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50 साल बाद भी हमारे ज़हन में मिल्खा सिंह तरोताज़ा क्यों हैं?

कैच ब्यूरो | Updated on: 23 November 2016, 7:46 IST
QUICK PILL
  • भारतीय खेलों के इतिहास में तमाम ऐसी प्रतिभाएं हुईं हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए देश का मान बढ़ाया है. 
  • बावजूद इसके एक समय के बाद लोग उन प्रतिभाओं को भूल जाते हैं मगर उन्हीं लोगों ने आधी सदी से ज़्यादा समय से उड़न सिख मिल्खा सिंह को पलकों पर बिठाकर रखा है. कुछ तो बात है मिल्खा सिंह में जो भारतीय खेलों के इतिहास में किसी और के पास नहीं है.  

20 नवंबर को दिल्ली में एयरटेल की हाफ मैराथन हुई. मंच पर स्पोर्ट की दुनिया की दो बड़ी शख़्सियतें मौजूद थीं. एक थे जमैका के ओलिंपिक पदक विजेता और फर्राटा धावक असाफा पॉवेल और दूसरे मिल्खा सिंह. असाफा पॉवेल वही धावक हैं जिन्होंने 10 सेकेंड की 100 मीटर दौड़ करीब 100 बार जीती है. मालूम नहीं कि मंच पर वो मिल्खा सिंह का सम्मान कर रहे थे या फ़िर मिल्खा सिंह उनका. 

मिल्खा सिंह 1960 के रोम ओलिंपिक की 400 मीटर की दौड़ में चौथे स्थान पर रहे थे. इस बात को 50 साल से भी ज्यादा का वक़्त हो गया है, फिर भी व भारतीय एथलीट के सितारों में सबसे ऊपर जगह बनाए हुए हैं. खेल के इतिहास में ऐसा कोई नहीं होगा, जिनका क़द साल दर साल इस तरह बढ़ा हो, इसके बावजूद कि ओलिंपिक पदक जीतने का मौका उनके हाथ से छूट गया था.  

दुनिया के सैकड़ों स्वर्ण पदक विजेताओं को लोग भूल गए हैं. सैकड़ों विजेताओं ने समय के साथ अपनी उम्मीदें छोड़ दी हैं लेकिन मिल्खा आधी सदी के बाद भी भारतीयों के ज़ेहन में रचे-बसे हैं. ओलंपिक पदक नहीं जीत पाने के बावजूद.

मिल्खा की विरासत

मिल्खा सिंह के कारनामें फिल्म और किताबों में अमर हैं. हर बड़े खेल इवेंट पर वो मौजूद रहते हैं. उन्होंने अपने हाथों में कई बार ओलिंपिक की टॉर्च थामी है और आज भी उनका नाम उनकी ज़िद और जीत की मिसाल बना हुआ है. 

हार के बावजूद हिन्दुस्तानियों के दिलो-दिमाग़ पर मिल्खा सिंह की छवि एक विजेता की है. उन्हें कोई चुनौती नहीं दे सका है. ऐसा कोई नहीं है, जो मिल्खा सिंह के कारनामों (ज्यादातर काल्पनिक) को नहीं दोहराता हो, ऐसा कोई नहीं है, जो उनके साथ सेल्फ़ी लेने के लिए नहीं भागता हो.  

भारत में कपिल देव जैसे क्रिकेटर हुए हैं, जिन्होंने देश के लिए वर्ल्ड कप जीता, मगर मिल्खा सिंह अब भी कपिल देव के साथ कमेंटरी बॉक्स में अदब के साथ बैठ हुए दिखते हैं. 

असाफा पॉवेल ने अपना कॅरियर क्रिकेटर के तौर पर शुरू किया था और वे मिल्खा सिंह की बजाय शायद कपिल देव से बात करते. पर यहां ऊंचे मंच पर मिल्खा सिंह थे, जिनके साथ कई ओलिंपिक पदक जीत चुके पॉवेल बात करना चाहते थे.

ऐसा क्या है, जिसकी वजह से मिल्खा सिंह भारतीय उपलब्धि के अमर गायक बन गए. उनमें ऐसा क्या ख़ूबी है? और क्यों हम उन्हें भूलना नहीं चाहते?

माइकल फैल्प्स ने इतने ओलंपिक (27) जीते, जिसे वे गिन नहीं सकते मगर उनकी भी अमेरिका के जनमानस में ऐसी छवि नहीं है. मिल्खा बिल्कुल उनके उलट हैं. 50 साल से भी ज्यादा समय से वे लोगों के लिए महानतम धावक बने हुए हैं. 

चमकता सितारा

तमाम लोगों ने अपने लेखों ने मिल्खा सिंह की शख़्सियत का गुणगान किया है. बोरिया मजूमदार और नलिन मेहता ने अपनी किताब ‘ओलिंपिक: द इंडिया स्टोरी’ में लिखा है, ‘एक महानतम पुरुष धावक, जो आज तक नहीं हुआ.’ खिलाड़ी के तौर पर ध्यानचंद श्रेष्ठ थे और स्वर्ण पदक विजेता भी, पर उन्हें भी इतना सेलिब्रेट नहीं किया गया. हालांकि ध्यान चंद की एक स्टेच्यू दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में शान से लगी हुई है. 

मिल्खा हारे क्योंकि उनकी कोई स्पष्ट रणनीति नहीं थी और ना ही पर्याप्त प्रशिक्षण. रोम पहुंचने के बाद केवल दिन का एक घंटा मिला था उन्हें. जैसा कि उन्होंने खुद ने कहा है कि वे ‘बेफ़िक्र थे और खुद पर भरोसा था.’ 

उनकी दौड़ के बारे में द हिंदू ने कहा था, ‘मिल्खा सिंह अगर दौड़ की शुरुआत में ही ताकत झोंकने की बजाय समझदारी से दौड़े होते तो स्वर्ण पदक जीत जाते.’ 45.6 सेकेंड में 400 मीटर की उनकी दौड़ वर्ल्ड रिकॉर्ड था, पर जो समझदारी से दौड़े, वे पदक ले गए. 

मिल्खा सिंह को महान धावक शायद इसलिए भी मानते हैं क्योंकि देश को ज्यादातर विफलता हाथ लगी है. भारतीयों में आत्मविश्वास की कमी और किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने की विफलता भी मिल्खा सिंह को एक अच्छा धावक मानने के लिए थोड़ा-बहुत ज़िम्मेदार है. इतनी विफलता कि हम विफल खिलाड़ी से भी काम चला लेते हैं. भारतीय खेल इतिहास विफलता का इतिहास रहा है और रियो ओलिंपिक में चौथा स्थान पाना भी हमारे लिए बड़ी बात है.

उनकी लोकप्रियता की एक अन्य वजह यह है कि सिखों को अक्सर वीरता, गर्व और खेल कौशल का प्रतीक माना जाता रहा है, और मिल्खा उस सांचे में फिट बैठते हैं. महान खिलाड़ी की छवि गलत नहीं हो सकती क्योंकि आखिर कितने समय तक एक विफल धावक भारतीय जनमानस में बना रह सकता है? 

मिल्खा तक सबकी आसान पहुंच है और वे बाक़ी महान भारतीय धावकों और क्रिकेटरों की तरह लोगों से मिलने का पैसा नहीं लेते. अगर कोई मिल्खा को चुनौती दे सकता है, तो वह सचिन तेंदुलकर हैं, पर उन तक पहुंच आसान नहीं है. इसलिए ‘उडऩ सिख’ ने ओलिंपिक पदक हारने के बाद भी जो 50 साल तक कठिन भूमिका अदा की है, वह तारीफ़ के क़ाबिल है.

First published: 23 November 2016, 7:46 IST
 
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