा रहा है, जिसे अब एक कानून बना कर दूर किया जा सकता है.

बन सकता है कानून

वास्तव में अब गेंद विधायिका के पाले में आ चुकी है. सांसदों और राज्य की विधानसभा के सदस्यों को अब एक बिल्कुल स्पष्ट कानून बनाना होगा जिसके अंतर्गत सभी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय खेल संघों को अपना पंजीकरण करना होगा, तभी उन्हें देश में खेलों के प्रोत्साहन देने के कार्य की अनुमति दी जाए. अभी तक खेल संगठन या तो सोसायटीज की तरह पंजीकृत हैं या फिर कंपनीज की तरह.

राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का कानून बनने के बाद बीसीसीआई जैसे संगठनों के लिए भी जरूरी हो जाएगा कि वह इसके केंद्रीय अधिनियम, जिसे नेशनल नॉन गवर्नमेंटल स्पोर्ट्स आर्गनाइजेशन एक्ट कहा जा सकता है, के अंतर्गत पंजीकृत कराना होगा. वर्तमान में न तो बीसीसीआई को इसकी आवश्यकता महसूस होती है और न ही युवा और खेल मामलों के मंत्रालय को. यह जरूरी बनाया गया है कि वह राष्ट्रीय खेल संघ के रूप में मान्यता ग्रहण करे.

अब जबकि अधिक से अधिक खेल संगठन दुनिया भर में भारत के फलते-फूलते, कमाऊ और सुरक्षित बाजार को देख रहे हैं, तो भारतीय खेल संगठनों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे प्रशासन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और पारदर्शिता के धरातल पर सर्वश्रेष्ठ मानकों को अपनाएं और उन पर खरा उतरें. इससे उन्हें दुनिया के सबसे अधिक प्रतिस्पर्धात्मक खेलों में बेहतर सफलता हासिल करने में मदद मिलेगी. लेकिन इसके लिए समाज के हर हिस्से से सामूहिक प्रयास और उसकी राय की भी जरूरत होगी.

First published: 3 January 2017, 7:45 IST
 
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