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CRPF की रिपोर्ट- 2 बोडो आतंकियों का एनकाउंटर फ़र्ज़ी था

कैच ब्यूरो | Updated on: 24 May 2017, 16:50 IST
CRPF

असम के चिरांग जिले में सुरक्षाबलों द्वारा इसी साल मार्च में बोडो के दो आतंकियों को मुठभेड़ में मार गिराये जाने का मामला फर्जी पाया गया है. सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) के वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी जांच में पाया है कि उन्हें मुठभेड़ में नहीं, बल्कि पहले पकड़ा गया और फिर बाद में उनकी हत्या कर दी गई.

अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में दोनों की मौत को 'सोची-समझी हत्या' करार देते हुए मामले की स्वतंत्र जांच कराने की सिफारिश की है. इस रिपोर्ट को सीआरपीएफ के आईजी रजनीश राय ने तैयार किया है. जो असम सहित पूर्वोत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में उग्रवाद-विरोधी बल के प्रभारी हैं.

अपनी रिपोर्ट में घटना के बारे में बताते हुए राय ने कहा है कि 30 मार्च को एक संयुक्त ऑपरेशन के वक्त पुलिस पर चार-पांच लोगों ने अंधाधुंध फायरिंग करना शुरू कर दिया था.

पुलिस का दावा था कि इसी मुठभेड़ में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (सॉन्गबिजित) के दो संदिग्ध उग्रवादी मारे गए. मारे गए उग्रवादियों के पास से हथियार तथा गोला-बारूद भी बरामद किया गया था.

वहीं आईजी रजनीश राय ने अपनी 13 पेज की रिपोर्ट में कहा है कि पुलिस की इस कहानी में बहुत-सी खामियां हैं. उनकी रिपोर्ट कई सबूतों के अलावा उन गवाहों के बयानों पर आधारित है, जिन्होंने घटना से काफी वक्त पहले सुरक्षाबलों को इन दो उग्रवादियों को किसी अन्य गांव से उठाते देखने का दावा किया था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षाबलों को उनके कब्ज़े से सिर्फ एक चीन-निर्मित ग्रेनेड मिला था. उसके अलावा सभी हथियार 'प्लान्ट' किए गए थे.

रजनीश राय ने लिखा, "सीआरपीएफ की आधिकारिक रिपोर्ट सुरक्षाबलों के संयुक्त ऑपरेशन की काल्पनिक कथा पेश करती है, ताकि दो लोगों की हिरासत में रखकर की गई सोची-समझी हत्या पर पर्दा डाला जा सके, और उसे बहादुरी से हासिल की गई उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है."

सीआरपीएफ के आईजी रजनीश राय के मुताबिक हिरासत में लिए गए व्यक्तियों की पारिवारिक तथा सामाजिक पृष्ठभूमि का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि 'निर्मम से निर्मम अपराधियों और उग्रवादियों को भी कानून की सही और उचित प्रक्रिया से गुज़ारा जाना चाहिए.

रिपोर्ट में कहा गया है, "सुरक्षाबलों को समाज के फायदे की आड़ लेकर सोच-समझकर उनकी हत्या कर देने का हक नहीं है. इसलिए उग्रवाद से लड़ते हुए सामाजिक हितों तथा व्यक्तिगत मानवाधिकारों के बीच सही संतुलन बनाए रखना बेहद अहम है."

First published: 24 May 2017, 16:50 IST
 
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