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मालवा क्षेत्र में अंतिम दौर का चुनाव प्रचार आप के पक्ष में भारी समर्थन का संकेत दे रहा है

राजीव खन्ना | Updated on: 25 January 2017, 8:43 IST
(एएफ़पी)

पंजाब में चुनावी अभियान अंतिम दौर में है. अब तक की स्थिति यह है कि आम आदमी पार्टी, दो पुराने सशक्त दलों, कांग्रेस और अकाली-भाजपा गठबंधन पर भारी पड़ रही है. आप अन्य पार्टियों से साफ तौर पर आगे है. उसे भारी जन समर्थन मिल रहा है, खासतौर से राज्य के मालवा क्षेत्र में, जहां 50 फीसदी से ज्यादा सीटें हैं.

दूसरी ओर अकाली-भाजपा के खिलाफ जबदस्त सत्ता विरोधी लहर है. कांग्रेस भी एक बार फिर संकट में आ गई है. दशकों पुरानी कांग्रेस की हाई कमान संस्कृति से उसका नुकसान हो रहा है.

मालवा में बड़ा फायदा

आप को सबसे ज्यादा फायदा मालवा में होगा, यह साफ नज़र आ रहा है. फरीदकोट, मुख्तसर, मोगा, बठिंडा, लुधियाना, बरनाला, मंसा, संगरूर, फतेहगढ़ साहिब, पटियाला, रोपड़ और मोहली जिलों में कुल 69 सीटें हैं. पिछले विधान सभा चुनावों में, सद-भाजपा और कांग्रेस के बीच बराबर का मुकाबला था. पर पिछले लोकसभा चुनावों से ठीक पहले आप के आने से समीकरण बदल गए हैं.

लोगों का मानना है कि इस क्षेत्र में आप के लिए जन समर्थन की लहर इतनी मजबूत है कि कोई भी इस वक्त आप के लिए 40 फीसदी सीटों की आसानी से भविष्यवाणी कर सकता है. और यह अकाली और कांग्रेस दोनों के लिए चिंता की बात है. 

खबर है कि अकाली अध्यक्ष सुखबीर बादल को जलालाबाद में अपनी ही सीट बचाने में मुश्किलें आ रही है, जहां आप के संगरूर के सांसद भागवंत मान चुनौती दे रहे हैं कि उन्हें अपने समर्थकों का जबरदस्त सहयोग मिल रहा है.

लांबी सीट पर भी, जहां वरिष्ठ अकाली नेता और मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की सरकार है, दिल्ली के राजौरी गार्डन से आप विधायक जनरैल सिंह कड़ी टक्कर दे रहे हैं. हालांकि लोगों का कहना है कि राज्य कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह के इस सीट से चुनाव लड़ने के निर्णय ने बादल को काफी राहत दी है क्योंकि इससे विपक्ष के वोट टूट जाएंगे.

मालवा में आप मजबूत क्यों?

मालवा में आप को जन समर्थन मिलने के पीछे व्यक्तिगत सीटों के अलावा, कुछ ठोस वजह भी हैं. पहली, जनता कांग्रेस और अकाली-भाजपा का विकल्प चाहती है, और आप, जिसका 2014 के आम चुनावों के बाद उदय हुआ था, मजबूत हुई है. लोगों की आम भावना यह है कि अब तक अकाली और कांग्रेस उनके लिए कुछ नहीं कर सके हैं, तो एक नई शक्ति को क्यों नहीं मौका दिया जाए?

देहात के लोग भी दोनों पुरानी पार्टियों के रास्ते में रोड़े अटकाना चाहते हैं. वे वैकल्पिक पार्टी को आजमाना चाहते हैं. ग्रामीण इलाकों में जाने से पता चलता है कि कौन आगे है: वह झाड़ू वाली या टोपी वाली पार्टी है. उनके विरोधी पार्टियों के विरुद्ध, आप के उम्मीदवार नए चेहरे हैं. उन पर ऐेसा कोई आरोप नहीं है कि उन्होंने जनता के लिए कुछ नहीं किया, या लोगों को निराश किया. वे नए चेहरे हैं, उनके पास जनता के लिए नए वादे हैं.

पार्टी ने अपनी जगह किसानों की हताशा, किसान आत्महत्याएं और युवाओं में नशे की लत जैसे स्थानीय मुद्दों पर अभियान चलाकर बनाई है. बड़ी रैलियां रखने की बजाय, आप की पिछले दो सालों से रणनीति स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शनों की रही है. यह लोगों को इनके साथ जोड़ती है. अब पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की रैलियों से ये अभियान और अच्छे हो रहे हैं. 

इस क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार ने बताया, ‘बाहर से आई आप के कार्यकर्ताओं की टीम ने बहुत ही प्रभावी ढंग से अभियान चलाए हैं. उन्होंने घर-घर जाकर लोगों से संपर्क किया है. इसके अलावा, झाड़ू के चिह्न ने श्रमिक वर्ग, भूमिहीन किसानों और दलितों को आकर्षित किया है. वामपंथी समर्थकों का भी पार्टी की ओर रुझान हुआ है.’

दोआबा में चुनौती

आप को सबसे ज्यादा समस्या दोआबा में आ रही है. इस क्षेत्र में 23 सीटें हैं, जिनमें जालंधर, नवांशहर, कपूरथला और होशियारपुर जिले शामिल हैं. दोआबा में पार्टी के लिए ढेर सारी समस्याएं रहीं. इसी क्षेत्र में पार्टी को सबसे ज्यादा विरोध झेलना पड़ा, जो स्थानीय स्तर के नेताओं और स्वयंसेवकों में अब भी जारी है. ये कांग्रेस या अकाली-भाजपा कैंपों की ओर रुख कर रहे हैं. पार्टी पर धनिकों को टिकट देने और स्वयंसेवकों की उपेक्षा करने का आरोप है, जिन्होंने पार्टी को अपने पैर जमाने में मदद की थी.

आप के खिलाफ अन्य आरोप यह है कि उन्होंने मोटी रकम पर टिकट बेचे हैं, और फंडिंग को लेकर स्पष्ट नहीं है, खासकर अपने विदेशी समर्थकों से मिलने वाली राशि को लेकर. दोआबा में दलित काफी संख्या में हैं. यह पंजाब का एनआरआई केंद्र भी है, जहां से काफी संख्या में पंजाबी विश्व के कई हिस्सों में गए हैं. यहां के दलितों के मुद्दे मालवा के दलितों के मुद्दों से भिन्न हैं. दोआबा के दलित आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत बेहतर हैं. 

आप के पूर्व राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य यामिनी गौमर ने जब हाल में कांग्रेस मं शामिल होने के लिए पार्टी छोड़ी थी, तो कहा था, ‘आप नेता, खासकर जो दिल्ली से हैं, सबसे बड़े तिकड़मबाज हैं और जानते हैं कि पंजाबियों को किस तरह मूर्ख बनाना है. केजरीवाल ने पंजाबियों को ही भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का सपना नहीं दिखाया था, बल्कि पूरे देश को दिखाया था, पर आप पुरानी पार्टियों की तरह काम कर रही है और लाखों रुपयों में टिकट बेच रही है. लोगों ने आप के टिकट पाने के लिए अपनी जमीनें बेच दीं और दिल्ली से भेजे लोगों के लिए लाखों रुपए खर्च किए.’

यह देखना है कि विभिन्न डेरों पर जाने और दलित समुदाय से उपमुख्यमंत्री बनाए जाने के वादे से दोआबा में आप को इच्छित परिणाम मिलते हैं या नहीं. 

माझा में स्थिति

इसी तरह माझा में भी उन्हें अपनी स्थिति अभी मजबूत करनी है. इस इलाके में 25 सीटें हैं, जो अमृतसर, पठानकोट, तारन तारन और गुरदासपुर जिलों में हैं. पार्टी के लिए यहां अच्छी बात यह है कि उसके पंजाब के संयोजक गुरदीप सिंह ‘घुग्गी’ गुरदासपुर जिले में बटाला से चुनाव लड़ रहे हैं , जबकि हिम्मत सिंह शेरगिल मजीठा निर्वाचन क्षेत्र से अकाली के मजबूत दावेदार बिक्रम सिंह मजीठिया को कड़ी टक्कर देने वाले हैं. पर आप यहां अब भी अपेक्षाकृत कमजोर है.

यह क्षेत्र अकालियों और कांग्रेस का गढ़ रहा है. यहां पंथिक राजनीति का सदियों से बोलबाला रहा है. इसके अलावा, सुच्चा सिंह छोटेपुर भी पार्टी को कमजोर करने वाले साबित हो रहे हैं. जब से आप ने छोटेपुर को राज्य संयोजक पद से बर्खास्त किया है, वे पार्टी को ‘भैयाओं’ (उप्र और बिहार के प्रवासियों के लिए) की पार्टी बताते हुए, उसके खिलाफ विरोधियों के साथ लगातार मुहिम चला रहे हैं. छोटेपुर ने अपनी अपना पंजाब पार्टी (एपीपी) बनाई है, जिसका मुख्य मकसद आप को चुनावों में नहीं जीतने देना है. 

अकाली की कोई चर्चा नहीं

अकाली-भाजपा दोनों को तीन क्षेत्रों में विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है. चर्चा है कि जहां अकालियों की मजबूत स्थिति रही है, खासकर मालवा में, लोग सत्तासीन पार्टी की बात तक नहीं कर रहे. लोगों का कहना है कि अकाली के मजबूत उम्मीदवार अपनी सीटें बनाए रखने में सफल रहेंगे. दशकों पुरानी प्रतिष्ठा और अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छा काम करने के कारण. 

अकालियों के साथ सीटों के समायोजन के हिसाब से भाजपा शहरी निर्वाचन क्षेत्रों तक सीमित है. पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी को मुद्दा बनाया था, पर बाद में धीरे-धीरे अपने विरोधी स्वर धीमे कर लिए. उन्हें डर था कि कहीं यह ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, शहरों में भी उल्टा नहीं पड़ जाए. खबर है कि पंजाब दौरे पर जब अरुण जेटली आए थे, कुछ लोग उनके स्वर में स्वर मिला रहे थे. यह भी खबर थी कि सत्ता छोडऩे वाली सरकार के मंत्री अनिल जोशी, जो अमृतसर (पूर्व) से चुनाव लड़ रहे हैं, उन्होंने अपने मतदाताओं से कहा है कि उनकी नोटबंदी में कोई भूमिका नहीं थी, इसलिए वे उन्हें सजा नहीं दें. 

कांग्रेस कीमत चुका रही है

अपने उम्मीदवारों की देरी से घोषणा करने के कारण कांग्रेस को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है. लगभग दो महीनों तक टिकट के लिए पैरवी करते हुए उन्होंने दिल्ली में अपने शीर्ष नेतृत्व के साथ कैंपिंग की. इससे पार्टी ने उस फायदे को भी गंवा दिया, जो उसने अमरिन्दर की आक्रामक कैंपेनिंग से थोड़ा बहुत कमाया था. दुख की बात यह भी है कि कांग्रेस में काफी संख्या में बागी हैं. समस्याएं अमरिन्दर के आलोचकों से भी बढ़ीं, जिन्होंने पीछे के दरवाजे से विरोधी उम्मीदवारों को मदद की. 

अब चुनाव में 10 दिन हैं, क्या कांग्रेस और अकाली चुनावी अभियान के अंतिम दौर में आप से आगे बढ़ सकते हैं. उनके अनुभवों और छल-कपट का कौशल अपनाते हुए? मतदाता इस सवाल का जवाब 4 फरवरी को देंगे, जिस दिन वे अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे.

First published: 25 January 2017, 8:43 IST
 
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