Home » खेल » Will Cheer girls in IPL 2018 & demo girls in Auto Expo 2018 also say Goodbye, as Formula One does with Grid Girls
 

तो क्या Auto Expo-IPL 2018 में नहीं होंगी डेमो गर्ल्स-चीयर लीडर्स?

अमित कुमार बाजपेयी | Updated on: 3 February 2018, 16:41 IST
फाइल फोटो

अगर सही ढंग से सोचा गया तो इस माह होने वाले ऑटो एक्सपो 2018 और मई में होने वाले इंडियन प्रीमियर लीग 2018 में डेमो गर्ल्स और चीयर लीडर्स दिखाई नहीं देंगी. यानी ऑटो एक्सपो में चमचमाती लेटेस्ट कारों के बगल में मुस्कुरातीं और रंगीन शॉर्ट ड्रेसेज पहने लड़कियां और IPL में चौके-छक्के पड़ने के बाद तेज धुनों पर डांस करके दर्शकों का मनोरंजन करने वाली चीयर लीडर्स नहीं नजर आएंगी.

हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि दुनिया के सबसे महंगे आयोजन माने जाने वाले रफ्तार व रोमांच के खेल Formula One के आयोजकों ने 'ग्रिड गर्ल्स' को गुडबाय बोल दिया है. (ग्रिड गर्ल्स यानी एक जैसी रंगीन मिनी ड्रेसेज में खड़ीं वो युवतियां जो फॉर्मूला वन ट्रैक में ड्राइवर्स के नाम का कार्ड लेकर आती हैं और ड्राइवर्स के ऊपर छाता लगाए मुस्कुराती दिखती हैं.)

बुधवार को एक बयान जारी कर फॉर्मूला वन के मैनेजिंग डायरेक्टर (कमर्शियल ऑपरेशंस) सीन ब्रैचेज ने इस बाबत बोला, "यूं तो फॉर्मूला 1 ग्रैंड प्रिक्स में दशकों से ग्रिड गर्ल्स को शामिल किया जाता रहा है, लेकिन हमें यह परंपरा हमारे ब्रांड वैल्यू के साथ जाने वाली नहीं लगती है और स्पष्ट तौर पर यह आधुनिक सामाजिक नियमों से अलग है. हम नहीं मानते कि दुनिया भर में फॉर्मूला 1 और इसके नए-पुराने प्रशंसकों को यह प्रक्रिया कहीं से उचित लगती है."

उन्होंने आगे कहा, "2018 FIA Formula 1 वर्ल्ड चैंपियनशिप सत्र की शुरुआत के साथ ही, फॉर्मूला 1 ग्रिड गर्ल्स के चलने वाली लंबे वक्त से आ रही परंपरा को खत्म कर देगा. यह बदलाव हमारी अन्य मोटरस्पोर्ट्स सिरीज में भी लागू होंगे जो ग्रैंड प्री वीकेंड्स के दौरान होती हैं."

इस फैसले का एक कारण यह और बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर छिड़े #MeToo अभियान के कारण स्पॉन्सर्स को यह डर हो सकता है कि कहीं उन पर भी लैंगिक असमानता का आरोप न लगा दिया जाए. वैसे काफी लंबे वक्त से फॉर्मूला वन में ग्रिड गर्ल्स को शोपीस के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है. लेकिन #MeToo अभियान ने अब लोगों को मुखर होकर इस तरह के मुद्दों को सामने लाने का मौका दिया है.

इस संबंध में द इंडिपेंडेंट की वरिष्ठ पत्रकार जैनेट स्ट्रीट-पोर्टर लिखती हैं कि तमाम ग्रिड गर्ल्स ने दावा किया है कि यह काम काफी मजेदार है और नुकसान नहीं पहुंचाता. लेकिन यह काम उन्हें ही मुबारक. लेकिन कोई भी काम जो केवल लुक्स को देखकर दिया जाए और उसमें हमेेशा मुस्कुराते रहने के अलावा किसी विशेष कौशल (स्किल) की जरूरत न हो, काफी अपमानजनक लगता है.

फाइल फोटो (wikimedia)

पोर्टर का मानना है कि आज की युवतियां आजाद हैं. वे जैसे चाहे अपने शरीर का इस्तेमाल कर सकती हैं. फिर युवतियां कोई ऐसा काम क्यों न चुनें जहां पर आपको बाहरी दिखावे से ही न जज किया जाए. किसी भी काम में अगर महिला (या पुरुष) को एक वेशभूषा पहना कर खड़ा होने का काम दिया जा रहा है, तो वो लिंगभेद ही है.

खेल प्रतियोगिताएं आज मनोरंजन का प्रमुख साधन हैं. आजकल के खिलाड़ियों को खेलने से ज्यादा अन्य काम भी करने पड़ते हैं. इनमें इंटरव्यू देना, विज्ञापन करना, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना, अपने प्रशंसकों से मिलना समेत कई काम शामिल हैं. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय खेलों के मौजूदा आधुनिक दौर में एक ही सेक्स (लिंग) को प्रचार-मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल करना सही नजर नहीं आता.

अब ऐसी स्थिति में जब दुनिया के सबसे प्रमुख और महंगे खेल में ग्लैमर का जलवा बिखेरने वाली ग्रिड गर्ल्स को गुडबाय बोल दिया गया है, T20 क्रिकेट के मशहूर फॉर्म IPL 2018 के आयोजकों-प्रायोजकों को भी इससे सबसे लेना चाहिए. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को भी इस परंपरा को बंद करने के बारे में सोचना चाहिए.

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बता दें कि IPL के दौरान हर चौके-छक्के-विकेट के बाद स्टेडियम में किनारे रोशनी के बीच छोटे कपड़ों में मौजूद चीयर गर्ल्स तेज संगीत पर जमकर नाचते हुए लोगों का मनोरंजन करती हैं. स्पष्ट रूप से यह भी लिंगभेद ही है जिसमें दर्शकों के मनोरंजन के लिए लड़कियों का इस्तेमाल किया जाता है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि क्रिकेट भी दुनिया के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले खेलों में से एक है और IPL, जिसमें दुनिया के कई देशों के खिलाड़ी खेलते हैं, को तमाम मुल्कों में देखा जाता है.

इसके अलावा फरवरी के दूसरे सप्ताह से ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो मार्ट में शुरू होने वाली ऑटोमोबाइल प्रदर्शनी यानी Auto Expo 2018 भी एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन है, जो हर दूसरे वर्ष भारत में आयोजित होता है. इसमें भी दुनिया की दिग्गज ऑटोमोबाइल कंपनियां अपनी नवीनतम और भविष्य की कारें लेकर आती हैं. इस आयोजन के दौरान भी रंगीन-मिनी ड्रेसेज में मुस्कुराती हुईं युवतियां कारों-बाइकों के बगल में 'शो पीस' की तरह दिखती हैं.

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इस आयोजन में आने वाले दर्शक न केवल कारों बल्कि इन 'शो-पीज' रूपी युवतियों के साथ भी सेल्फी लेते आसानी से दिख जाते हैं. जाहिर है यह भी लैंगिक असमानता का मामला है जहां पर युवतियों को केवल अपनी स्टॉल-प्रोडक्ट की ओर आकर्षित करने के लिए ही खड़ा किया जाता है.

ऑटोमोबाइल निर्माताओं, ऑटो एक्सपो आयोजकों को चाहिए कि वे भी #MeToo अभियान से सबक लें और एक नई शुरुआत करें.

हालांकि देखने वाली बात होगी कि क्या ऑटो एक्सपो और आईपीएल के दौरान इन शो-गर्ल्स और चीयर लीडर्स के जलवे बंद होंगे या फिर देसी आयोजकों को फिलहाल इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

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First published: 3 February 2018, 16:41 IST
 
अमित कुमार बाजपेयी @amit_bajpai2000

पत्रकारिता में एक दशक से ज्यादा का अनुभव. ऑनलाइन और ऑफलाइन कारोबार, गैज़ेट वर्ल्ड, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, एजुकेशन पर पैनी नज़र रखते हैं. ग्रेटर नोएडा में हुई फार्मूला वन रेसिंग को लगातार दो साल कवर किया. एक्सपो मार्ट की शुरुआत से लेकर वहां होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों-संगोष्ठियों की रिपोर्टिंग.

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