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नवांशहर: सारे राजनीतिक मसाले एक ही प्लेट में

राजीव खन्ना | Updated on: 29 January 2017, 8:45 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

पंजाब में नावांशहर विधानसभा क्षेत्र लगता है इन दिनों राजनीति का केंद्र बना हुआ है. इन चुनावों में नावांशहर में वंशवाद की राजनीति, पारिवारिक कलह, जातिगत राजनीति, एनआरआई घटक और उम्मीदवारों के बीच रोचक मुकाबला यह सारे मसाले एक साथ एक ही सीट पर देखने को मिलेंगे. यह पंजाब के दाओबा क्षेत्र की हॉट सीट बन चुकी है.

यहां कांग्रेस के अंगद सिंह सैनी, आम आदमी पार्टी के चरणजीत सिंह चन्नी और शिरोमणि अकाली दल के जरनैल सिंह वाहिद चुनाव मैदान में हैं. इन सबको चुनौती दे रहे हैं बसपा के डॉ. नचत्तर पाल.

कांग्रेस पार्टी ने अंगद के रूप में सबसे कम उम्र का उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारा है. 26 वर्षीय अंगद पार्टी का युवा चेहरा हैं. पारिवारिक पृष्ठभूमि उनकी ताकत है. वे स्वर्गीय प्रकाश सिंह के बेटे हैं, जो 2002 में इस सीट से जीते थे. वर्तमान में इस सीट से उनकी मां गुर इकबाल कौर विधायक हैं, जो 2012 में मात्र 2000 वोटों से इस सीट पर जीती थीं.

उनके सामने खड़े आप उम्मीदवार चन्नी अंगद के पिता के ही रिश्तेदार हैं और राजनीतिक रूप से काफी मजबूत स्थिति में हैं. चन्नी के पिता दिलबाग सिंह नावांशहर सीट से छह बार जीत चुके हैं. कांग्रेस से टिकट न मिलने पर ही चन्नी आप पार्टी में शामिल हुए. बार-बार पार्टी बदलना उनकी कमजोरी बन चुकी है. आप में आने से पहले वे कांग्रेस और बसपा में रह चुके हैं.

कांग्रेस-आप में टक्कर

क्षेत्र के मतदाताओं का कहना है कि यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस और आप के बीच ही है. शहर का मतदाता कांग्रेस के पक्ष में है जबकि आप को गांव के कुछ मतदाताओं का साथ मिल सकता है.

नवांशहर में एनआरआई फैक्टर भी हावी है क्योंकि यहां के हर दूसरे घर से एक न एक बंदा विदेश में रहने वाला अप्रवासी भारतीय है. यहां हर गली-नुक्कड़ पर विदेश भेजने वाली इमिग्रेशन सर्विस के बोर्ड-बैनर लगे दिख जाएंगे. पहले की तरह इस बार भी एनआरआई कांग्रेस और आप उम्मीदवार के ही पक्ष में प्रचार करती नजर आ रहे हैं.

एनआरआई नागरिकों द्वारा विदेशों में कमा कर यहां पैसा भेजने के चलते ही यहां बड़े-बड़े मकान और संपन्न जीवनशैली के नजारे दिख जाते हैं. इसलिए जब ये एनआरआई किसी पार्टी विशेष को  वोट देने की अपील करते हैं तो उसका असर

पड़ता ही है. 

एक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, यहां राजनीतिक दल एनआरआई मतदाताओं को खुश रखने का हर संभव प्रयास करते हैं. यहां ढाबा चलाने वाले एनआरआई ओम प्रकाश ने कहा, मैंने 14 साल तक स्पेन में एक कुक के तौर पर काम किया और अभी तीन साल परहले ही अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद पुश्तैनी मकान संभालने और ढाबा चलाने के लिए मैं यहां आया. 

स्पेन में काम करते हुए मैं यहां घर वालों को प्रतिमाह 1700 यूरो भेजा करता था. अब मेरे दो बेटे अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में हैं. बड़ा बेटा अमेरिका में कुक है और छोटे को मैंने ऑस्ट्रेलिया के एक कस्बे में एक रेस्तरां खरीदवा दिया है. ये दोनों ही डबल एम.ए. हैं और कुकिंग की डिग्री उन्हें मैंने दी है.

सभी के मुद्दे एक जैसे

वे कहते हैं यहां एनआरआई व आम मतदाता दोनों के ही लिए मुद्दे एकसमान हैं. दोनों ही विकास चाहते हैं. सड़कों के हाल खराब हैं. अच्छी शिक्षा के बावजूद रोजगारों की कमी है. भ्रष्टाचार की समस्या यहां आम है. यहां एक व्यवस्थित तंत्र की तो जरूरत है. वे कहते हैं यहां कांग्रेस का पलड़ा भारी है क्योंकि लोग एकदम नई पार्टी आप पार्टी को आजमाने के मूड में नहीं

दिखाई दे रहे. ‘‘अकालियों को तो मुश्किल ही कुछ मिले क्योंकि लोकि समझदार हो गए नीं.’’

लोग यहां बसपा के नछत्तर पाल को छिपा रूस्तम मान रहे हैं. वे इस सीट के जातिगत समीकरणों को कुछ इस प्रकार समझाते हैं-यहां सैनी, दलित और जाटों सहित अन्य उच्च वर्ग की जातियों को एकसमान प्रतिनिधित्व हासिल है. उनको

एक फायदा यह मिल सकता है कि दो दशक से पंजाब में बसपा का राजनीतिक स्तर कुछ खास नहीं है लेकिन अब नवांशहर में पार्टी को अपना वोटर मिलता नजर आ रहा है. 

पिछले चुनाव में यहां पार्टी उम्मीदवार को करीब 30,000 वोट मिले थे जो कि कुल वोटों का करीब पांचवां हिस्सा था. चन्नी और अंगद चूंकि सैनी समुदाय के हैं और अकालियों के यहां से जीतने की संभावना कम ही है. ऐसे में वोटों का बंटवार बसपा उम्मीदवार के पक्ष में जा सकता है. 

जातिगत समीकरण से ही संबंधित एक तथ्य यह और है कि कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सतबीर सिंह टिकट नहीं मिलने से खिन्न हैं. वे बीस साल से कांग्रेस के वफादार सिपाही रहे हैं और दस साल से यहां जिलाध्यक्ष हैं. अगर इस बार अंगद जीत जाते हैं तो निकट भविष्य में भी सतबीर को शायद ही यहां से टिकट मिले.

अकाली उम्मीदवार वाहिद एक चीनी मिल के मालिक और कानूनी शिक्षा में डिग्री किए हुए हैं. वे पिछले एक दशक से अकाली-भाजपा गठबंधन द्वारा किए गए काम के आधार पर वोट मांग रहे हैं. उन्हें अकाली अध्यक्ष सुखबीर बादल का करीबी माना जाता है लेकिन फगवाड़ा को होने के कारण उन्हें बाहरी उम्मीदवार माना जाता है. एक सवाल यहां यह उठ रहा है कि अकाली दल ने जतिन्दर सिंह करिहा के परिवार को क्यों भुला दिया, जो यहां से तीन बार जीत चुके हैं.

सीपीआई (एमएल) की राह मुश्किल

नवांशहर से ही सीपीआई (एमएल) नए लोकतांत्रिक ने सुरिंदर सिंह बैंस को उम्मीदवार बनाया है. हालांकि उनके जीतने की संभावना नहीं है लेकिन वे यहां वाम का जाना-माना चेहरा हैं, जो क्षेत्र में जनता से जुड़े मामलों पर आंदोलन कर चुके हैं. पार्टी की छात्र संघ इकाई यहां मैट्रिक के बाद छात्रवृत्ति योजना के तहत कमजोर वर्ग के छात्रों की फीस वापसी के लिए आंदोलन कर रही है. ये लोग गत वर्ष मटर की फसल खराबे के लिए जिम्मेदार नकली बीजों के खिलाफ भी आंदोलन कर रहे हैं.

बैंस ने कहा, केवल हम ही हैं जो जनता के मुद्दों की बात करते हैं. फिर यह चाहे दलितों को जमीन के अधिकार देने की बात हो या रोजगार मॉडल की. जो रोजगार का वादा कर रहे हैं, उनके पास कोई तयशुदा योजना ही नहीं है. रोजगार सृजन के लिए पंजाब को कृषि आधारित उद्योग लगाने की जरूरत है. नवांशहर जैसी इस हॉट सीट का फैसला तो 4 फरवरी को होने वाले मतदान के बाद ही होगा.

First published: 29 January 2017, 8:45 IST
 
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