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झारखंड: सूबे में ईसाइयों की घरवापसी तेज़ हुई, 53 हिन्दू बने

महताब आलम | Updated on: 15 April 2017, 8:11 IST


बीते 10 अप्रैल को, हिन्दुस्तान टाइम्स ने खबर छापी कि पिछले एक महीने में पांच जनजातीय बाहुल्य गांवों में 53 परिवार हिन्दु समाज में लौट आए हैं. इसे घर वापसी कहा गया है. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 'ईसाई मुक्त ब्लॉक' अभियान का हिस्सा है जो संघ ने खूंटी जिले के आदिवासी बहुल इलाके में चलाया हुआ है.

खबरों के मुताबिक यह घर वापसी अडकी ब्लॉक के सिंदरी पंचायत में हुई और यह अभियान अप्रैल तक जारी रहेगा. यह अभियान वनवासी कल्याण आश्रम (वीकेए) और भाजपा के खूंटी जिले के उपाध्यक्ष लक्ष्मण सिंह मुंडा के नेतृत्व में चलाया जा रहा है. वीकए संघ परिवार से जुड़ा संगठन है जो पूरे भारत में आदिवासियों के बीच काम करता है. हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक बीते 7 अप्रैल को कम से कम 7 ईसाई परिवार 'आदिवासियों के साथ गैर आदिवासी' भी थे, का शुद्धिकरण किया गया. शुद्धिकरण समारोह कोचासिंदरी गांव में करवाया गया.

मूल धर्म में वापसी?


भाजपा उपाध्यक्ष मुंडा ने कैच न्यूज़ से कहा कि वह अपने स्थानीय सहयोगियों के साथ पिछले कई माह से घर वापसी के लिए अभियान चला रहे हैं. उन्होंने दावा किय़ा कि हम तो उन्हें उनके मूल धर्म में वापस ला रहे हैं.

मूल धर्म में वापस लाने का पहला कार्यक्रम इसी साल फरवरी में हुआ था. 25 फरवरी को मुंडा ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर तीन तस्वीरें पोस्ट कीं जिसमें वह घर वापसी की प्रक्रिया में भाग ले रहे आदिवासी समुदाय के साथ दिख रहे हैं. तस्वीर के नीचे मुंडा ने जो कैप्शन लिखा है, वह इस तरह है, 'अडकी ब्लॉक के सिंदरी गांव (आदिवासी समुदाय के लोग) ईसाइयत से हिन्दू धर्म में लौटते हुए.' मार्च में भी उन्होंने हिन्दू सह सरना धर्म जागरण मंच के बैनर तले कई बैठकें आयोजित की जिसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लिया.

वह कहते हैं कि उनके इस मिशन में सिंदरी पंचायत के मुखिया रुद्रनारायण सिंह मुंडा और एक अन्य अजय साहू, जो विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े हुए हैं, ने मदद की है. मुंडा कहते हैं कि वास्तव में ये वे लोग है जो जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं. हम तो वीकेए और आरएसएस के लोगों के साथ सिर्फ रास्ता बता रहे हैं.

उन्होंने यह भी दावा किया कि जब सरना लोगों ने ईसाई धर्म अपनाना शुरू किया जब गांव वाले हमारे पास आए और उन्होंने अनुरोध किया कि हम कुछ करें. मुंडा सरना (आदिवासी) और हिन्दू शब्द का प्रयोग दूसरे शब्दों में करते हैं. जब उनसे पूछा गया कि वह सरना शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि सरना और कोई नहीं, बल्कि हिन्दू ही हैं. हिंदू और सरना में कई समानताएं हैं.

यहां ये मालूम होना चाहिए कि सरना एक धर्म से अधिक आदिवासियों के जीने की पद्धति है जिसमें लोक व्‍यवहार के साथ पारलौकिक आध्‍यमिकता या आध्‍यत्‍म भी जुड़ा हुआ है. दूसरी ओर, सरना और ईसाइयों के बीच कोई सांस्कृतिक और धार्मिक समानता नहीं है.

 

अभियान में रफ़्तार

 

मुंडा आरएसएस और भाजपा से जुड़े होने के अलावा रांची जिले के तमार ब्लॉक की पंचायत कमेटी के सदस्य भी हैं. उन्होंने दावा किया कि पिछले कुछ सालों से क्रिश्चियन मिशनरी संगठनों ने चिकित्सा, इलाज और बीमारी ठीक करने के नाम पर आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कराने की कोशिशें की हैं. हालांकि, कितने लोग ईसाई बनाए गए, इसकी संख्या वह ठीक-ठीक नहीं बता सके, पर वह कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में सैंकड़ों लोगों को बहलाया गया है. इसमें कुछ उनके दूर-दराज के परिवार के सदस्य भी शामिल हैं.

मुंडा कहते हैं कि हमारा बिल्कुल साफ मानना है. अगर वे आदिवासियों को मिलने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकारों का फायदा उठाना चाहते हैं, तो उन्हें ईसाई धर्म छोड़ना होगा वरना उन्हें ईसाई धर्म के नियमों के अनुसार जीना और मरना चाहिए.

दूसरी ओर, झारखंड स्वदेशी पीपुल्स फोरम के एक सदस्य जेरोम गेलार्ड कुजूर, मुंडा के दावों का प्रतिकार करते हैं और कहते हैं कि सिर्फ चेंगई सभा 'उपचार के लिए आयोजित बैठक' में भाग लेने से कोई ईसाई नहीं बन जाता. लेकिन वीकेए जैसे संगठन जो ईसाइयत के खिलाफ हैं, वे ईसाई संगठनों द्वारा आयोजित बैठक में भाग लेने वालों पर दबाव डालते हैं कि वे अपना शुद्धिकरण कराएं.

अगर पत्रकारों और एक्टिविस्टों की मानें तो यह अकेली ऐसी घटना नहीं है. रांची के एक वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग कहते हैं कि इस तरह के अभियान में नया कुछ भी नहीं है. आरएसएस और उससे जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठन लम्बे समय से इस दिशा में काम कर रहे हैं. वह आगे कहते हैं, 'मगर हाल के विधानसभा चुनावों ख़ासकर उप्र में भारी जीत से कैडर के उत्साह में बढ़ोतरी हुई है.'

 

आंदोलनों पर हमला


आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वालीं एक्टिविस्ट दयामनि बरला जिन्होंने आम आदमी पार्टी के टिकट पर वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा था, अनुराग की बातों से सहमत हैं. वह कहती हैं कि यह सिर्फ कुछ जिलों तक ही सीमित नहीं है. लेकिन ऐसी घटनाएं पूरे राज्य में हो रही हैं. यह राज्य-व्यापी घटना है. बरला कहती हैं कि गुमला, पलामू, चाईबासा जैसे जिले वीकेए के गढ़ हैं. अनुराग और बारला दोनों का दावा है कि वीकेए के प्रयासों का उद्देश्य झारखंड में भूमि कानूनों में परिवर्तन के खिलाफ आंदोलन को कमजोर करना है.

बरला कहती हैं कि वीकेए जैसे संगठन और अन्य लोग धर्मान्तरण का भूत पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि भूमि अधिकारों को लेकर चल रहे संघर्ष को कमजोर किया जा सके. यहां यह ध्यान दिए जाने वाली बात यह कि पिछले साल सितम्बर में अब संशोधित छोटा नागपुर टेनेन्सी एक्ट (सीएनटी एक्ट) और संथाल परगना टेनेन्सी (एसपीटी) एक्ट के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हुए थे. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने यही कार्ड खेला था. उन्होंने विरोध प्रदर्शनों के लिए ईसाई मिशनरियों को दोषी ठहराया था जो आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराने में सक्रिय रूप से शामिल हैं.

First published: 15 April 2017, 8:11 IST
 
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