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रूढ़ियों को तोड़ती अमेरिकी तलवारबाज इब्तिहाज मोहम्मद

कैच ब्यूरो | Updated on: 25 February 2016, 0:02 IST
QUICK PILL
  • पहली बार ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में टीम अमेरिका की तरफ से एक खिलाड़ी हिजाब पहनकर मार्च में शामिल होगी. न्यूजर्सी की रहने वाली इस महिला तलवारबाज (फेंसर) खिलाड़ी का नाम इब्तिहाज मोहम्मद है.
  • इब्तिहाज का एक राजनीतिक मत भी है. वे कहती हैं, \"अगर डोनाल्ड ट्रंप जीते तो अमेरिका गोरों का हो जाएगा. और तब यहां कोई दूसरा रंग नहीं होगा, यहां पर कोई विविधता भी नहीं होगी.\" किसी ओलंपिक खिलाड़ी के लिए यह माहौल गर्माने वाली बात है.

रियो डि जनेरियो के माराकाना स्टेडियम में पांच अगस्त से ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेल शुरू होंगे. जहां दुनिया भर के देशों के सर्वश्रेष्ठ 10,500 खिलाड़ी मौजूद रहेंगे. खेलों के महाकुंभ की शुरुआत पारंपरिक सांबा नृत्य जैसे समारोहों के साथ ही ओलंपिक में दिखने वाले आम दृश्य भी दिखेंगे. लेकिन पहली बार इस मौके पर एक चौंकाने वाली बात नजर आएगी. पहली बार टीम अमेरिका की एक महिल खिलाड़ी हिजाब पहनकर मार्च में शामिल होगी. न्यूजर्सी की रहने वाली इस तलवारबाज (फेंसर) खिलाड़ी का नाम इब्तिहाज मोहम्मद है.

अमेरिकी दल में अपवाद नजर आने वाली इब्तिहाज को यह मौका बीते माह यानी जनवरी के अंत में मिला जब उन्होंने एथेंस में आयोजित एक प्रतियोगिता जीती. इसके कुछ दिन बाद अमेरिका की एक मस्जिद में अपनी पहली यात्रा के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इब्तिहाज को उनके नाम से संबोधित किया.

इस सब के बावजूद चर्चा से दूर इब्तिहाज मैनहट्टन स्टारबक्स में अपनी तलवारबाजी के अभ्यास में लगी रहीं. इब्तिहाज कहती हैं, "अगर डोनाल्ड ट्रंप जीते तो अमेरिका गोरों का हो जाएगा. और तब यहां कोई दूसरा रंग नहीं होगा, यहां पर कोई विविधता भी नहीं होगी."

किसी ओलंपिक खिलाड़ी के लिए यह बेहद अजीब बात है. ज्यादातर एथलीट चार सालों में सिर्फ एक बार सुर्खियों में आते हैं और आम तौर पर वे राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं. राजनीति के अपने खतरे हैं. जरा सा भी विवाद किसी खिलाड़ा का करियर बर्बाद कर सकता है, प्रशंसक इनसे दूरी बना सकते हैं, कॉरपोरेट स्पॉन्सर्स हाथ खींच सकते हैं.

लेकिन मुसलमानों का अमेरिका में अस्थायी रूप से प्रवेश रोकने की बात करने वाले रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार डनल्ड ट्रंप की मजबूती को इब्तिहाज नजरअंदाज नहीं कर पा रही हैं.

यह वास्तविकता है कि उनके चेहरे को ढंकने वाला हिजाब उनके विश्वास की व्यक्तिगत धारणा को पुख्ता करता है

इब्तिहाज कहती हैं, "इस तरह के घृणित भाषण और बयानबाजी करने वाले लोग इसके नतीजों और उनका मुसलमानों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में नहीं सोचते हैं. विशेषरूप से मुसलमान महिलाएं जो अपने मजहब को हर दिन पहनती हैं वे सोचना शुरू कर देती हैं कि क्या मैं सुरक्षित रहूंगी?"

इसके साथ ही इब्तिहाज ने उस गंभीर मुद्दे को हवा दे दी है जो उन्हें टीम अमेरिका की तमाम प्रतिभावान और जुनूनी खिलाड़ियों से अलग बना देता है. यह वास्तविकता है कि उनके चेहरे को ढंकने वाला हिजाब उनके विश्वास की व्यक्तिगत धारणा को पुख्ता करता है. लेकिन इसके साथ ही यह उसके विश्वास को सार्वजनिक रूप से उजागर करने वाला भी है.

ibtihaz muhammad


मुस्लिम पब्लिक अफेयर्स काउंसिल के सदस्य एडिना लेकोविक कहती हैं, "उनके बारे में सुनते ही मैं उछलने लगी और तुरंत ही अपने मित्रों को संदेश भेजने के साथ ही परिजनों को फोन करना शुरू कर दिया. यह वाकई गर्व और खुशी का क्षण है."

न्यूजर्सी, न्यूयॉर्क के मैपलवुड इलाके में रहने वाली इब्तिहाज पांच भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं. उनकी मां डेनिस एक एलीमेंट्री स्कूल में स्पेशल एजुकेशन टीचर हैं और उनके पिता यूजीन नेवार्क में नारकोटिक्स विभाग से सेवानिवृत्त हैं. दोनों ने एक-दूसरे मिलने से पहले ही इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था.

मुझे याद है कि छोटे में जब मैं प्रतियोगिताओं में में जाती थी तो लोग मुझे काला कहते थे, मुझे मुसलमान कहते थे

मां-बाप ने अपने बच्चों को खेलों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया. विशेषरूप से इब्तिहाज का अपने एक साल बड़े भाई से काफी प्रतिस्पर्धा थी. वो कहती हैं, "मैं खेलों में अपनी रुचि पैदा करने का श्रेय अपने भाई को देना चाहती हूं. क्योंकि मैं हमेशा अपने भाई से तेज भागने या उससे ऊंचा कूदने की कोशिश करती रहती थी."

हमारे बीच प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई कि एक बार क़रीब ने यह दिखाने के लिए वह अपनी छोटी बहन से ज्यादा दमदार है छत से स्वीमिंग पूल में छलांग लगा दी. वह अपनी जीत पर काफी खुश होता था. इब्तिहाज कहती हैं, "मैंने अपने बचपन का काफी वक्त रोने में बिताया है."

भाई-बहनों के बीच की स्पर्धा ने उनमें जज्बा पैदा कर दिया और इब्तिहाज ने सॉफ्टबॉल और वॉलीबॉल खेलना शुरू कर दिया. वे ट्रैक पर दौड़ते हुए बड़ी हुई. लेकिन अपने खिलाड़ी साथियों से अलग इब्तिहाज अपनी यूनिफॉर्म के नीचे पैंट और लंबी बाजू की शर्ट पहनने के साथ ही अपने हिजाब को भी मजबूती से बांधे रखती थी.

इब्तिहाज के जीवन में बड़ा बदलाव कब आया. इसके बारे में डेनिस बताती हैं कि एक बार वो एक रेड लाइट पर रुकीं तो देखा कि उनके बगल वाली कार में स्थानीय कोलंबिया हाईस्कूल के बच्चे बैठे थे जो हाथों में तलवार लिए थे और चेहरे पर मास्क लगाए थे. यह उनके लिए बड़ा बदलाव लाने वाला क्षण बना.

वो घर आईं और फेंसिंग (तलवारबाजी) के बारे में ऑनलाइन जानकारी हासिल की. इसके बाद वो इब्तिहाज (तब वो आठवीं में पढ़ती थीं) को तलवारबाजी का प्रशिक्षण दिलाने के लिए एक कोच के पास ले गईं. उन्हें लगा कि उनकी एथलेटिक बिटिया के लिए यह सबसे मुफीद खेल था. इसमें व्यक्ति का शरीर ढका होता है और एक मास्क के साथ चेहरा भी. इससे हिजाब नहीं दिखाई देता. डेनिस कहती हैं, "यह हमारे लिए बिल्कुल आदर्श था."

हाईस्कूल में तलवारबाजी प्रतियोगिता के दौरान इब्तिहाज इकलौती अफ्रीकी अमेरिकी थीं. वो याद करते हुए कहती हैं, "मुझे याद है कि जब मैं प्रतियोगिताओं में बच्चे के रूप में जाती थी तो लोग मुझे काला कहते थे, मुझे मुसलमान कहते थे. माता-पिता मुझसे पूछते थे कि हिजाब पहनकर तलवारबाजी करना मेरे लिए सही है कि नहीं, कहीं यह दूसरों के लिए खतरा तो नहीं है. एक बच्चे के के लिए यह काफी आघात करने वाला था."

समय बीतता रहा, डेनिस इब्तिहाज को 1984 ओलंपिक में तलवारबाजी में कांस्य पदक विजेता पीटर वेस्टब्रुक के पास ले गईं. पीटर न्यूयॉर्क में एक नॉनप्रॉफिट फेंसिंग क्लब चलाते हैं. इस क्लब का रिकॉर्ड रहा है कि यह सामान्य से तलवारबाज को भी चैंपियन में बदल देता है. यहां के दर्जनों भूतपूर्व तलवारबाज कॉलेज स्तर पर विजेता बनें तो आधे दर्जन ने ओलंपिक में भी क्वालीफाई किया.

जल्द ही इब्तिहाज प्रशिक्षण पाने के लिए नियमितरूप से न्यूयॉर्क आने-जाने लगीं. पीटर ने इब्तिहाज को तलवारबाजी की तीन श्रेणियों में से सबसे बेहतर (सेबर) बना दिया.

मुझे अभी भी विशाल अमेरिका पर विश्वास है कि हम राष्ट्रपति कार्यालय में डोनाल्ड ट्रंप जैसे किसी अज्ञान व्यक्ति को बैठाने के लिए मतदान नहीं करेंगे

इब्तिहाज ने ड्यूक में तलवारबाजी की जहां उसे स्कॉलरशिप भी मिली और वो पूरी तरह अमेरिकी हो गईं. लेकिन 2012 में वो ओलंपिक में क्वालीफाई करने में असफल रहीं. वो अमेरिका की चौथी रैंक वाली सेबर फेंसर बन गईं. इनमें केवल टॉप के दो ही ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर पाए.

इब्तिहाज ने 2013 में आयोजित वर्ल्ड कप इवेंट में रजत पदक पाकर अपना पहला अंतरराष्ट्रीय पदक जीता. इसके बाद से वे लगातार बेहतर प्रदर्शन करती रहीं. इस वक्त वो दुनिया की सातवीं पायदान की सेबर फेंसर हैं.

वाशिंगटन में मुस्लिम विषयों का अध्ययन करने वाले संस्थान इंस्टीट्यूट फॉर सोशल पॉलिसी एंड अंडरस्टैंडिंग की शोध निदेशिका दालिया मोगाहेड कहती हैं, "एक सशक्तीकरण के प्रतीक के रूप में वो बहुत महत्वपूर्ण हैं. मतलब कि आपको जो चाहिए उसके लिए अपने विश्वास या अपने विश्वास को साबित करने के साथ ही आप कुछ भी कर सकते हैं."

उन्होंने हाल ही में इब्तिहाज ने डिक्स स्पोर्टिंग गुड्स के साथ स्पॉन्सरशिप पर हस्ताक्षर किए हैं और दो अन्य फॉर्चून 500 कंपनियों के साथ उनकी बातचीत चल रही है. उन्हें उम्मीद है कि वो मुसलमान लड़कियों को खेलों में भाग लेने के लिए प्रेरित करेंगी और उनके लिए एक रोल मॉडल बनेंगी. 

वो कहती हैं, "पेरिस हमला और सैन बर्नैंडिनो के बाद मुसलमानों को देश भर में विमान से बाहर निकाल दिया जाता है. मैं उन्हीं की तरह थी. मुझे लगता था क्योंकि मैंने किसी को असुरक्षित बना दिया इसलिए क्या मुझे भी उन लोगों की ही तरह विमान से उतरने के लिए कहा जाएगा."

फिलहाल वो राष्ट्रपति चुनाव को लेकर उत्साहित हैं. वो कहती हैं, "मुझे अभी भी इस बड़े देश (अमेरिका) पर विश्वास है. हम राष्ट्रपति कार्यालय में डोनाल्ड ट्रंप जैसे किसी अज्ञान व्यक्ति को बैठाने के लिए मतदान नहीं करेंगे. एक देश के रूप में हम उससे ज्यादा समझदार हैं. ट्रंप उन सभी चीजों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनका अधिसंख्य अमेरिकी नहीं करते हैं."

उस पहली महिला (जो अपने धार्मिक प्रतीकों के साथ खेलों में अमेरिका का प्रतिनिधित्व करेगी) को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका में चिंता है. फेंसिंग स्ट्रिप (तलवारबाजी की पट्टी) में इब्तिहाज का काम आक्रमण करना है. लेकिन इसके बाहर वो केवल बचाव करना चाहती हैं.

वो कहती हैं, "यह धारणा बन गई है कि अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करना और अपने समाज में सफल होना देश की सफलता को चुनौती देना है. और यही मुझे निराश कर रहा है. आपके यहां अल्पसंख्यकों को लंबे वक्त तक दबाया गया, उन्हें एक निर्धारित स्थान तक ही सीमित कर दिया गया, अब वो इन बंदिशों और मानदंडों को तोड़ रहे हैं, यहीं अमेरिका को महान बनाता है."

First published: 25 February 2016, 0:02 IST
 
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