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बेला भाटिया: बस्तर में समाधान चाहिए, युद्ध नहीं

बेला भाटिया | Updated on: 29 April 2017, 12:12 IST

बस्तर की भूमि पर पिछले एक दशक में बहुत खून बहा है. गांव-गांव में हत्याएं हुईं हैं. कभी आदिवासी मरे हैं, कभी सुरक्षा कर्मी, कभी माओवादी. हर एक का जीवन बहुमूल्य है. हर हत्या निंदनीय है. आख़िर यह सिलसिला कब थमेगा? हमे कब लगेगा कि बस बहुत हो गया, अब और नहीं? मैं मानती हूं कि हम नागरिकों को मूक दर्शक बन कर नहीं रहना चाहिए. हमे बस्तर के इतिहास के इन खूनी पन्नों को पलटने और एक नया इतिहास रचने की हिम्मत करनी चाहिए.


हमे सरकार और माओवादियों से मांग करनी चाहिए कि युद्ध विराम हो. हमे उनसे अनुरोध करना चाहिए कि बस्तर के लोगों के हित में वह इस मांग का सम्मान करें. युद्ध विराम के पश्चात, शांति के माहौल में, हमे इस युद्ध की जड़ तक जाना होगा और राजनितिक समाधान खोजना होगा.

 

पहल की दरकार

 

ऐसी कोशिश आंध्र प्रदेश में Committee of Concerned Citizens ने की थी. लगातार पांच वर्षों तक वह दोनों पक्षों से बातचीत सरकार करते रहे और 2004 में शांति वार्ता कुछ चरणों में हुई. भारत और अन्य देशों में इस तरह के और भी उद्धरण हैं. बस्तर में भी यह संभव है.


अन्य उदाहरणों से सीखते हुए मैं मानती हूं कि केवल शांति की नहीं पर न्याय की भी बात साथ-साथ होनी चाहिए. शांति में अगर संतोष न हो तो वह फिर अशांति को जन्म देती है. शांति में संतोष केवल न्याय से ही आ सकता है. जहां न्याय होगा वहां शांति जरुर होगी, इस लिए हमारा लक्ष्य होना चाहिए -- न्यायपूर्ण-शांति.


हमे नहीं भूलना चाहिए की बस्तर के गांव, जो आज सरकार और माओवादियों की युद्ध-भूमि हैं, के लोग देश के सबसे गरीब लोगों में से हैं. यहां के आदिवासी ‘मुख्यधारा’ के नागरिकों के लिए साधन-विहीन लग सकते हैं, लेकिन वे एक सुलझी हुई उतम सोच और समझ के तहत सदियों से प्रकृति पर आधारित जीवन जीते रहे हैं. उनके लिए विकास क्या है, यह उन्हीं से जाना जा सकता है.


चाहे विकास को आदिवासी कैसे भी परिभाषित करें, इतना तो पक्का है कि वह कभी नहीं चाहेगें कि उन्हें उनकी जमीन, जंगल, पहाड़ और पानी से दूर किया जाए. आज कुछ ऐसा ही हो रहा है और इसी का उनके मन में डर भी है. सरकार से उनके मन-मुटाव के पीछे यह एक अहम कारण है. इसलिए राजनितिक समाधान की शुरुआत में ही सरकार को ईमानदारी से आदिवासियों को आश्वासन देना चाहिए कि वह ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाएगी जिससे आदिवासियों का उनकी सम्पदा पर नियंत्रण कमजोर हो. आदिवासियों के साथ एक संतोषजनक समझ बनने तक खनिज सहित सभी विवादास्पद नीतियों और परियोजनाओं को रोकेगी.

युद्ध से क्या मिलेगा?

 

सुकमा की हाल की घटना के बाद कुछ सलाहकार सरकार से और भी तीखे वार की मांग कर रहे हैं. हमे नहीं भूलना चाहिए कि इसी तरह की रणनीति के तहत आज बस्तर देश के सबसे बड़ी सैनिक छावनी बन गया है. पिछले एक दशक में कई ऑपरेशन हुए, जिनसे कुछ हासिल न हुआ. लिहाजा, हमें समाधान की तरफ बढ़ना चाहिए, जो युद्ध में नहीं है. अब अधिकतम हिंसा नहीं, पर लघुतम हिंसा की बात करना जरुरी है. सभी के मानव अधिकारों की अधिकतम सुरक्षा के लिए अनिवार्य है कि 'दोनों तरफ से - लघुतम हिंसा का उपयोग हो.'


जब-जब माओवादियों के “सफाए” की बात होती है तो अक्सर इस सचाई को नजरंदाज कर दिया जाता है कि माओवादी चीन या किसी दुसरे देश से नहीं आये हैं. वे इसी देश के नागरिक हैं. विचार या विचारधारा किसी देश की सरहद तक सीमित नहीं होती. सोच का सामना सोच से ही हो सकता है use of force से नहीं. अगर देश का नागरिक माओवादी बनता है, तो हमे सोचना होगा कि उसके साथ ऐसा क्या हुआ कि वह माओवादी बना. और उसके इन कारणों को दूर करना होगा. यह सभी कुछ युद्ध विराम और राजनितिक प्रक्रिया से संभव है.

First published: 29 April 2017, 12:12 IST
 
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